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Tuesday, 6 January, 2026
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दिल्ली हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार किया

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहद. सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दे दी.

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नई दिल्ली: सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के पीछे कथित साजिश से जुड़े एक मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहद. सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दे दी.

अदालत ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम अभियोजन और सबूत, दोनों के लिहाज से “गुणात्मक रूप से अलग आधार” पर खड़े हैं.

इसमें कहा गया कि कथित अपराधों में उनकी भूमिका “केंद्रीय” थी. अदालत ने कहा कि इन दोनों के मामले में हिरासत की अवधि लगातार और लंबी जरूर है, लेकिन यह न तो संवैधानिक आदेश का उल्लंघन करती है और न ही कानूनों के तहत लगे वैधानिक प्रतिबंध को खत्म करती है.

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी. अंजारिया की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहद सलीम खान और शादाब अहमद द्वारा दायर जमानत याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया.

इससे पहले, शीर्ष अदालत ने 10 दिसंबर को सभी पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

जमानत की मांग पर सुनवाई के दौरान, आरोपियों की ओर से पेश वकीलों ने मुख्य रूप से मुकदमे में देरी और ट्रायल शुरू होने की संभावना कम होने की दलील दी. अदालत को यह भी बताया गया कि वे यूएपीए के तहत गंभीर आरोपों वाले इस मामले में पांच साल से अधिक समय से हिरासत में हैं.

यह दलील भी दी गई कि पांच साल बीत जाने के बाद भी इस बात का कोई सबूत नहीं है कि उन्होंने हिंसा भड़काई या दंगे कराए.

दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस ने ज़मानत याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि कथित अपराधों में राज्य को अस्थिर करने की जानबूझकर कोशिश की गई थी. उसने तर्क दिया कि ये अचानक हुए विरोध प्रदर्शन नहीं थे, बल्कि “सत्ता परिवर्तन” और “आर्थिक गला घोंटने” के मकसद से एक सोची-समझी “पूरे भारत” की साज़िश थी.

दिल्ली पुलिस ने यह भी कहा कि यह साजिश कथित तौर पर तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के साथ मेल खाते हुए रची गई थी, ताकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचा जा सके और नागरिकता संशोधन कानून, यानी सीएए, के मुद्दे को वैश्विक बनाया जा सके.

पुलिस ने कहा कि सीएए के मुद्दे को “शांतिपूर्ण विरोध” के नाम पर छिपाकर एक “कट्टरपंथी उत्प्रेरक” के रूप में सावधानी से चुना गया था.

अभियोजन पक्ष ने आगे कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा रची गई “गहरी जड़ें जमाई हुई, सोची-समझी और पहले से प्लान की गई साज़िश” के कारण 53 लोगों की मौत हुई, सार्वजनिक संपत्ति को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा और केवल दिल्ली में ही 753 एफआईआर दर्ज की गईं.

दिल्ली पुलिस ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत बताते हैं कि इस साजिश को पूरे देश में दोहराने और लागू करने की कोशिश की गई थी.

2 सितंबर 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम सहित नौ आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.

हाई कोर्ट ने कहा था कि, पहली नज़र में, पूरी साज़िश में इमाम और खालिद की भूमिका “गंभीर” थी, क्योंकि उन्होंने मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को बड़ी संख्या में इकट्ठा करने के लिए सांप्रदायिक आधार पर भड़काऊ भाषण दिए थे.

उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य को फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में जनवरी 2020 में गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम, यानी यूएपीए, की कड़ी धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया था.

यह हिंसा नागरिकता संशोधन कानून, सीएए, और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, एनआरसी, के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान भड़की थी, जिसमें 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे.


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