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Monday, 2 March, 2026
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समयसीमा बीतने के 3 महीने बाद भी वक्फ मैपिंग का काम अधूरा, सिर्फ 44% संपत्तियां मंजूर

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 3 लाख वक्फ संपत्तियां प्रक्रिया में अटकी, 38,000 खारिज और पोर्टल की कई दिक्कतों से अपलोड स्टाफ ‘तनाव में’. 1717 का एक वक्फ बिल्कुल प्रोसेस नहीं हो पाया.

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नई दिल्ली: छह दिसंबर 2025 की अंतिम तारीख से पहले, जब वक्फ संपत्तियों को ‘उम्मीद सेंट्रल पोर्टल’ पर अपलोड करना अनिवार्य था, पंजाब वक्फ बोर्ड ने अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय को एक ज़रूरी ईमेल भेजा.

राज्य में वक्फ संपत्तियों का रिकॉर्ड अपलोड करने के लिए 52 डेटा ऑपरेटर काम कर रहे थे, लेकिन पोर्टल इतना धीमा चल रहा था कि स्टाफ दो घंटे में एक एंट्री भी पूरी नहीं कर पा रहा था. कैप्चा लोड नहीं हो रहा था. दस्तावेज़ अपलोड नहीं हो रहे थे. जब डेटा चेकर एंट्री को जांचने की कोशिश करते, तो स्क्रीन पर “सेशन आउट” दिख जाता था.

बोर्ड ने लिखा, “स्टाफ मेंटल प्रेशर महसूस कर रहा है. पिछले दो-तीन दिनों में यह प्रॉब्लम और ज्यादा बढ़ गई है. इसलिए अनुरोध है कि ज़रूरी कदम उठाए जाएं, ताकि बोर्ड का स्टाफ स्वस्थ तरीके से काम कर सके.”

संशोधित वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत, वक्फ का मतलब है कि कोई मुस्लिम व्यक्ति (वाकिफ) अपनी चल या अचल संपत्ति को धार्मिक या सामाजिक भलाई के लिए हमेशा के लिए समर्पित कर देता है. एक बार वक्फ बन जाने के बाद, वह स्थायी और गैर-हस्तांतरणीय हो जाता है, यानी उसे बेचा, उपहार में दिया या विरासत में नहीं लिया जा सकता.

भारत में वक्फ संपत्ति का प्रबंधन मुतवल्ली करता है (जो उसका मालिक नहीं होता) और इसकी निगरानी राज्य वक्फ बोर्ड करता है.

बिहार में बुरहानुद्दीन अहमद नाम के एक मुतवल्ली 1717 में बने एक वक्फ को रजिस्टर करने की कोशिश कर रहे थे.

उम्मीद पोर्टल ने उनसे वाकिफ का मोबाइल नंबर मांगा. बैंक डिटेल मांगी. सर्वे की तारीख मांगी. यह वक्फ पूरी एक गांव में फैला था—500 से ज्यादा प्लॉट, 2000 एकड़ से ज्यादा ज़मीन और हर प्लॉट वक्फ संपत्ति था. पोर्टल ने हर प्लॉट को अलग-अलग अपलोड करने की शर्त रखी.

मुतवल्ली ने हेल्पडेस्क को लिखा, “इन संपत्तियों को अलग-अलग अपलोड करना संभव नहीं है और आप भी बिना मदद के इसे अपलोड नहीं कर सकते.”

ये सिर्फ दो उदाहरण हैं. ‘उम्मीद’ पोर्टल की शिकायत प्रणाली में वक्फ अपलोड के दौरान ऐसी सैकड़ों समस्याएं दर्ज हैं.

हालांकि, पोर्टल तीन महीने पहले अपलोड के लिए बंद हो चुका है, लेकिन अप्रैल 2025 में वक्फ (संशोधन) विधेयक पास होने के बाद शुरू हुई डिजिटलीकरण प्रक्रिया अभी आधी भी पूरी नहीं हुई है. इसका मकसद देशभर की वक्फ संपत्तियों का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन, डिजिटल मैपिंग और पारदर्शिता सुनिश्चित करना था.

अब इस कानून का नाम यूनिफाइड वक्फ मैनेजमेंट, एंपावरमेंट, एफिशिएंसी एंड डेवलपमेंट (UMEED) अधिनियम है. इसके सेक्शन 3B (1) के अनुसार, कानून लागू होने के छह महीने के अंदर हर पहले से पंजीकृत वक्फ को अपनी पूरी जानकारी पोर्टल पर डालनी ज़रूरी है. ‘उम्मीद सेंट्रल पोर्टल’ 6 जून 2025 को लॉन्च हुआ था.

कानून यह भी कहता है कि यदि कोई मुतवल्ली उचित कारण दिखाए, तो वह ट्रिब्यूनल से छह महीने तक की अतिरिक्त मोहलत मांग सकता है. इस अनिवार्य अपलोड का उद्देश्य पारदर्शिता लाना और पहली बार देशभर की वक्फ संपत्तियों का एक सत्यापित राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाना था.

अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के फरवरी के अंत के आंकड़ों के अनुसार, छह महीने की अवधि में 6,24,300 वक्फ संपत्तियां पोर्टल पर सत्यापन के लिए डाली गईं. इनमें से अब तक केवल 2,78,152 यानी 44.5% को ही मंजूरी मिली है.

करीब 38,000 संपत्तियां सीधे खारिज कर दी गईं और 3,00,000 से ज्यादा अलग-अलग प्रशासनिक स्तरों पर अटकी हुई हैं.

आंकड़ों के अनुसार, 50,535 संपत्तियां ‘मेकर’ स्तर पर लंबित हैं, 2,22,887 ‘चेकर’ के पास और 34,733 ‘अप्रूवर’ के पास अटकी हैं.

उम्मीद पोर्टल से पहले, वक्फ रिकॉर्ड एक सदी से ज्यादा समय तक जिला रजिस्टरों में उर्दू और अरबी में रखे जाते थे. 2009 से यह रिकॉर्ड वक्फ एसेट्स मैनेजमेंट सिस्टम ऑफ इंडिया (WAMSI) पर रखा गया.

WAMSI के मुताबिक, भारत में लगभग 8.72 लाख अचल वक्फ संपत्तियां हैं, जो 38 लाख एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में फैली हैं और इनकी अनुमानित कीमत 1.2 लाख करोड़ रुपये है. इनमें मस्जिदें, कब्रिस्तान, कृषि भूमि और व्यावसायिक इमारतें शामिल हैं.

8.72 लाख में से 6.24 लाख संपत्तियां ही अभी उम्मीद पोर्टल पर सत्यापन प्रक्रिया में आई हैं. यानी करीब 2.5 लाख संपत्तियां अभी तक जमा ही नहीं हुईं.

अधूरी रजिस्ट्री का असर प्रशासन से आगे भी पड़ सकता है. UMEED अधिनियम के तहत वक्फ संपत्तियों पर अतिक्रमण के मामलों में कार्रवाई शुरू करने के लिए 12 साल की सीमा तय की गई है. WAMSI के आंकड़ों के अनुसार, 58,898 संपत्तियां पहले से अवैध कब्ज़े में हैं. अगर कोई संपत्ति डिजिटल रजिस्ट्री से बाहर है, तो कानूनी प्रक्रिया में दिक्कत हो सकती है.

मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि सरकार ने पूरे डिजिटलीकरण अभियान के दौरान राज्य वक्फ बोर्डों को पूरा सहयोग दिया है—पोर्टल की तकनीकी समस्याएं सुलझाने, ट्रेनिंग देने और स्टाफ व मुतवल्लियों को प्रक्रिया समझाने के लिए कई बैठकें की गईं.

समयसीमा चूकने के सवाल पर अधिकारी ने कहा कि वक्फ ट्रिब्यूनल ने राज्यों को अतिरिक्त समय दे दिया है.

उन्होंने कहा, “हमारा ध्यान काम को सही तरीके से पूरा करने पर है, सिर्फ जल्दी खत्म करने पर नहीं. यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि बोर्डों के पास जरूरी सभी साधन हों.”

राज्यों पर एक नज़र

उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड भारत में वक्फ संपत्तियों का सबसे बड़ा प्रबंधन करता है—WAMSI के तहत 2.17 लाख से ज्यादा संपत्तियां दर्ज हैं, लेकिन मौजूदा डिजिटलीकरण प्रक्रिया में डाली गई 96,989 एंट्री में से केवल 13,382 को ही पूरी मंजूरी मिली है—यानी सिर्फ 14 प्रतिशत काम पूरा हुआ है. करीब 68,000 रिकॉर्ड ‘चेकर’ स्तर पर अटके हुए हैं. राज्य के शिया समुदाय की 7,607 एंट्री पोर्टल पर हैं, जिनमें से 1,201 को मंजूरी मिली है—यानी 16 प्रतिशत पूरा हुआ है.

पश्चिम बंगाल ने कई महीनों तक UMEED अधिनियम लागू करने के लिए कोई दिशा-निर्देश जारी नहीं किए.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शुरू में कहा था कि यह कानून राज्य में लागू ही नहीं किया जाएगा. मुर्शिदाबाद जिले में इस कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए—तीन लोगों की मौत हुई और 100 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी की खबर आई. बनर्जी सरकार ने इस कानून को अदालत में चुनौती दी, लेकिन उसे अनुकूल फैसला नहीं मिला.

इसके बाद पिछले साल नवंबर के अंत में, 6 दिसंबर की अंतिम तारीख से 10 दिन पहले, पश्चिम बंगाल के अल्पसंख्यक विकास विभाग के सचिव ने सभी जिला मजिस्ट्रेट को पत्र भेजकर वक्फ संपत्ति का डेटा पोर्टल पर अपलोड करने के निर्देश दिए.

पोर्टल के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में 77,648 एंट्री हैं—जो देश में दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा हैं, लेकिन इनमें से केवल 14,721 को मंजूरी मिली है. यानी 19 प्रतिशत काम पूरा हुआ है. ‘चेकर’ स्तर पर 50,816 एंट्री लंबित हैं.

इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

पंजाब की स्थिति अलग नज़र आती है. कुल 26,187 एंट्री में से 25,216—यानी लगभग 96 प्रतिशत—को पूरी मंजूरी मिल चुकी है. किसी भी बड़े राज्य वक्फ बोर्ड में यह सबसे ज्यादा मंजूरी दर है, लेकिन यही वह राज्य है, जिसकी आधिकारिक शिकायतों में यह भी साफ दिखता है कि यह काम किन हालात में पूरा हुआ.

पोर्टल पर एक शिकायत में पंजाब वक्फ बोर्ड ने बताया कि 24,000 से ज्यादा संपत्तियों के लिए चेकर और अप्रूवर प्रक्रिया में हर संपत्ति पर 138 अनिवार्य हां/ना बॉक्स भरने पड़ते हैं. इस तरह दोनों स्तर पर कुल मिलाकर 66 लाख से ज्यादा क्लिक करने पड़े.

बोर्ड ने लिखा, “यह एक बड़ा संचालन संबंधी अवरोध है, जो बहुत ज्यादा समय लेता है” और इसमें एक साथ कई एंट्री करने का कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है.

एक अन्य शिकायत में बोर्ड ने अंतिम दिनों में पोर्टल की स्थिति का भी ज़िक्र किया.

इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

मंत्रालय के अन्य आंकड़ों के अनुसार, तेलंगाना में 62,917 एंट्री हैं, जिनमें से 26,574 को मंजूरी मिली है—यानी 42 प्रतिशत पूरा हुआ है, जबकि 10,118 एंट्री खारिज की गई हैं. राज्य की खारिज दर 16 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत 6 प्रतिशत है.

महाराष्ट्र में 62,906 एंट्री हैं, जिनमें से 17,456 को मंजूरी मिली है (28 प्रतिशत). गुजरात में 27,776 एंट्री में से 22,995 को मंजूरी मिली है (83 प्रतिशत). आंध्र प्रदेश में मंजूरी दर 91 प्रतिशत रही है.

शिकायतों पर एक नज़र

मंत्रालय के पोर्टल के आंकड़े जहां सिर्फ नतीजे दिखाते हैं, वहीं राज्य वक्फ बोर्डों और व्यक्तिगत मुतवल्लियों द्वारा पोर्टल पर दर्ज की गई आधिकारिक शिकायतें बताती हैं कि ये आंकड़े किन हालात में तैयार हुए.

आंध्र प्रदेश राज्य वक्फ बोर्ड के सीईओ ने लिखा कि “पोर्टल अक्सर ‘UNDER MAINTENANCE’ का नोटिस दिखाता है और कई बार कोशिश करने के बाद भी अचानक एरर दिखाता है.”

शिकायत में कहा गया कि “एक ही मेकर का रजिस्ट्रेशन करने में पूरा दिन लग रहा है, जो मंत्रालय द्वारा तय सख्त समयसीमा को देखते हुए बिल्कुल अव्यवहारिक और उल्टा असर डालने वाला है.” जबकि आंध्र प्रदेश की पूरा होने की दर बेहतर राज्यों में है.

ओडिशा वक्फ बोर्ड ने एक ढांचागत समस्या बताई: जब एक मुतवल्ली, जो एक से ज्यादा वक्फ संभालता है, दूसरी संपत्ति रजिस्टर करने की कोशिश करता है, तो पोर्टल एरर दिखाता है—“user already exists with same mobile number and email-ID”—इससे एक से ज्यादा संपत्तियां संभालने वाले मुतवल्ली अपनी कानूनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पा रहे.

बिहार राज्य सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बताया कि वे लंबे समय तक काम शुरू ही नहीं कर पाए, क्योंकि “आवेदक के पते में गांवों की सूची दिखाई ही नहीं दे रही है.” बोर्ड ने यह भी बताया कि उन्हें पोर्टल के एडमिन बैकएंड से लॉक कर दिया गया.

महाराष्ट्र के नोडल अधिकारी ने दर्ज किया कि फॉर्म में जो कॉलम गैर-ज़रूरी (non-mandatory) बताए गए हैं—जैसे वार्षिक खाते और ऑडिट रिपोर्ट—वही अंतिम सबमिशन में रुकावट बन रहे हैं.

राज्य ने यह भी बताया कि 5,000 से ज्यादा पंजीकृत नकद और चल संपत्ति वाले वक्फ अपलोड ही नहीं हो पाए, क्योंकि पोर्टल ज़मीन का क्षेत्रफल और सर्वे नंबर मांगता है, जो गैर-अचल संपत्तियों के लिए होता ही नहीं. शिकायत के अनुसार मंत्रालय का जवाब था: “05.12.2025 के बाद रजिस्टर करें”, यानी अंतिम तारीख के बाद.

अन्य शिकायतों में बताया गया कि जयपुर (जयपुर जिला) और उत्तर प्रदेश का मुजफ्फरनगर नगर क्षेत्र जैसे बड़े शहरी इलाके पोर्टल के लोकेशन विकल्प में दिख ही नहीं रहे, क्योंकि वे LGD (लोकल गवर्नमेंट डायरेक्टरी) डेटाबेस में दर्ज नहीं हैं, जिस पर पोर्टल निर्भर करता है. कुछ मामलों में संपत्तियां गलत राज्य बोर्ड को चली गईं, क्योंकि सिस्टम मुतवल्ली के घर के पते को पढ़ता है, संपत्ति के स्थान को नहीं.

और बिहार में बुरहानुद्दीन अहमद, एक ऐसे वक्फ के मुतवल्ली जो औरंगजेब की मृत्यु के करीब दस साल बाद बना था, अब भी हेल्पडेस्क को लिख रहे थे, क्योंकि वे पूरे वक्फ गांव को अपलोड नहीं कर पा रहे थे.

बड़ी तस्वीर

UMEED अधिनियम पिछले साल अप्रैल में लोकसभा में आधी रात को पास हुआ और दो दिन बाद 17 घंटे की बहस के बाद राज्यसभा से भी पारित हुआ. इसके खिलाफ 65 से ज्यादा याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर हुईं, जिसके बाद सितंबर में दो प्रावधानों पर आंशिक रोक लगी.

WAMSI डेटा के अलग विश्लेषण से पता चलता है कि 8.72 लाख संपत्तियों में से केवल 9,279 के स्वामित्व दस्तावेज़ अपलोड किए गए हैं, और सिर्फ 1,083 वक्फ डीड डिजिटल रूप में उपलब्ध हैं. करीब 50 प्रतिशत संपत्तियों की स्थिति अज्ञात है. लगभग 7 प्रतिशत पर अतिक्रमण दर्ज है और 2 प्रतिशत पर मुकदमे चल रहे हैं.

मंत्रालय के Umeed डेटा में पोर्टल की कार्यक्षमता, शिकायतों के समाधान या मंजूर की गई एंट्री की सटीकता का आकलन नहीं है. यह सिर्फ बोर्ड और राज्य के हिसाब से यह दिखाता है कि कितनी संपत्तियां डाली गईं और कितनी मंजूर हुईं.

इसी आधार पर, कानूनी समयसीमा के तीन महीने बाद: देशभर में 44.5 प्रतिशत वक्फ संपत्तियों को मंजूरी मिली है; देश के सबसे बड़े वक्फ राज्य में 14 प्रतिशत; और पंजाब में 96 प्रतिशत—जो किसी भी राज्य में सबसे ज्यादा है.

शिकायतों का रिकॉर्ड बताता है कि ये आंकड़े किन मुश्किल हालात में हासिल किए गए.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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