मुंबई: दो दशकों की दूरी के बाद, ठाकरे चचेरे भाई उद्धव और राज ने बुधवार को महाराष्ट्र भर में होने वाले नगर निगम चुनावों से पहले औपचारिक रूप से एक चुनावी गठबंधन किया.
यह गठबंधन दोनों ठाकरे नेताओं के लिए एक अहम कसौटी होगा, क्योंकि उनकी पार्टियां अस्तित्व के संकट का सामना कर रही हैं. शिवसेना की जन्मभूमि मुंबई हमेशा से ठाकरे परिवार की राजनीतिक सोच में खास जगह रखती रही है. पार्टी ने पहली बार 1985 में बृहन्मुंबई नगर निगम में सत्ता हासिल की थी और फिर 1997 से 2022 तक देश की सबसे अमीर नगर निकाय पर लगातार शासन किया.
2017 तक भाजपा शिवसेना गठबंधन का हिस्सा रही. हालांकि, उसी साल पार्टी ने अलग चुनाव लड़ा और एक मजबूत चुनौती पेश की.
इस बार, टूटी हुई शिवसेना और फिर से उभरती भाजपा के बीच, ठाकरे अब तक की अपनी सबसे कठिन चुनावी लड़ाई का सामना कर रहे हैं. उद्धव पारंपरिक मराठी वोटबैंक के साथ-साथ उन मुस्लिम मतदाताओं पर भरोसा कर रहे हैं, जिन्होंने लोकसभा चुनावों में शिवसेना (यूबीटी) का समर्थन किया था.
ठाकरे, पवारों के साथ, महाराष्ट्र के सबसे पुराने राजनीतिक वंशों में गिने जाते हैं. ठाकरे परिवार पर एक नज़र.
प्रबोधनकर ठाकरे (1885–1973)
केशव सीताराम ठाकरे के रूप में जन्मे, वे एक समाज सुधारक, समाजवादी, लेखक और राजनेता के रूप में उभरे, जिन्होंने छुआछूत, अंधविश्वास, दहेज और बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई लड़ी. उन्होंने मराठी पत्रिका प्रबोधन (अर्थात जागरण) की स्थापना की, जिसने बाद में उन्हें “प्रबोधनकर” नाम दिलाया.
ब्राह्मणवादी वर्चस्व के कट्टर आलोचक रहे प्रबोधनकर का राजनीतिक जुड़ाव तब और गहरा हुआ, जब वे संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल हुए. इस आंदोलन में वे भाषा के आधार पर मुंबई को महाराष्ट्र का हिस्सा बनाए रखने की वकालत कर रहे थे. उन्होंने बाल ठाकरे के संगठन के लिए “शिव सेना” नाम दिया.
उनके आठ बच्चे थे—बाल ठाकरे, उनके छोटे भाई श्रीकांत और रमेश और पांच बेटियां. उनकी बेटियों में से संजीवनी करंदीकर का बाल ठाकरे से गहरा रिश्ता था और उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक में काम किया.
ठाकरे परिवार के करीबी एक शिव सेना पदाधिकारी ने कहा, “उद्धव ठाकरे अपने दादा के पदचिह्नों पर चल रहे हैं और शिव सेना को सुधारवादी रास्ते पर ले जाना चाहते हैं.”
बाल ठाकरे (1926–2012)
प्रबोधनकर के सबसे बड़े बेटे ने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत अंग्रेज़ी दैनिक फ्री प्रेस जर्नल में पत्रकार के रूप में की, जहां वे राजनीतिक व्यंग्यात्मक कार्टून बनाते थे. बाद में उन्होंने अपनी खुद की राजनीतिक साप्ताहिक पत्रिका मार्मिक शुरू की, जिसके ज़रिए उन्होंने मराठी मानूस से जुड़े मुद्दों और मुंबई के रोजगार क्षेत्र में गैर-मराठियों के बढ़ते प्रभाव को उजागर किया.
अपने उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने 1966 में शिवसेना की स्थापना की.
पार्टी की पहली सार्वजनिक सभा उसी साल अक्टूबर में दशहरे के दिन प्रतिष्ठित शिवाजी पार्क मैदान में हुई.
वरिष्ठ शिव सैनिक सुभाष देसाई ने उस दिन के बारे में दिप्रिंट से कहा था, “उनके एक सलाहकार शिवाजी पार्क में सभा करने के खिलाफ थे, उन्हें डर था कि मैदान भरेगा नहीं, लेकिन बालासाहेब ने कहा, ‘जो होना है, उसी मैदान में होने दो, कम से कम इससे मुझे पता चल जाएगा कि मैं सही हूं या गलत.’”
सभी उम्मीदों के विपरीत, मैदान समर्थकों से भर गया, जिससे मराठी मानूस के दिल में बाल ठाकरे की जगह पक्की हो गई. इसके बाद हर साल दशहरा रैली की परंपरा शुरू हो गई.
मराठी मुद्दों की पैरवी से आगे बढ़ते हुए, उन्होंने मराठी युवाओं को सरकारी परीक्षाओं की तैयारी और रोजगार दिलाने में मदद के लिए लोकाधिकार समिति की स्थापना की.
1980 के दशक में शिव सेना की राजनीति में बदलाव आया और पार्टी मराठी अस्मिता की राजनीति से हिंदुत्व की ओर मुड़ गई. 1992–93 के मुंबई दंगों के बाद, बाल ठाकरे ने सख्त हिंदुत्व रुख अपनाया. धर्म के नाम पर वोट मांगने के आरोप में 1990 के दशक के अंत में उन्हें छह साल के लिए मतदान करने और चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया.
1988 में उन्होंने मराठी दैनिक सामना की स्थापना की, जो आज भी पार्टी का मुखपत्र है.
अपने रंगीन व्यक्तित्व के लिए जाने जाने वाले ठाकरे सिगार पीने और रेड वाइन पसंद करने के लिए मशहूर थे. उनका दावा था कि रेड वाइन दिल के लिए फायदेमंद होती है और वे इन आदतों को कभी छिपाते नहीं थे.
अपने शिखर काल में, मुंबई और भारत आने वाले कई गणमान्य लोग—जिनमें एल.के. आडवाणी और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता भी शामिल थे, उनके घर मातोश्री जाकर उनसे मुलाकात करते थे.
मीना ठाकरे से विवाह के बाद उनके तीन बेटे हुए—बिंदुमाधव (सबसे बड़े), जयदेव और उद्धव (सबसे छोटे). नवंबर 2012 में उनका निधन हो गया.

उद्धव ठाकरे
बाल ठाकरे के सबसे छोटे बेटे उद्धव ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत संभाली. पेशे से फोटोग्राफर रहे उद्धव को 1990 के शुरुआती वर्षों में अनिच्छा से शिव सेना की राजनीति में लाया गया, जहां वे पर्दे के पीछे से संगठन का काम संभालते थे.
2003 में बाल ठाकरे ने उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष घोषित किया, जिससे यह संकेत मिला कि पार्टी की विरासत आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उद्धव को दी जा रही है—इस फैसले से उद्धव और उनके चचेरे भाई राज के रिश्तों में कड़वाहट आ गई.
2003 के बाद से उद्धव ने पार्टी मामलों में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की. पिता के निधन के बाद वे शिव सेना के प्रमुख बने रहे.
महाराष्ट्र की प्रमुख क्षेत्रीय ताकत और भाजपा की राजनीतिक सहयोगी रही शिव सेना में 2014 के विधानसभा चुनावों के दौरान दरार पड़ी—ये बाल ठाकरे के निधन के बाद पहले चुनाव थे. अलगाव के बावजूद, शिव सेना ने अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और 288 सदस्यीय विधानसभा में 63 सीटें जीतीं.
इसके बाद दोनों दलों ने राज्य चलाने के लिए चुनाव बाद गठबंधन बनाया, लेकिन आपसी खींचतान जारी रही. 2017 में उन्होंने पहली बार बीएमसी चुनाव अलग-अलग लड़े—यह पार्टी प्रमुख के रूप में उद्धव का पहला नगर निकाय चुनाव था.
2019 में कथित ढाई साल के मुख्यमंत्री पद के वादे को लेकर, जिससे भाजपा इनकार करती है, रिश्ते पूरी तरह टूट गए. यहीं भाजपा-शिव सेना साझेदारी का अंत हो गया.
इसके बाद उद्धव ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर महाविकास अघाड़ी सरकार बनाई और मुख्यमंत्री बने, इस पद पर पहुंचने वाले वे पहले ठाकरे बने.
लेकिन जून 2022 में हालात पलट गए, जब भरोसेमंद सहयोगी एकनाथ शिंदे ने पार्टी में लंबवत विभाजन करा दिया.
2024 के विधानसभा चुनावों में उद्धव की सेना को 288 में से सिर्फ 20 सीटें मिलीं—यह पार्टी का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा.
शांत स्वभाव के माने जाने वाले उद्धव का वैचारिक रुख और नेतृत्व शैली उनके पिता से अलग है, जो बिना लाग-लपेट के बोलने और गरजदार भाषणों के लिए जाने जाते थे.
उद्धव की शादी रश्मि ठाकरे से हुई है. उनके दो बेटे हैं—आदित्य, जो राजनीति में सक्रिय हैं और वर्तमान में विधायक हैं और तेजस, जो वन्यजीव अनुसंधान में लगे हैं और ठाकरे फाउंडेशन चलाते हैं.
बिंदुमाधव ठाकरे
बाल ठाकरे के सबसे बड़े बेटे की 1990 के दशक में एक कार दुर्घटना में मृत्यु हो गई. उनके एक बेटे निहार ठाकरे हैं, जो पेशे से वकील हैं.
जयदेव ठाकरे
बाल ठाकरे के दूसरे बेटे जयदेव की तीन शादियां हुई हैं. उनकी पहली पत्नी जयश्री कालेकर थीं, जो एक मराठी साहित्यकार की बेटी थीं. 1990 के दशक में दोनों का तलाक हो गया, जिसके बाद जयदेव के ठाकरे परिवार से रिश्ते बिगड़ने लगे. पहली शादी से उनका एक बेटा है.
बाद में जयदेव ने फिल्म निर्माता स्मिता ठाकरे से शादी की, जो अब एनजीओ मुक्ति फाउंडेशन चलाती हैं. उनके दो बच्चे हैं—एक बेटा और एक बेटी. 1996 में मां मीना ठाकरे के निधन के बाद जयदेव मातोश्री से बाहर चले गए, लेकिन स्मिता 2004 में तलाक फाइनल होने तक वहीं रहीं.
अब उनकी शादी अनुराधा ठाकरे से है, जिनसे उनकी एक बेटी है. जयदेव एक चित्रकार हैं और माना जाता है कि बाल ठाकरे से तनावपूर्ण रिश्तों के कारण वे राजनीति से दूर रहे.
श्रीकांत ठाकरे (1930–2003)
प्रबोधनकर के बेटे और राज ठाकरे के पिता श्रीकांत कला और संगीत—दोनों में निपुण थे. वे मुख्य रूप से संगीतकार थे, साथ ही लेखक और पत्रकार के रूप में भी काम किया और वायलिन बजाते थे.
वे बाल ठाकरे द्वारा स्थापित पत्रिका मार्मिक के संपादक बने. स्वतंत्र रूप से संगीत में कदम रखने से पहले श्रीकांत ने मुंबई में ऑल इंडिया रेडियो में कुछ समय काम किया. संगीतकार के रूप में उन्होंने ग़ज़लें रचीं और मोहम्मद रफ़ी जैसे कलाकारों के साथ काम किया.
उन्होंने कुंदा ठाकरे से शादी की, जो बाल ठाकरे की पत्नी मीना ठाकरे की बहन थीं. 2003 में उनका निधन हो गया.
राज ठाकरे
श्रीकांत ठाकरे के बेटे राज ने कम उम्र में ही राजनीति में प्रवेश किया और बाल ठाकरे के बेहद करीबी रहे, इतने कि कई लोगों को लगता था कि वही बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत संभालेंगे. वे कम उम्र से ही शिव सेना के कामकाज में सक्रिय रहे.
लेकिन 2003 में जब उद्धव को शिव सेना का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया, तो राज खुद को उपेक्षित महसूस करने लगे. उन्होंने 2004 में पार्टी छोड़ दी और 2006 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) की स्थापना की.
पार्टी ने काफी ध्यान खींचा. 2009 के पहले विधानसभा चुनाव में उसने 13 सीटें जीतीं और अपने शिखर पर नासिक नगर निगम में सत्ता हासिल की. हालांकि, 2014 के बाद से पार्टी का प्रभाव कम होता गया.

राज अपने राजनीतिक रुख में बार-बार बदलाव के लिए जाने जाते हैं. 2019 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्ष का समर्थन किया, लेकिन बाद में मोदी की सराहना और समर्थन करने लगे. उन्होंने सख्त हिंदुत्व की भाषा अपनाई, जो 2024 तक जारी रही, फिर उन्होंने मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन दिया, लेकिन कुछ ही समय बाद फिर उनकी आलोचना शुरू कर दी.
आज उनकी पार्टी किसी तरह अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश कर रही है. उनकी शादी मराठी सिनेमा के एक फोटोग्राफर की बेटी शर्मिला ठाकरे से हुई है. उनके दो बच्चे हैं—बेटा अमित, जो राजनीति में हैं, और बेटी उर्वशी, जो फैशन इंडस्ट्री में काम करती हैं.
आदित्य ठाकरे
वर्ली से विधायक आदित्य को 2010 में 20 साल की उम्र में उनके दादा ने एक सार्वजनिक रैली में युवा सेना—पार्टी की युवा इकाई, का प्रमुख नियुक्त किया. युवा सेना कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर काम करती है.
2019 में आदित्य विधानसभा चुनाव लड़ने वाले पहले ठाकरे बने और आसानी से जीत दर्ज की. महाविकास अघाड़ी सरकार में उन्होंने पर्यटन और पर्यावरण मंत्री के रूप में काम किया. वे शहरी मुद्दों, पर्यावरण, शिक्षा और शहर नियोजन पर अक्सर बोलते हैं.
2024 में वे कम अंतर से फिर चुने गए और उन्हें शिव सेना के लिए मुंबई नगर निगम जीतने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
तेजस ठाकरे
उद्धव के छोटे बेटे तेजस एक संरक्षणवादी और वन्यजीव शोधकर्ता हैं और ठाकरे वाइल्डलाइफ फाउंडेशन चलाते हैं. वे और उनका फाउंडेशन कई वन्यजीव प्रजातियों की खोज में शामिल रहे हैं.
उनके नाम एक केकड़ा, एक सांप और एक गेको परिवार के नाम पर रखे गए हैं. उनकी ताजा खोज महाराष्ट्र के तिलारी वन क्षेत्र में पाई गई एक नई प्रजाति, एक रोएंदार घोंघा है.
वे राज्य का दौरा करते रहते हैं और सह्याद्रियों से लेकर पूर्वी घाट, अरुणाचल प्रदेश, अंडमान, इंडोनेशिया और कई अन्य स्थानों तक यात्रा कर चुके हैं.
हालांकि, वे राजनीतिक महत्वाकांक्षा से इनकार करते हैं, फिर भी वे नियमित रूप से शिव सेना की दशहरा रैलियों और अन्य महत्वपूर्ण पार्टी कार्यक्रमों में शामिल होते हैं, जिससे भविष्य में राजनीति में प्रवेश की अटकलें लगती रहती हैं.
अमित ठाकरे
राज ठाकरे के बेटे अमित मनसे के कामकाज में सक्रिय हैं. उन्होंने 2024 में अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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