scorecardresearch
Wednesday, 1 April, 2026
होमदेशन्यायालय ने मुआवजा जमा करने में देरी के लिए नियोक्ता पर जुर्माना लगाने का दायित्व तय किया

न्यायालय ने मुआवजा जमा करने में देरी के लिए नियोक्ता पर जुर्माना लगाने का दायित्व तय किया

Text Size:

नयी दिल्ली, तीन मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 के तहत मुआवजे की राशि जमा करने में देरी के लिए नियोक्ता पर जुर्माना लगाने का दायित्व तय करते हुए कहा कि कानून कर्मचारियों की शिकायतों के निवारण के लिए एक ‘‘सामाजिक कल्याण कानून’’ है।

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी बी वराले की पीठ ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने अपने कई निर्णयों में इस बात पर जोर दिया है कि यह अधिनियम एक सामाजिक कल्याणकारी कानून होने के नाते कर्मचारियों के पक्ष में ‘‘उदार एवं उद्देश्यपूर्ण व्याख्या’’ प्रस्तुत करता है।

पीठ ने एक बीमा कंपनी द्वारा दायर अपील पर अपना फैसला सुनाया जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के मई 2025 के आदेश को चुनौती दी गई थी।

उच्च न्यायालय ने अधिनियम की धारा 4ए(3)(बी) के तहत लगाए गए जुर्माने का भुगतान करने का दायित्व बीमा कंपनी पर तय कर किया था।

शीर्ष अदालत ने 23 फरवरी के अपने फैसले में कहा, ‘‘संबंधित कानून के उद्देश्यों के विवरण का अध्ययन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि उक्त कानून संसद द्वारा लाया गया एक सामाजिक कल्याण कानून है जिसका उद्देश्य रोजगार के दौरान या रोजगार के समय होने वाली दुर्घटनाओं के मामले में कर्मचारियों की शिकायतों का निवारण करना और उन्हें शीघ्रता से पर्याप्त मुआवजा प्रदान करना है।’’

इसने उल्लेख किया कि व्यावसायिक चालक के रूप में कार्यरत कर्मचारी की फरवरी 2017 में वाहन चलाते समय मृत्यु हो गई थी।

उसके कानूनी वारिसों ने दिल्ली सरकार के श्रम विभाग के आयुक्त के समक्ष 1923 के अधिनियम के तहत मुआवजे की मांग करते हुए एक याचिका दायर की थी।

नवंबर 2020 में, आयुक्त ने माना कि ‘‘नियोक्ता-कर्मचारी’’ संबंध मौजूद था और चूंकि मृत्यु रोजगार के दौरान तथा उसके क्रम में हुई थी, इसलिए नियोक्ता दावेदारों को मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी है।

आयुक्त ने ब्याज सहित मुआवजे की राशि 7,36,680 रुपये निर्धारित की थी।

यह उल्लेख करते हुए कि वाहन की एक वैध ‘बीमा पॉलिसी’ मौजूद थी और घटना पॉलिसी अवधि के दौरान हुई थी, आयुक्त ने नियोक्ता को उस मुआवजे की भरपाई करने का अधिकार दिया, जिसके लिए उसे बीमा कंपनी से दावा करके भुगतान करने के लिए उत्तरदायी ठहराया गया था।

शीर्ष अदालत ने गौर किया कि आयुक्त ने नियोक्ता को एक महीने के भीतर मुआवजा न देने पर कारण बताओ नोटिस भी जारी किया था जिसमें पूछा गया था कि जुर्माना क्यों न लगाया जाना चाहिए, जो मुआवजे के 50 प्रतिशत से अधिक न हो।

चूंकि नियोक्ता न तो आयुक्त के समक्ष उपस्थित हुआ और न ही कारण बताओ नोटिस का जवाब दाखिल किया, इसलिए आयुक्त ने फरवरी 2021 में नियोक्ता पर बिना किसी औचित्य के उचित समय के भीतर मुआवजे की राशि जमा करने में देरी करने के लिए 35 प्रतिशत का जुर्माना लगाया।

बाद में यह मामला उच्च न्यायालय में गया जिसने पिछले साल मई में आदेश पारित किया।

इसके बाद बीमा कंपनी ने अधिनियम के तहत जुर्माने के भुगतान के लिए दायित्व लागू करने के सीमित पहलू से असंतुष्ट होकर उच्चतम न्यायालय का रुख किया।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि बीमा कंपनी ने अधिनियम की धारा 4ए(3)(बी) के तहत मुआवजे और ब्याज घटक का भुगतान करने की अपनी जिम्मेदारी को निर्विवाद रूप से स्वीकार कर लिया है, जो कि मृत्यु की तारीख से भुगतान तक 7,36,680 रुपये और ब्याज के बराबर है।

इसने कहा कि धारा 4ए(3)(बी) का वर्तमान स्वरूप कर्मकार मुआवजा (संशोधन) अधिनियम, 1995 के माध्यम से मुख्य धारा में किए गए प्रतिस्थापन का परिणाम है, जो 15 सितंबर, 1995 को लागू हुआ था।

पीठ ने कहा, ‘‘अतः, जब कानून में ही नियोक्ता को एक महीने के भीतर भुगतान करने का दायित्व दिया गया है तो ऐसे दायित्व को किसी संविदात्मक दायित्व के अधीन या वैधानिक दायित्व को दरकिनार करने के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि ऐसा करना उक्त प्रावधान के अंतर्गत परिकल्पित विधायी आशय की अवहेलना के समान होगा।’’

अपील को स्वीकार करते हुए अदालत ने उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें बीमा कंपनी पर जुर्माना अदा करने का दायित्व लगाया गया था।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘नियोक्ता यानी प्रतिवादी संख्या 4 पर यह दायित्व है कि वह आयुक्त के दिनांक 8 फरवरी, 2021 के आदेशानुसार 2,57,838 रुपये का जुर्माना आज से आठ सप्ताह की अवधि के भीतर अदा करे।’’

भाषा नेत्रपाल नरेश

नरेश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

share & View comments