Tuesday, 5 July, 2022
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तीसरे दौर के ट्रायल्स में कोविड वैक्सीन्स ने उम्मीद जगाई, इसके सबसे अहम स्टेज होने के ये हैं कारण

तीसरे दौर के ट्रायल्स किसी भी वैक्सीन की जांच प्रक्रिया की अंतिम स्टेज होते हैं. इसमें बड़ी संख्या में लोगों को वैक्सीन्स दी जाती हैं, ताकि इनके प्रभाव और सुरक्षा का पता चल सके.

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नई दिल्ली: इस महीने मॉडर्ना, फ़ाइज़र, और ऑक्सफोर्ड-एस्त्रा ज़ेनेका के तीन कोविड-19 कैंडिडेट्स के, तीसरे दौर के ट्रायल्स के शुरूआती नतीजे सामने आ गए हैं, जिनमें वो प्राप्तकर्ताओं को नॉवल कोरोनावायरस से बचाने में काफी हद तक कारगर पाए गए हैं.

तीसरे दौर के ट्रायल्स किसी भी वैक्सीन की, जांच प्रक्रिया का अंतिम स्टेज होते हैं, और इन्हें सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. इसमें बड़ी संख्या में लोगों को वैक्सीन्स दी जाती हैं, ताकि इनके प्रभाव और सुरक्षा का पता सके.

लेकिन रिसर्चर्स इस स्टेज के लिए ज़रूरी सैकड़ों वॉलंटियर्स को, किस तरह भर्ती करते हैं, और इसके प्रभाव को कैसे नापा जाता है?

हालांकि हर स्पॉन्सर फेज़ 3 ट्रायल, अपने हिसाब से डिज़ाइन करता है, लेकिन फिर भी उसमें कुछ बेसिक तत्व होते हैं.


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कैसे होती है वॉलंटियर्स की भर्ती

कोई भी वैक्सीन फेज़ 3 के लिए तभी योग्य होती है, जब वो फेज़ 1 और 2 के ट्रायल से गुज़र जाती है, जिनका उद्देश्य भी सुरक्षा, प्रभाव, और साइड इफेक्ट्स का मूल्यांकन होता है, लेकिन इनमें प्रतिभागियों की संख्या कहीं कम होती है.

इस स्टेज पर उसे बड़ी संख्या में वॉलंटियर्स को दिया जाता है, ताकि वैज्ञानिक आम लोगों पर वैक्सीन के असर को देख सकें.

पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के लिए, जो भारत में ऑक्सफोर्ड -एस्त्रा ज़ेनेका ट्रायल्स को स्पॉन्सर कर रहा है, वो संख्या 1,600 है. हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक, जो देसी कैंडिडेट कोवैक्सिन बना रही है, और तीसरे दौर के ट्रायल्स भी कर रही है, 25,800 वॉलंटियर्स भर्ती करना चाह रही है.

ट्रायल्स में सबसे पहले उन अस्पतालों का चुनाव होता है, जहां वो किए जाएंगे. वैक्सीन देने के लिए चुने गए हर अस्पताल को, भर्ती किए जाने वाले वॉलंटियर्स की संख्या बताई जाएगी. क्लीनिकल रिसर्च संस्थाओं (सीआरओज़) को, जो ऐसे ट्रायल्स में सहायता करने वाली इकाइयां होती हैं, अकसर वॉलंटियर्स भर्ती करने का काम सौंपा जाता है.

कोवैक्सिन के ट्रायल की एक जगह- अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रमुख जांचकर्ता, डॉ मोहम्मद शमीम ने कहा, ‘हमारे यहां एक आचार समिति है, जो तय करती है कि क्या हम वॉलंटियर्स की भर्ती के लिए विज्ञापन निकाल सकते हैं. वो फील्ड वर्कर्स की एक टीम भी स्वीकृत करते हैं, जो हमारे लिए वॉलंटियर्स जुटाती है’.

ये स्टडीज़ ‘डबल ब्लाइंड’ होती हैं, जिसका मतलब है कि न तो डॉक्टर, और न ही प्रतिभागी को पता होता है, कि वॉलंटियर को वैक्सीन दी गई है या प्लेसीबो. वॉलंटियर्स को कुछ कागज़ी कार्रवाई करनी होती है, और एक सहमति फॉर्म भरना पड़ता है, जिसके बाद उनकी डीटेल्स एक इंटरेक्टिव वेब केस्पॉन्स सिस्टम (आईडब्लूआरएस), या ऐसे ही किसी सिस्टम में भरी जाती हैं, जो डॉक्टरों को एक रैंडम कोड देता है. उसी से मिलते कोड की एक शीशी से- जिसमें प्लेसीबो या वैक्सीन होता है- प्रतिभागी को डोज़ दिया जाता है.

सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के कोविशील्ड ट्रायल में जुटे, एक जांचकर्ता डॉ सुशांत मेशराम ने कहा, ‘केवल थर्ड-पार्टी स्पॉन्सर (वैक्सीन निर्माता) को पता होता है, कि किसे क्या दिया गया है’.

उन्होंने आगे कहा, ‘स्टडी के अंत में, असर का पता लगाने के लिए, डेटा को अलग कर लिया जाता है- कि किसे वैक्सीन दी गई, और किसे प्लेसीबो दी गई’.

वैक्सीन देना और उसके बाद

गोवा-स्थित क्रोम क्लीनिकल रिसर्च के प्रबंध निदेशक डॉ धनंजय लाड, राज्य में एक ट्रायल साइट की सहायता कर रहे हैं, जहां कोवैक्सिन टेस्ट की जा रही है.

लाड ने कहा, ‘ट्रायल के दौरान अगर कुछ गड़बड़ी हो जाती है, तो हमें ये चेक करने की आज़ादी होती है, कि मरीज़ को वैक्सीन दिया गया था या प्लेसीबो, और उस डेटा को अलग कर दिया जाता है’. उन्होंने आगे कहा, ‘सभी मरीज़ों पर नज़र रखी जाती है, और हर महीने उनकी जांच होती है’.

डॉ शमीम ने कहा कि अस्पताल ने स्टाफ भर्ती किया है, जो फोन पर वॉलंटियर के संपर्क में रहता है, ताकि मासिक जांच करने के अलावा, किसी भी तरह के विपरीत प्रभावों पर नज़र रख सके.


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अंतरिम विश्लेषण

सीधे शब्दों में कहें, तो किसी वैक्सीन को प्रभावी माना जाता है, अगर वो स्वस्थ वॉलंटियर्स को वायरस के संपर्क में आने से बचा लेती है. शुरू से आख़िर तक, एक फ़ेज़ 3 ट्रायल आमतौर पर, एक साल या उससे ज़्यादा चलता है, ताकि वैज्ञानिक वैक्सीन के दीर्घ-कालिक प्रभाव देख सकें. फेज़ 3 में सभी कोविड-19 वैक्सीन ट्रायल्स के, पूरे 2021 में चलने की संभावना है.

मॉडर्ना, फाइज़र, और ऑक्सफोर्ड-एस्त्रा ज़ेनेका ने, अपने नतीजे तब घोषित किए, जब उन्होंने अंतरिम विश्लेषण पूरा लिया, जिसमें कुछ डेटा उस दौरान जमा किया जाता है, जब ट्रायल चल रहा होता है.

अंतरिम विश्लेषण तब किया जाता है, जब दोनों डोज़ लेने के बाद, एक तय संख्या में प्रतिभागी, कोविड-19 पॉज़िटिव निकल आते हैं. ये संख्या ट्रायल स्पॉन्सर का कोई सांख्यिकीविद तय करता है.

इसके बाद, इन कोविड-19 पॉज़िटिव मामलों के डेटा को खोलकर, उन मामलों का अनुपात देखा जाता है, जिन्हें वैक्सीन की जगह प्लेसीबो दिया गया था.

मसलन, फाइज़र ने अपना अंतरिम विश्लेषण तब किया, जब ट्रायल के दौरान 94 वॉलंटियर्स कोविड-19 पॉज़िटिव पाए गए. फाइज़र ने घोषित किया कि उसकी वैक्सीन 90 प्रतिशत प्रभावी है, चूंकि इन पॉज़िटिव मामलों में से अधिकांश को प्लेसीबो दिया गया था. इसी तरह, मॉडर्ना ने 95 पॉज़िटिव मामलों का डेटा खोला, और पाया कि उसकी वैक्सीन 94.5 प्रतिशत प्रभावी थी.

लाड ने कहा, ‘स्वास्थ्य निगरानी के दौरान जो पॉज़िटिव मामले सामने आते हैं, अगर, उनमें आप देखते हैं कि सभी को, अंतरिम विश्लेषण के दौरान प्लेसीबो दिया गया था, और किसी को भी वैक्सीन नहीं मिली थी, तो वो एक बहुत मज़बूत इम्यून रेस्पॉन्स का संकेत होगा, जो वैक्सीन के आपात इस्तेमाल के लिए आवेदन करने का एक पर्याप्त कारण होगा. ये इसीलिए किया जाता है’.

प्रभाव को नापने की ये प्रक्रिया, ट्रायल के अंतिम विश्लेषण में भी दोहराई जाती है, जहां वैक्सीन-प्लेसीबो अनुपात देखने के लिए, सामने आ रहे पॉज़िटिव मामलों की अधिक संख्या के आंकड़े खोले जाते हैं. मसलन, फाइज़र के लिए ये संख्या 164 मामले हैं. हर स्पॉन्सर अपना अलग हिसाब लगाकर, इस संख्या पर पहुंचता है.

समय के साथ जब ज़्यादा मामले विचार में आएंगे, तो वैक्सीन के असर का संकेत देने वाला प्रतिशत भी बदल सकता है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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