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Thursday, 2 April, 2026
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Subscriber Writes: लैंगिक समानता पर विचार—महिला और पुरुष दोनों के अधिकारों और जिम्मेदारियों का संतुलन

महिलाओं के उत्थान और शोषण रोकने के लिए सिर्फ पुरुषों को कोसना पर्याप्त नहीं है .दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं. यह समस्या सामाजिक है, न कि केवल राजनीतिक.

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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिला दिवस को हम सभी लोग मानते हैं और महिलाओं से संबंधित सभी आयामों पर चर्चा करते है इसी संदर्भ में मेरे कुछ विचार हैं. इस दिवस को बहुसांस्कृतिक दृष्टिकोण, समतावादी और उदारवादी उपागमों के माध्यम से समझने का प्रयास किया है, और इसकी वर्तमान प्रासंगिकता पर भी विचार किया है. नारी सशक्तीकरण सिर्फ एक आवश्यकता नहीं है, बल्कि एक सामाजिक जिम्मेदारी है.

जब हम महिलाओं को समान अवसर, शिक्षा और स्वतंत्रता प्रदान करते हैं, तो हम समाज को एक सशक्त, समृद्ध और न्यायपूर्ण दिशा में ले जाते हैं. महिला दिवस केवल एक दिवस का उत्सव नहीं है, यह उस अनवरत संघर्ष और समर्पण का सम्मान है जो अनेक महिलाएं अपने अधिकार और सम्मान के लिए करती हैं. इसी प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस 13 नवम्बर को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य पुरुषों के स्वास्थ्य, उनके अधिकारों, समाज में उनके योगदान और लैंगिक समानता को बढ़ावा देना है. यह दिन पुरुषों के साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने और सकारात्मक पुरुष प्रतिमानों को प्रोत्साहित करने के लिए मनाया जाता है, जहां तक बात भेदभाव की है, यह कहना गलत होगा कि पुरुषों के साथ भेदभाव नहीं होता. पुरुषों को भी अनेक सामाजिक दबावों, मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं और पारंपरिक पुरुषत्व की अपेक्षाओं का सामना करना पड़ता है.

हालांकि, आमतौर पर सिर्फ पुरुषों को दोषी मान लेना भी उचित नहीं है. कई अपेक्षाएं दोनों वर्गों से की जाती हैं. लैंगिक असमानता पर ध्यान महिलाओं के संदर्भ में अधिक दिया जाता है क्योंकि माना जाता रहा है कि वे लंबे समय से समान अधिकारों से वंचित रही हैं. परन्तु प्रश्न यह है कि क्या केवल अन्तर्राष्ट्रीय दिवस मनाना पर्याप्त है? मेरा मानना है कि अकेले दिवस मनाने से वास्तविक परिवर्तन नहीं आता परंतु इसे प्रेरणा के रूप में अवश्य लिया जा सकता है.समाज में कई बार पुरुषों को एकतरफा दोषी ठहराए जाने की प्रवृत्ति भी देखने को मिलती है, विशेषकर घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न और लिंग-आधारित भेदभाव के मामलों में.

यह स्थिति पूरी तरह उचित नहीं है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति चाहे पुरुष हो या महिला अपने व्यवहार के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होता है (कुछ अपवाद छोड़कर). हालांकि, ऐतिहासिक और सामाजिक दृष्टिकोण से महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा को लेकर समाज में अधिक संघर्ष और भेदभाव रहा है और यह आज भी जारी है. इसी कारण कभी-कभी पुरुषों के प्रति एक नकारात्मक या आलोचनात्मक दृष्टिकोण बन जाता है. हमें समझना होगा कि लैंगिक असमानता और हिंसा का समाधान केवल दोनों लिंगों के बीच सम्मान, समझ और समानता से ही निकल सकता है. पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान अवसर, मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षा आवश्यक है. दोषारोपण से अधिक जरूरी है कि हम एक-दूसरे के अनुभवों और संघर्षों को समझें और एक न्यायपूर्ण समाज की ओर बढ़ें.

बहुसांस्कृतिक और समतावादी दृष्टिकोण से ही इस समस्या का समाधान संभव है. महिलाओं के उत्थान और शोषण रोकने के लिए सिर्फ पुरुषों को कोसना पर्याप्त नहीं है .दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं. यह समस्या सामाजिक है, न कि केवल राजनीतिक.

समाज के समग्र और एकीकृत दृष्टिकोण से ही इस समस्या को कम किया जा सकता है. इसके लिए शिक्षा, जागरूकता, कानूनी अधिकारों का पालन और समाज में समता की भावना को बढ़ावा देना आवश्यक है. हमें समाज की सोच, स्वभाव और प्रथाओं को बदलने की ज़रूरत है.

(लेखक अशुतोष रंजन, सीनियर रिसर्च फेलो, राजनीति विज्ञान विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और भारतीय राजनीति विज्ञान परिषद (IPSA) के सदस्य हैं.)

(इस लेख को ज्यों का त्यों प्रकाशित किया गया है. इसे दिप्रिंट द्वारा संपादित/फैक्ट-चैक नहीं किया गया है.)

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