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Sunday, 22 March, 2026
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प्रधान न्यायाधीश ने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून पर सुनवाई से खुद को किया अलग

सुझाव को स्वीकार करते हुए, प्रधान न्यायाधीश ने निर्देश दिया कि मामले को 7 अप्रैल के लिए एक अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए और संकेत दिया कि नयी पीठ में ऐसे न्यायाधीश शामिल होंगे जो प्रधान न्यायाधीश का पद ग्रहण करने के क्रम में शामिल नहीं हैं.

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नई दिल्ली: प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए जिम्मेदार एक चयन समिति से प्रधान न्यायाधीश को हटाने संबंधी 2023 के एक कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई से शुक्रवार को स्वयं को अलग कर लिया.

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘मुझ पर हितों के टकराव का आरोप लगाया जाएगा. इसमें हितों का टकराव है.’’

न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली भी पीठ में शामिल हैं.

यह पीठ मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के कुछ प्रावधानों की वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है.

यह सुनवाई इस आधार पर की जा रही है कि उक्त कानून ने प्रधान न्यायाधीश को मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए जिम्मेदार चयन समिति से बाहर रखा है.

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि इस मामले की सुनवाई ऐसी पीठ द्वारा करना उपयुक्त होगा, जिसमें कोई भी न्यायाधीश प्रधान न्यायाधीश बनने के क्रम में शामिल न हों.

याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने प्रधान न्यायाधीश के इस विचार का समर्थन किया.

उन्होंने सुझाव दिया कि पक्षपात की आशंका से बचने के लिए इस मामले को किसी ऐसी पीठ के समक्ष रखा जाए, जिसके सदस्य कोई भावी प्रधान न्यायाधीश न हों.

भूषण ने कहा, ‘‘व्यक्तिगत रूप से मुझे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इसे किसी ऐसी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जा सकता है जिसके सदस्य कोई भावी प्रधान न्यायाधीश न हों.’’

सुझाव को स्वीकार करते हुए, प्रधान न्यायाधीश ने निर्देश दिया कि मामले को 7 अप्रैल के लिए एक अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए और संकेत दिया कि नयी पीठ में ऐसे न्यायाधीश शामिल होंगे जो प्रधान न्यायाधीश का पद ग्रहण करने के क्रम में शामिल नहीं हैं.

दिसंबर 2023 में संसद द्वारा पारित यह कानून, उच्चतम न्यायालय के उस ऐतिहासिक फैसले के कुछ महीनों बाद आया, जिसमें शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया था कि निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता (या लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता) और प्रधान न्यायाधीश की सदस्यता वाली एक समिति द्वारा की जाए.

न्यायालय ने कहा था कि जब तक कोई नया कानून पारित नहीं हो जाता, यह व्यवस्था लागू रहेगी.

इस कानून को कांग्रेस नेता जया ठाकुर और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) सहित कई याचिकाकर्ताओं ने चुनौती दी है.

मार्च 2023 में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने फैसला सुनाया था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधान न्यायाधीश की सदस्यता वाली एक समिति के परामर्श पर की जाएगी.

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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