नयी दिल्ली, 29 जनवरी (भाषा) नियम आधारित व्यापार के लिए दायरा सीमित होने, प्रवासी विरोधी रुख, ऊर्जा संसाधनों को हथियार की तरह इस्तेमाल किये जाने और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निर्यात नियंत्रणों के बढ़ते उपयोग के मद्देनजर भारत को स्थायी राष्ट्रीय क्षमताओं और आर्थिक संप्रभुता के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। यह बात बृहस्पतिवार को आर्थिक समीक्षा में कही गई।
इसमें कहा गया है कि एक ऐसी दुनिया में जहां आर्थिक संबंध तेजी से रणनीतिक और प्रतिस्पर्धी होते जा रहे हैं, सीखने की क्षमता नीति निर्माण का एक मूल तत्व बन जाती है, ऐसे में भारत को चुनौतीपूर्ण भू-राजनीतिक परिदृश्य से निपटने के लिए स्थायी राष्ट्रीय क्षमताओं का निर्माण करना होगा।
यह आकलन अमेरिका के ट्रंप प्रशासन की व्यापार, शुल्क और आव्रजन संबंधी नीतियों, महत्वपूर्ण खनिजों से संबंधित चीन के निर्यात नियंत्रण उपायों और रूस के साथ भारत के ऊर्जा संबंधों को लेकर पश्चिमी देशों में बढ़ती बेचैनी की पृष्ठभूमि में आया है।
संसद में पेश की गयी आर्थिक समीक्षा 2025-26 में भू-राजनीतिक और आर्थिक उथल-पुथल का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि रणनीतिक प्रतिस्पर्धा व्यापार टकरावों को तेजी से बढ़ावा दे रही है, जबकि राष्ट्र महत्वपूर्ण खनिजों और तकनीकी संसाधनों तक पहुंच के लिए इस तरह से होड़ कर रहे हैं जो ‘एक नए औपनिवेशिक संघर्ष की याद दिलाता है।’’
इसमें कहा गया है कि हाल के अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि ‘आर्थिक परस्पर निर्भरता, जिसे कभी पारस्परिक स्थिरता के स्रोत के रूप में देखा जाता था, अब एक ऐसे माध्यम के रूप में देखी जा रही है जिससे जोखिम या नुकसान हो सकता है।’’
इसमें कहा गया है कि विभिन्न क्षेत्रों में, सांस्कृतिक श्रेष्ठता के दावों और अप्रवासी-विरोधी रुख पर आधारित अति-राष्ट्रवाद का पुनरुत्थान, राजनीतिक और नीतिगत विकल्पों को तेजी से प्रभावित कर रहा है।
इसमें कहा गया है, ‘‘यह बदलाव बहुपक्षीय सहयोग और नियम-आधारित व्यापार के दायरे को सीमित कर रहा है, साथ ही घरेलू सीमाओं को सख्त बना रहा है और श्रम गतिशीलता को बाधित कर रहा है। कुल मिलाकर, इसने आर्थिक रणनीतियों को आंतरिक प्राथमिकताओं की ओर पुनर्निर्देशित कर दिया है।’’
समीक्षा में कहा गया है कि देश मुक्त व्यापार और बहुपक्षीय संस्थानों के प्रति संशयवादी होने लगे हैं और माना जाता है कि यह बड़े और केंद्रित वैश्विक व्यापार असंतुलन का कारण बना है।
समीक्षा में चीन द्वारा अपनी बेल्ट एंड रोड पहल के माध्यम से अन्य देशों में बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए अपनी वित्तीय शक्ति का उपयोग करने पर भी चिंता व्यक्त की गई है। इसमें कहा गया है कि इसका उद्देश्य बीजिंग के ‘व्यापार और आर्थिक प्रभुत्व’ को बढ़ाना है।
इसमें कहा गया है, कि इस पृष्ठभूमि में, पिछले दशक में भारत के सुधारों और आर्थिक प्रदर्शन ने इसे प्रासंगिक और लचीला बने रहने में मदद की है, जिससे यह बाहरी आर्थिक दबावों और कूटनीति का सामना करने और उनसे तालमेल बिठाने में सक्षम है, बिना किसी बड़े व्यवधान के।
इसमें कहा गया है, ‘अब हमें एक कदम और आगे बढ़कर ऐसी रणनीतिक अनिवार्यता विकसित करने पर ध्यान देना होगा, जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की अहमियत अपरिहार्य बन सके।’’
समीक्षा में कहा गया है कि आज की बंटी हुई वैश्विक अर्थव्यवस्था में बिना किसी पर निर्भर हुए सीखने की क्षमता एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक कौशल बन गई है। इसमें कहा गया है कि स्वदेशी अब अपरिहार्य और आवश्यक हो गया है।
समीक्षा में कहा गया है कि समाधान आर्थिक संप्रभुता को सुदृढ़ करने वाली स्थायी राष्ट्रीय क्षमताओं के निर्माण में निहित है।
इसमें कहा गया है, ‘नीतिगत प्रश्न अब यह नहीं है कि देश को स्वदेशी को प्रोत्साहित करना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि दक्षता, नवाचार या वैश्विक एकीकरण को कमजोर किए बिना ऐसा कैसे किया जाए।’’
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अमित नरेश
नरेश
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