(फाइल फोटो के साथ)
नयी दिल्ली, पांच फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि चूंकि कल्याणकारी राज्य की अवधारणा सरकार पर अपने नागरिकों का सामाजिक और आर्थिक कल्याण सुनिश्चित करने का कर्तव्य डालती है, इसलिए उसकी भूमिका केवल कानून और व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्तियों के जीवन स्तर में सुधार करना भी उसमें शामिल है।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि इस उद्देश्य के मार्ग में सबसे बड़े खतरों में से एक है मुद्रास्फीति जो स्थायी ‘बुरी चीज’ बन गयी है क्योंकि यह क्रय शक्ति को लगातार कम करती है।
शीर्ष न्यायालय ने इस संदर्भ में कहा कि महंगाई भत्ता कल्याणकारी राज्य के हाथों में सुरक्षा के एक व्यावहारिक औजार के रूप उभरकर सामने आता है, जो अपने कर्मचारियों को बढ़ती कीमतों के प्रतिकूल प्रभावों से बचाता है।
पीठ ने कहा,‘‘कल्याणकारी राज्य की अवधारणा राज्य पर अपने नागरिकों के सामाजिक और आर्थिक कल्याण को सुनिश्चित करने का सकारात्मक कर्तव्य डालती है। राज्य की भूमिका केवल कानून व्यवस्था बनाए रखने या बाजारों को सुगम बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें ऐसी परिस्थितियां बनाना या सुगम बनाना भी शामिल है जिनमें व्यक्ति सुरक्षा, गरिमा और उचित जीवन स्तर के साथ जीवन यापन कर सकें।’’
उच्चतम न्यायालय की ये टिप्पणियां एक फैसले में आईं जिसमें उसने पश्चिम बंगाल सरकार को 2008-2019 की अवधि के लिए सरकारी कर्मचारियों को महंगाई भत्ते (डीए) का भुगतान करने का निर्देश दिया। उसने कहा कि यह एक कानूनी रूप से लागू करने योग्य अधिकार है।
शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि महंगाई भत्ता (डीए) मुद्रास्फीति के प्रभाव को बेअसर करने के लिए बनाया गया है। पीठ ने कहा कि जब आवश्यक वस्तुओं की लागत बढ़ती है, तो वेतन, जो इसका हिसाब नहीं रखते और बीते युग के बने रहते हैं, अक्सर बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में विफल रहते हैं, जिससे जीवन स्तर में गिरावट आती है।
पीठ ने कहा, ‘‘जीवनयापन की लागत में बदलाव के अनुरूप वेतन में समय-समय पर समायोजन करके, राज्य यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि रोजगार से आर्थिक सुरक्षा मिलती रहे। यह कल्याणकारी राज्य की एक प्रमुख चिंता को दर्शाता है कि उसके कर्मचारियों को उनके नियंत्रण से परे आर्थिक ताकतों के कारण कठिनाई में न धकेला जाए। दूसरे शब्दों में, महंगाई भत्ता कोई अतिरिक्त लाभ नहीं है, बल्कि न्यूनतम जीवन स्तर बनाए रखने का एक साधन है।’’
भाषा राजकुमार नरेश
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