Saturday, 20 August, 2022
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लॉकडाउन के दौरान 55% लोगों को डर था कि पुलिस उन्हें पीटेगी लेकिन अब भरोसा बढ़ा: सर्वे

लॉकडाउन के दौरान देश की पुलिस व्यवस्था पर सीएसडीएस की एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ‘लॉकडाउन के कारण आम तौर पर सबसे ज्यादा मुश्किलों का सामना’ गरीबों, दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों आदि को करना पड़ा.

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नई दिल्ली: भारत में पुलिसिंग व्यवस्था पर एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साल लॉकडाउन के दौरान लगभग 55 प्रतिशत भारतीयों को डर था कि पुलिस उन्हें पीट देगी और उस समय पुलिस का रवैया भी ‘गरीबों, दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों जैसे वंचित समूहों के प्रति अपेक्षाकृत कठोर ही था.’

भारत में पुलिसिंग की स्थिति रिपोर्ट 2020-21: कोविड-19 महामारी में पुलिसिंग, शीर्षक वाली यह रिपोर्ट सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) ने दिल्ली स्थित एक गैर-लाभकारी संस्था कॉमन कॉज इंडिया के सहयोग से तैयार की है.

इसे 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के टियर-1, टियर-2 और टियर-3 शहरों में रहने वाले लोगों और पुलिसकर्मियों के बीच एक सर्वेक्षण के आधार पर तैयार किया गया है. हालांकि, सर्वेक्षण पूल का सटीक ब्योरा उपलब्ध नहीं है. यह डेटा अक्टूबर-नवंबर 2020 के दौरान जुटाया गया था.

सोमवार को जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘लॉकडाउन के दौरान लागू सख्त पाबंदियों के मामूली उल्लंघन के मामलों में भी पुलिस की तरफ से बल प्रयोग और पुलिस बर्बरता की खबरें सामने आती रही थीं. यह निश्चित तौर पर पुलिस और लोगों के बीच टकराव का कारण भी बना.’

इसमें बताया गया है कि 57 फीसदी लोगों को लॉकडाउन के दौरान जुर्माना लगाए जाने की आशंका थी.

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इसके अलावा गरीबों, दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों को ‘लॉकडाउन के कारण आम तौर पर ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ा और उनके लिए भोजन या राशन जैसी आवश्यक चीजों को जुटाना तक कठिन हो गया था.’

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘…उन्हें किराये के घरों से निकाले जाने की आशंकाएं भी अधिक थीं. जैसा कि निष्कर्षों से भी जाहिर है कि इस अवधि के दौरान पुलिस की तरफ से भेदभाव के कारण उनकी मुश्किलें और बढ़ गई थीं.’

हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन के बाद पुलिस की छवि में सुधार हुआ है और उस पर भरोसे का स्तर भी बढ़ा है.

रिपोर्ट जारी किए जाने के मौके पर पूर्व गृह सचिव जी. पिल्लई ने कहा, ‘यह इस बात को दिखाती है कि अतीत में पुलिस कैसा व्यवहार करती रही है. महामारी हो या सामान्य समय, कोई बड़ा अंतर नहीं होता है.’


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प्रमुख निष्कर्ष

रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन के दौरान अन्य वर्गों की तुलना में आय के स्तर के आधार पर समाज के निचले वर्ग के लोगों को पुलिस से अधिक डर था, जिसमें पुलिस की तरफ से शारीरिक हिंसा के शिकार बनने की आशंका भी शामिल थी.

इसके अलावा, 49 प्रतिशत पुलिसकर्मियों ने प्रवासी मजदूरों के खिलाफ बल प्रयोग किए जाने की जानकारी दी, वहीं 33 प्रतिशत ने आश्रयस्थलों में प्रवेश की कोशिश करने वालों पर बल प्रयोग की बात कही.

जहां 59 फीसदी प्रवासी कामगार और 61 फीसदी राहतकर्मी लॉकडाउन के दौरान पुलिस के व्यवहार से संतुष्ट थे, वहीं दोनों समूहों की राय थी कि ‘अत्यधिक बल’ प्रयोग किया गया था.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ‘एक-तिहाई से अधिक राहत कर्मियों का मानना है कि पुलिस ने लॉकडाउन के दौरान बेघर लोगों, झुग्गीवासियों और प्रवासी श्रमिकों के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया.’

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘दो में से एक सहायता कर्मी का यह भी कहना है कि पुलिस ने लॉकडाउन के दौरान मुसलमानों के साथ भेदभाव किया, जिसमें 50 प्रतिशत ने उच्च या मध्यम स्तर के भेदभाव की सूचना दी.’

हालांकि, हर पांच में से तीन राहतकर्मियों ने यह भी कहा कि पुलिस ने लॉकडाउन के दौरान राशन और भोजन के वितरण में काफी मदद की.’

लॉकडाउन के दौरान पुलिसकर्मियों के लिए काम करने की स्थिति के संदर्भ में इस रिपोर्ट में कहा गया है कि टियर-1 शहरों में काम करने वालों को टियर-2 और टियर-3 शहरों की तुलना में बेहतर सुविधाएं मिलीं.

अध्ययन में यह पाया गया कि महामारी ने पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी काफी गहरा असर डाला, हर 10 में से नौ ने कहा कि वे संकट से प्रभावित हुए.


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‘इससे इनकार नहीं कर सकते कि मुसलमानों को निशाना बनाया गया’

रिपोर्ट लॉन्च के मौके पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश दीपक गुप्ता ने कहा, ‘हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली, 1861 पुलिस अधिनियम और आपराधिक प्रक्रिया— पूरी प्रणाली ही अमीर और शक्तिशाली लोगों का पक्ष लेने वाली है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘मुसलमानों और महामारी के संदर्भ में यह केवल पुलिस नहीं थी बल्कि निजामुद्दीन की घटना के बाद आम लोग और मीडिया भी ऐसा करता नजर आया. उच्च पदों पर बैठे लोगों ने मुसलमानों के बारे में ऐसी बातें कही जो उन्हें नहीं कहनी चाहिए थीं. यह एक तरह का टकराव था और इसे शुरुआत में ही ठीक किया जाना चाहिए था. हम इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकते कि उन्हें निशाना बनाया गया था.’

हालांकि, तेलंगाना के पूर्व पुलिस महानिदेशक ईश कुमार ने इस बात को रेखांकित किया कि कुछ समुदायों के प्रति पुलिस का रवैया जानबूझकर भेदभावपूर्ण नहीं होता है.

कुमार ने कहा, ‘ऐसा शायद इसलिए भी होता है कि क्योंकि जमीनी स्तर पर यही लोग ज्यादा नजर आते हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई हो जाती है. मुझे नहीं लगता कि कोई कार्रवाई करने से पहले यह पता लगाने की कोशिश करता है कि कोई एसटी, एससी या ओबीसी है.’

उन्होंने कहा, ‘हालांकि, पुलिस को लेकर महामारी के दौरान डर की भावना कोई नई नहीं है. इनमें कुछ मुद्दे तो सदियों पुराने हैं. संवेदनशीलता की कमी, सेवा के प्रति रुख और पूर्वाग्रह पूर्ण रवैया, डंडा संस्कृति में भरोसा करना और लोकतांत्रिक मूल्यों और जवाबदेही का अभाव आदि ऐसे मुद्दे हैं जिनमें सुधार करने की जरूरत है.’

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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