गढ़चिरौली: माओवादी आंदोलन के देश में लगभग खत्म होने के पीछे कुछ बड़े कारण थे जैसे सेना का राजनीतिक नेतृत्व पर हावी होना, बाहर की दुनिया में हो रहे लगातार बदलावों के साथ खुद को ढालने में असफल रहना, और दिशा की कमी. यह बात उनके राजनीतिक विंग के पूर्व प्रमुख मल्लुजोला वेणुगोपाल ने कही.
एक इंटरव्यू में, वेणुगोपाल, जिन्हें ‘अभय’ और ‘सोनू’ के नाम से भी जाना जाता था, ने कहा कि आंदोलन अपने मूल सिद्धांत से भटक गया था, जिसमें कहा गया था कि पार्टी को सेना को दिशा देनी चाहिए.
उन्होंने कहा, “दुनिया में जो बदलाव हो रहे थे, वो एक तरफ थे और हम दूसरी तरफ. हम दुनिया के बदलावों के उलट चल रहे थे, और इसी वजह से आंदोलन लगभग खत्म हो गया.” उन्होंने यह बात गढ़चिरौली जिला पुलिस मुख्यालय में कही, जहां वे महाराष्ट्र पुलिस की निगरानी में रह रहे हैं.
यह पुलिस मुख्यालय शहर के बीच में है, जहां कई इमारतें हैं, जिनमें से एक में सी-60 कमांडो रहते हैं, जिनकी भूमिका राज्य के एंटी-नक्सल अभियान में बहुत अहम रही है.
सोनू ने पिछले साल अक्टूबर में गढ़चिरौली जिले में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और अन्य अधिकारियों के सामने 60 अन्य माओवादी साथियों के साथ आत्मसमर्पण किया था. वह पॉलिटब्यूरो के पहले सदस्य हैं जिन्होंने ऐसा किया.
वह उन 96 माओवादी कैडर में से एक हैं जिन्हें पुलिस ने अपने केंद्रों में रखा है, जब तक उनके कागजात और आर्थिक पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती.
उन्होंने आगे कहा, “राजनीति को सेना को दिशा देनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सेना का पार्टी के फैसलों पर बिना घोषित नियंत्रण हो गया, जिससे आज की स्थिति बनी.”
सोनू ने कहा कि देश की आर्थिक स्थिति, खासकर मर जैसे क्षेत्रों में जिसमें बस्तर शामिल है, जो पहले बहुत पिछड़े थे, अब सामंती व्यवस्था से बदलकर बाजार आधारित अर्थव्यवस्था बन गए हैं.
उन्होंने कहा, “मैंने देखा है कि गढ़चिरौली के आदिवासी किसान चावल 30-40 रुपये प्रति किलो में बाजार में बेच रहे हैं, और फिर अच्छा चावल खरीद रहे हैं. हम दुनिया में हो रहे बदलावों को देख रहे थे, उनके बारे में लिख रहे थे और रूस और अमेरिका में हो रहे बदलावों का विश्लेषण कर रहे थे. लेकिन हम इसे पार्टी में लागू नहीं कर पाए.”
उन्होंने कहा, “मुझे समझ में आया कि अब देश में सशस्त्र आंदोलन जारी नहीं रखा जा सकता, क्योंकि हालात बहुत बदल गए हैं, भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में. जैसे एलपीजी नीति, यानी उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण, पहले दुनिया में आई और बाद में भारत में लागू हुई. हम इन बदलावों को समझने में पीछे रह गए.”
उन्होंने कहा, “हम बदलाव देख रहे थे, उस पर चर्चा कर रहे थे, लेकिन उसे लागू नहीं कर पाए.”
‘22 पेज का ड्राफ्ट’
सोनू जब 1984 में एक कमांडर के रूप में यहां आए थे, तब गढ़चिरौली देश के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक था, लेकिन अब यहां काफी बदलाव आ चुका है.
जब उनसे पूछा गया कि क्या वह अपने घर वापस जाना चाहते हैं, तो उन्होंने रुककर कहा, “यह पुलिस और उनके फैसले पर निर्भर करता है.” वह खबरें देखते हैं, अखबार पढ़ते हैं और बस्तर, तेलंगाना और देश के अन्य हिस्सों में हो रही घटनाओं में रुचि लेते हैं. पहले भी उनका काम राजनीतिक रणनीति बनाना और बाहरी दुनिया का विश्लेषण करना था, जिसके लिए उन्हें काफी पढ़ना पड़ता था.
सोनू ने कहा कि आत्मसमर्पण के बाद उनकी भूमिका बदल गई है. अब वह अपने साथ रह रहे कैडर्स की मदद करते हैं, जैसे अस्पताल ले जाना और उनकी जरूरतों के लिए अधिकारियों से बात करना.
उनका आत्मसमर्पण गढ़चिरौली में हुआ, जहां से उनका माओवादी जीवन शुरू हुआ था. वह पॉलिटब्यूरो के पहले सदस्य थे जिन्होंने पिछले साल अक्टूबर में सरकार के सामने आत्मसमर्पण किया, जिसके बाद उन्हें साथी नेता थिप्पिरी तिरुपति यानी देवुजी ने गद्दार कहा.
सोनू ने कहा, “मुझे गद्दार कहा गया.” उन्होंने कहा कि उनके इस कदम से कई माओवादी साथियों की जान बची, जो उनके नेतृत्व में काम कर रहे थे. उन्होंने कहा कि वह अकेले नहीं थे जो आत्मसमर्पण के बारे में सोच रहे थे, लेकिन किसी को यह कदम उठाने में हिचक थी.
सोनू ने कहा कि वह 2004 से ही आंदोलन की दिशा को लेकर सोच रहे थे, जब कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) ने पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी बनाई थी. उन्होंने कहा कि उनका देवुजी से इस मुद्दे पर मतभेद था. उनका मानना था कि दुनिया में बहुत बदलाव आ चुका है, जबकि देवुजी कहते थे कि मूल समस्याएं अभी भी वैसी ही हैं.
सोनू राजनीतिक विंग के प्रवक्ता थे और मई 2025 में बसवराजू के एनकाउंटर के बाद उन्हें महासचिव पद के लिए आगे माना जा रहा था. लेकिन जब उनके आत्मसमर्पण की सोच सामने आई, तो पार्टी में दो गुट बन गए. एक तरफ देवुजी और उनके समर्थक थे और दूसरी तरफ सोनू और उनके साथ के लोग थे.
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