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भारतीय राजनीति का भविष्य लोकतांत्रिक मूल्यों, संवैधानिक संस्थाओं और नागरिक चेतना के बीच एक संतुलित, सतत और परस्पर निर्भर संबंध पर आधारित है, क्योंकि एक ओर भारत अपनी गहरी ऐतिहासिक लोकतांत्रिक परंपरा, सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता, विशाल युवा जनसंख्या, संवैधानिक ढांचे की व्यापकता तथा सूचना-प्रौद्योगिकी और डिजिटल संचार के तीव्र विस्तार के कारण लोकतंत्र की असाधारण संभावनाओं से परिपूर्ण दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर सैद्धांतिक स्तर पर लोकतंत्र की मूल अवधारणाएं—जैसे समानता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता, बहुलतावाद, संवैधानिक नैतिकता और कानून का शासन—और व्यवहारिक राजनीति में व्याप्त जातिवाद, धर्माधारित राजनीति, क्षेत्रीय अस्मिता, व्यक्तिवादी नेतृत्व, वंशवाद, धनबल-बाहुबल, कॉर्पोरेट प्रभाव, मीडिया-निर्देशित विमर्श तथा भावनात्मक और पहचान-आधारित ध्रुवीकरण के बीच एक गहरा, जटिल और लगातार बढ़ता हुआ अंतर्विरोध स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है.
इसके परिणामस्वरूप राजनीतिक विमर्श नीति-निर्माण, विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक समानता और आर्थिक न्याय जैसे दीर्घकालिक जनहित के प्रश्नों से हटकर तात्कालिक लोकप्रियता, भावनात्मक अपील, सांस्कृतिक प्रतीकों और सत्ता-प्रबंधन तक सीमित होता चला जाता है; इसलिए जब लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया, बहुमत के अंकगणित और प्रचार-आधारित राजनीति तक सिमटने लगता है, तब संसद की विधायी गरिमा, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, चुनाव आयोग की निष्पक्षता, मीडिया की विश्वसनीयता और नौकरशाही की तटस्थता जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष दबाव बढ़ने लगता है.
इससे लोकतंत्र के भविष्य के समक्ष यह गंभीर खतरा उत्पन्न हो जाता है कि वह केवल एक औपचारिक, प्रक्रियात्मक और सतही व्यवस्था बनकर रह जाए, जबकि उसकी आत्मा—जनभागीदारी, उत्तरदायित्व और न्याय—धीरे-धीरे क्षीण होती चली जाए.
अतः इन बहुआयामी चुनौतियों के समाधान हेतु सैद्धांतिक स्तर पर संवैधानिक नैतिकता को व्यवहार में उतारना, लोकतंत्र को केवल शासन-प्रणाली नहीं बल्कि एक जीवन-पद्धति के रूप में पुनः स्थापित करना, सहिष्णुता, संवाद, असहमति और बहुलतावादी सह-अस्तित्व की परंपरा को राजनीतिक संस्कृति के केंद्र में लाना अत्यंत आवश्यक हो जाता है.
वहीं व्यवहारिक स्तर पर राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को वास्तविक रूप से लागू करना, नेतृत्व चयन और टिकट वितरण की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना, चुनावी वित्त व्यवस्था में पूर्ण पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित करना, राजनीति के अपराधीकरण पर प्रभावी और निष्पक्ष नियंत्रण स्थापित करना, शासन और विपक्ष के बीच स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद को बढ़ावा देना, मीडिया और सोशल मीडिया को सनसनी, दुष्प्रचार और ध्रुवीकरण के उपकरण के बजाय तथ्य-आधारित, उत्तरदायी और जनहितकारी विमर्श का मंच बनाना, तथा युवाओं, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और अन्य हाशिए पर स्थित समूहों की केवल प्रतीकात्मक नहीं बल्कि सार्थक, जागरूक और निरंतर राजनीतिक भागीदारी को संस्थागत समर्थन प्रदान करना अनिवार्य हो जाता है.
क्योंकि डिजिटल युग में जब एल्गोरिदम, ट्रोल संस्कृति और फेक न्यूज़ जनमत को तीव्र गति से प्रभावित कर रहे हैं, तब एक शिक्षित, आलोचनात्मक, संवैधानिक रूप से जागरूक और नैतिक रूप से प्रतिबद्ध नागरिक ही लोकतंत्र का वास्तविक संरक्षक बन सकता है, और इसी कारण नागरिक शिक्षा, राजनीतिक साक्षरता, संवैधानिक मूल्य-आधारित पाठ्यक्रम, सार्वजनिक संवाद और सामाजिक आंदोलनों की सकारात्मक भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है.
इसके अतिरिक्त, भारतीय राजनीति के भविष्य को सुदृढ़ बनाने के लिए संघीय ढाँचे को और अधिक सहयोगात्मक बनाना, केंद्र-राज्य संबंधों में विश्वास और संवाद को बढ़ाना, स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को वास्तविक अधिकार और संसाधन प्रदान करना, नीति-निर्माण में विशेषज्ञता और दीर्घकालिक दृष्टि को प्राथमिकता देना, तथा विकास और न्याय के बीच संतुलन स्थापित करना भी अनिवार्य है.
क्योंकि बिना सामाजिक न्याय के विकास और बिना विकास के लोकतांत्रिक स्थिरता संभव नहीं हो सकती, और अंततः जब राजनीति सत्ता-संग्रह के साधन से आगे बढ़कर जनसेवा, नैतिक उत्तरदायित्व, संस्थागत मजबूती और सामाजिक समावेशन का माध्यम बनती है, तभी भारतीय लोकतंत्र अपनी विविधताओं को शक्ति में परिवर्तित कर सकता है.
तभी भारतीय राजनीति का भविष्य न केवल अधिक समावेशी, संस्थागत रूप से सुदृढ़ और वैचारिक रूप से परिपक्व बन सकता है, बल्कि एक ऐसे लोकतांत्रिक मॉडल के रूप में उभर सकता है जो वैश्विक स्तर पर भी संवैधानिक मूल्यों, नागरिक चेतना और सहभागी शासन का उदाहरण प्रस्तुत करे.
इसी संदर्भ में यह भी स्पष्ट होता है कि भारतीय राजनीति के भविष्य को समझने के लिए केवल वर्तमान संकटों का विश्लेषण पर्याप्त नहीं है, बल्कि वैश्वीकरण, उदारीकरण और डिजिटल पूँजीवाद के व्यापक प्रभावों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है, क्योंकि आर्थिक असमानता, बेरोज़गारी, कृषि संकट और शहरी-ग्रामीण विभाजन जैसी संरचनात्मक समस्याएँ लोकतांत्रिक असंतोष को जन्म देती हैं.
और जब ये समस्याएं प्रभावी राजनीतिक समाधान नहीं पातीं, तब जनाक्रोश को अक्सर भावनात्मक, पहचान-आधारित और विभाजनकारी राजनीति द्वारा दिशा दी जाती है, जिससे लोकतंत्र की संस्थागत गुणवत्ता और नीति-निर्माण की गंभीरता दोनों प्रभावित होती हैं.
इसके साथ ही, वैश्विक राजनीति में बढ़ते अधिनायकवादी रुझान, राष्ट्रवाद का उग्र स्वरूप और सूचना युद्ध की रणनीतियाँ भी भारतीय राजनीति पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रभाव डाल रही हैं, जिसके परिणामस्वरूप राज्य की भूमिका, नागरिक स्वतंत्रताओं और अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर नए प्रकार की बहसें उभर रही हैं.
अतः ऐसे समय में यह अनिवार्य हो जाता है कि भारतीय लोकतंत्र अपनी आंतरिक शक्ति—संविधान, संस्थाओं और नागरिक विवेक—के माध्यम से इन बाहरी और आंतरिक दबावों का सामना करे.
इसी क्रम में यह भी ध्यान देने योग्य है कि डिजिटल राजनीति ने जहाँ एक ओर हाशिए के समूहों को आवाज़ और मंच प्रदान किया है, वहीं दूसरी ओर एल्गोरिदमिक नियंत्रण, डेटा-आधारित प्रचार, ट्रोलिंग, नफ़रत-भाषण और दुष्प्रचार ने सार्वजनिक विमर्श को असंतुलित किया है, जिससे नीति-आधारित संवाद के स्थान पर आक्रामक और ध्रुवीकृत राजनीतिक संस्कृति को बढ़ावा मिला है.
इसलिए भविष्य की भारतीय राजनीति के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि तकनीक को लोकतंत्र का सहायक उपकरण बनाया जाए, न कि उसके विकल्प या नियंत्रक के रूप में, और इसके लिए डिजिटल नियमन, प्लेटफ़ॉर्म जवाबदेही तथा नागरिक डिजिटल साक्षरता को संस्थागत रूप देना होगा.
साथ ही यह भी स्पष्ट है कि भारतीय राजनीति का भविष्य केवल केंद्र की राजनीति से निर्धारित नहीं होगा, बल्कि राज्यों, स्थानीय निकायों, पंचायतों और नगरपालिकाओं की लोकतांत्रिक क्षमता भी उतनी ही निर्णायक होगी, क्योंकि जमीनी लोकतंत्र ही नागरिकों और शासन के बीच वास्तविक सेतु का कार्य करता है.
अतः विकेंद्रीकरण को केवल संवैधानिक प्रावधान न मानकर व्यवहारिक शासन-दर्शन के रूप में अपनाना होगा, जिसमें स्थानीय प्रतिनिधियों को वित्तीय, प्रशासनिक और नीतिगत अधिकार प्राप्त हों.
इसके अतिरिक्त, नेतृत्व के प्रश्न पर भी गंभीर पुनर्विचार आवश्यक है, क्योंकि व्यक्तिवादी और करिश्माई नेतृत्व अल्पकालिक स्थिरता तो दे सकता है, किंतु दीर्घकाल में संस्थाओं को कमजोर करता है, इसलिए भविष्य की राजनीति को व्यक्तियों से अधिक संस्थाओं, प्रक्रियाओं और सामूहिक निर्णय-निर्माण पर आधारित होना चाहिए, जिससे सत्ता का केंद्रीकरण न होकर लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व सुदृढ़ हो.
इसी क्रम में शिक्षा व्यवस्था की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यदि नागरिकों को संविधान, अधिकारों, कर्तव्यों और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की सम्यक समझ नहीं होगी, तो वे आसानी से भावनात्मक अपील, अफ़वाहों और दुष्प्रचार का शिकार बन सकते हैं, अतः लोकतांत्रिक नागरिकता को शिक्षा का मूल उद्देश्य बनाना समय की आवश्यकता है.
इसके साथ ही, सामाजिक आंदोलनों, नागरिक समूहों और स्वतंत्र बौद्धिक विमर्श की भूमिका को भी लोकतंत्र-विरोधी नहीं बल्कि लोकतंत्र-पोषक तत्व के रूप में स्वीकार करना होगा, क्योंकि इतिहास गवाह है कि सशक्त लोकतंत्र वही होते हैं जहाँ सत्ता से प्रश्न पूछने की संस्कृति जीवित रहती है.
आर्थिक नीति के स्तर पर भी भारतीय राजनीति के भविष्य के लिए यह आवश्यक है कि विकास को केवल जीडीपी वृद्धि के रूप में न देखकर मानवीय विकास, सामाजिक सुरक्षा, पर्यावरणीय स्थिरता और पीढ़ीगत न्याय से जोड़ा जाए, क्योंकि बिना समावेशी और न्यायपूर्ण आर्थिक आधार के लोकतंत्र केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित रह जाता है.
अंततः यह कहा जा सकता है कि भारतीय राजनीति का भविष्य किसी एक सुधार, किसी एक नेतृत्व या किसी एक चुनाव से निर्धारित नहीं होगा, बल्कि यह एक दीर्घकालिक लोकतांत्रिक परियोजना है, जिसमें राज्य, समाज, संस्थाएँ और नागरिक—सभी की साझा जिम्मेदारी निहित है.
और जब यह सामूहिक उत्तरदायित्व संवैधानिक मूल्यों, नैतिक राजनीति और जागरूक नागरिकता के साथ जुड़ता है, तभी भारतीय लोकतंत्र अपनी वर्तमान चुनौतियों को अवसरों में बदलते हुए न केवल आंतरिक रूप से सुदृढ़ हो सकता है, बल्कि वैश्विक परिदृश्य में एक परिपक्व, समावेशी और मूल्य-आधारित लोकतांत्रिक मॉडल के रूप में स्थापित हो सकता है.
(लेखक आशुतोष रंजन, सीनियर रिसर्च फेलो, राजनीति विज्ञान विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और भारतीय राजनीति विज्ञान परिषद (IPSA) के सदस्य हैं.)
(इस लेख को ज्यों का त्यों प्रकाशित किया गया है. इसे दिप्रिंट द्वारा संपादित/फैक्ट-चैक नहीं किया गया है.)
