नई दिल्ली: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, देशभर में चल रही टाइगर जनगणना के शुरुआती आकलन में भारत की बाघ आबादी में कम से कम 10 प्रतिशत से 15 प्रतिशत तक बढ़ोतरी होने की उम्मीद है.
हालांकि, अधिकारियों और विशेषज्ञों ने दिप्रिंट को बताया कि इस बार बाघों की संख्या में ज्यादातर बढ़ोतरी रिजर्व के कोर एरिया के बाहर देखने को मिलेगी. इसमें बफर जोन, आसपास की टेरिटोरियल डिवीजन और टाइगर कॉरिडोर शामिल हैं.
ऑल इंडिया टाइगर एस्टिमेशन (AITE), यानी देशव्यापी टाइगर जनगणना, हर चार साल में की जाती है. यह फिलहाल अपने छठे चरण में है. इसकी शुरुआत 2025 के अंत में हुई और यह 2026 तक चलेगी. अंतिम रिपोर्ट जुलाई 2027 में आने की उम्मीद है. इस प्रक्रिया में देश के सभी 58 टाइगर रिजर्व शामिल हैं और इसमें संरक्षित क्षेत्रों के अंदर और बाहर दोनों जगह बाघों की संख्या का अनुमान लगाया जाता है.
पेंच टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर रजनीश कुमार सिंह ने कहा, “हम कोर एरिया के साथ-साथ बफर और टेरिटोरियल डिवीजन में बाघों की संख्या का अनुमान लगाने के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह के तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, जैसे पगमार्क, मल के नमूने और कैमरा ट्रैप की तस्वीरें.” उन्होंने कहा, “यह पूरी तरह जनगणना नहीं, बल्कि सांख्यिकीय मॉडल और कॉन्फिडेंस इंटरवल के जरिए किया गया एक अनुमान है.”
2022 की पिछली जनगणना में देश में कुल 3,682 बाघ होने का अनुमान लगाया गया था. इसमें मध्य प्रदेश 785 बाघों के साथ पहले स्थान पर था. इसके बाद कर्नाटक में 563, उत्तराखंड में 560 और महाराष्ट्र में 444 बाघ पाए गए थे. भारत में 2006 से, जब यह जनगणना शुरू हुई, तब से बाघों की आबादी में सालाना औसतन 6 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है.
मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि राज्य में बाघों की संख्या में 25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है और यह आंकड़ा 1,000 के पार जा सकता है. राजस्थान के रणथंभौर और सरिस्का जैसे टाइगर रिजर्व पहले से ही नियमित कैमरा ट्रैपिंग करते हैं और उन्हें AITE में बाघों की संख्या स्थिर रहने या बढ़ने की उम्मीद है.
प्रोजेक्ट टाइगर से जुड़े प्रमुख संरक्षणवादी वाई.वी. झाला ने कहा, “देश के ज्यादातर टाइगर रिजर्व अब लगभग संतृप्त हो चुके हैं. मेलघाट या सतपुड़ा जैसे कुछ इलाकों में शायद कुछ और बाघों की गुंजाइश हो.” उन्होंने कहा, “इसके अलावा बाघों की बढ़ोतरी ज्यादातर बफर जोन और मल्टी-यूज इलाकों में ही होगी.”
2026 की टाइगर जनगणना ऐसे समय में हो रही है जब देश के संरक्षित क्षेत्र धीरे-धीरे बाघों से भर रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में मानव-बाघ संघर्ष को लेकर सवाल भी बढ़े हैं. 2024 में ऐसे 73 से अधिक हमले दर्ज किए गए थे. इस जनगणना के नतीजे सिर्फ बाघों की संख्या ही नहीं, बल्कि उनकी घनत्व, उनके घूमने वाले इलाकों और आबादी के बदलते भौगोलिक फैलाव की जानकारी भी देंगे.
झाला ने कहा, “संरक्षित क्षेत्रों के बाहर रहने वाले वन्यजीवों के लिए हमें एक साझा एजेंडा बनाने की जरूरत है, क्योंकि ज्यादा घनत्व वाले बाघ और ज्यादा घनत्व वाली मानव आबादी आपदा का नुस्खा है.” उन्होंने कहा, “इस स्थिति को कैसे संभालें और कैसे सुनिश्चित करें कि ऐसा न हो, यह राष्ट्रीय बहस का विषय है. लेकिन इस पर तुरंत सोच शुरू करनी होगी.”
बाघों की आबादी में बढ़ोतरी
मध्य प्रदेश लंबे समय से भारत की बाघ आबादी का प्रमुख केंद्र रहा है. 1970 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत के बाद से यह राज्य लगातार शीर्ष पांच बाघ राज्यों में शामिल रहा है. विशाल घास के मैदान, समतल भूभाग, घने जंगल और मजबूत शिकार आधार ने इसे देश का शीर्ष बाघ राज्य बनने में मदद की.
कुल नौ टाइगर रिजर्व वाले मध्य प्रदेश में पन्ना, पेंच और बांधवगढ़ जैसे बड़े रिजर्व अब लगभग अपनी क्षमता तक पहुंच चुके हैं और नई जनगणना में इसका असर दिखने की संभावना है.
सिंह ने कहा, “2006 में हमें यह समझ आया कि बाघ सिर्फ संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहते और जहां भी अनुकूल वातावरण और शिकार उपलब्ध होता है, वहां वे पहुंच जाते हैं.” उन्होंने कहा कि इसी के बाद यह तय किया गया कि जनगणना का दायरा सिर्फ रिजर्व तक सीमित न रखकर बड़े इलाकों तक बढ़ाया जाए.
चरणबद्ध टाइगर जनगणना में फील्ड सर्वे और सांख्यिकीय मॉडल पर आधारित अनुमान शामिल होते हैं, जो रिजर्व की सीमाओं से परे जाकर बाघों की आवाजाही को देखते हैं. सिंह ने बताया कि मध्य प्रदेश में नए टाइगर रिजर्व विकसित किए जा रहे हैं और बढ़ती बाघ आबादी को समायोजित करने के लिए गांवों का पुनर्वास भी किया जा रहा है.
उन्होंने कहा, “इस जनगणना में नौरादेही, कान्हा और संजय दुबरी में बाघों की संख्या बढ़ सकती है, क्योंकि ये नए विकसित हो रहे रिजर्व हैं और कॉरिडोर के जरिए आपस में जुड़े हुए हैं.” उन्होंने कहा, “अभी भी हम देख रहे हैं कि बाघ बफर जोन और आसपास के जंगलों में जा रहे हैं, क्योंकि बाघ के लिए रिजर्व की कोई सीमा नहीं होती, उनके लिए सब एक जैसा होता है.”
झाला के अनुसार, भारत में अब बहुत कम ऐसे इलाके बचे हैं जहां पर्याप्त शिकार आधार हो और बाघ वहां न पहुंचे हों. ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में पलामू, सिमिलिपाल और इंद्रावती जैसे बड़े खाली आवास और रिजर्व हैं, लेकिन वहां शिकार की पर्याप्त संख्या नहीं है, जिससे बाघ स्वाभाविक रूप से वहां बस सकें.
हालांकि, रिजर्व के बाहर के बफर जोन और टाइगर लैंडस्केप बाघों के लिए बेहद आकर्षक हैं, जहां वे नए क्षेत्र और शिकार की तलाश में जाते हैं. ऐसे इलाकों में घूम रहे बाघों के लिए सबसे बड़ा शिकार आधार ग्रामीण क्षेत्रों का पशुधन है.
झाला ने कहा, “जंगली शिकार अब लगभग खत्म हो चुका है, जहां तक बाघ पहुंच सकते थे, लेकिन हमारे पशुधन जैसे बकरियां और गायों की संख्या लगातार बढ़ रही है.” उन्होंने कहा, “बाघों के लिए फर्क नहीं पड़ता, जब तक उन्हें खाना मिल रहा है.”
एक जैसा रुझान
कर्नाटक में भी ऐसा ही रुझान देखने को मिल रहा है. नागरहोल, बांदीपुर और बीआरटी जैसे वन्य अभयारण्यों में बाघों की संख्या स्थिर से बढ़ती हुई दिखाई दे रही है. अब बाघों की मौजूदगी उनके प्रमुख रिजर्व से सटे इलाकों में भी ज्यादा दर्ज की जा रही है.
बीआरटी टाइगर रिजर्व के निदेशक श्रीपति बी.एस. के अनुसार, यह सिर्फ बाघों तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि हाथियों और अन्य वन्य जीवों पर भी लागू होता है.
श्रीपति ने कहा, “बाघों की संख्या इसलिए बढ़ रही है क्योंकि हमने संरक्षण के लिए काफी प्रयास किए हैं, लेकिन एक सीमा के बाद जंगल की जमीन और नहीं बढ़ाई जा सकती.” उन्होंने कहा, “ऐसे में बाघों को न्यूनतम क्षेत्र की जरूरत होती है और वे गैर-संरक्षित इलाकों में भी जाएंगे, क्योंकि यह उनका स्वभाव है.”
यही टाइगर रिजर्व के आसपास मानव-वन्यजीव संघर्ष की सबसे बड़ी वजह भी है. इसके चलते पशुधन के शिकार की घटनाएं होती हैं और कुछ मामलों में लोग बदले में बाघों की हत्या तक कर देते हैं. ऐसा ही एक मामला 2025 की शुरुआत में कर्नाटक के एमएम हिल्स अभयारण्य में सामने आया था. झाला ने कहा कि अगर संरक्षित क्षेत्रों के बाहर वन्यजीवों को लेकर कोई योजना नहीं बनाई गई, तो ऐसी घटनाएं और ज्यादा हो सकती हैं. उन्होंने कहा कि नीति निर्माताओं को सबसे पहले भारतीय बाघों में “बहुलता की समस्या” पर सोचना शुरू करना होगा.
झाला ने कहा, “हमें सक्रिय रहकर स्थिति का प्रबंधन करना होगा, ताकि बाघों की आबादी को नियंत्रित किया जा सके. अगर घनत्व ज्यादा होगा, तो संघर्ष भी ज्यादा होगा, इसमें कोई दो राय नहीं है.”
इस बीच, 2025 में देशभर में कुल 167 बाघों की मौत दर्ज की गई. वहीं, 2026 के पहले हफ्ते में ही एनटीसीए की वेबसाइट पर छह बाघों की मौत दर्ज की जा चुकी हैं. खास बात यह है कि पिछले साल बाघों की मौत के 140 से अधिक मामले अब भी एनटीसीए द्वारा ‘जांच के अधीन’ बताए गए हैं, यानी मौत की वजह अभी साफ नहीं है.
यह पिछले दस वर्षों में ‘जांच के अधीन’ मामलों की सबसे ज्यादा संख्या है. हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इसे लेकर ज्यादा चिंता की जरूरत नहीं है.
झाला ने कहा, “जब तक वृद्धि दर सकारात्मक है, यानी जन्म, उनका जीवित रहना और वयस्क मौतों का संतुलन बना हुआ है, तब तक दर्ज की गई मौतों की वास्तविक संख्या मायने नहीं रखती.” उन्होंने कहा, “किसी भी जंगली जानवर की मौत को दर्ज करना मुश्किल होता है, क्योंकि ज्यादातर मामलों का पता ही नहीं चलता. इसलिए आधिकारिक आंकड़े इस बात पर निर्भर करते हैं कि कितने शव मिले, न कि वास्तव में कितने जानवर मरे.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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