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Wednesday, 12 June, 2024
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‘अभी भी अछूत ही मानते हैं’, पिछले हफ्ते कर्नाटक में क्यों सैकड़ों दलितों ने अपनाया बौद्ध धर्म

राज्य के शोरापुर शहर में शुक्रवार को 450 से ज्यादा दलितों ने अपने 'अछूत' टैग से छुटकारा पाने के लिए हिंदू धर्म का त्याग कर दिया. विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ ‘विरोध’ का संकेत है, इससे कुछ बदलने वाला नहीं है.

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शोरापुर, कर्नाटक: कर्नाटक के शोरापुर में शुक्रवार को बौद्ध धर्म अपनाने के लिए बड़ी संख्या में आए दलितों के लिए धर्मांतरण ‘अछूत’ के टैग को हटाने का एक प्रयास है, जिसे वे आज भी, खासकर राज्य के ग्रामीण हिस्सों में अपने साथ ढोने के लिए मजबूर हैं.

दलित नेता देवेंद्र हेगड़े ने दिप्रिंट से कहा, ‘बौद्ध धर्म को अपनाकर, हम न सिर्फ जाति व्यवस्था और असमानता को बढ़ावा देने वाले हिंदू धर्म को खारिज कर रहे हैं, बल्कि हम अपने गुरु डॉ. बी.आर. अम्बेडकर के दिखाए गए रास्ते पर भी चल रहे हैं.’

उन्होंने कहा कि ‘बाबा साहब’ ने बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को समझने और यह जानने के बाद कि यह समस्त मानव जाति के कल्याण के लिए बना है, जातिवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई के लिए इस धर्म को चुना था.

हेगड़े ने कहा, ‘और वैसे भी हिंदू धर्म ने हमें अपमान के अलावा और दिया ही क्या है.’

66वें धम्मचक्र प्रवर्तन- जब अंबेडकर ने 1956 में बौद्ध धर्म अपनाया था- की पूर्व संध्या पर गोल्डन केव बुद्ध विहार ट्रस्ट की ओर से इस कार्यक्रम को आयोजित किया गया था. ट्रस्ट के सचिव राहुल हुलीमणि ने बताया कि 457 दलितों ने अम्बेडकर द्वारा निर्धारित 22 प्रतिज्ञाओं की शपथ लेकर बौद्ध धर्म ग्रहण किया.

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कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में अंबेडकर की पोती रमा तेलतुम्बडे अंबेडकर मौजूद थीं.

ट्रस्ट के सदस्य वेंकटेश होस्मानी ने दिप्रिंट से बातचीत के दौरान सवाल किया, ‘यह 2022 है. हमें आज भी अछूत कहा जाता है. तो फिर हम हिंदू धर्म में क्यों बने रहें.’

पिछले हफ्ते की शुरुआत में वेंकटेश ने कुछ अन्य लोगों के साथ बौद्ध धर्म अपनाने से पहले हिंदू देवताओं की तस्वीरें एक नदी में बहा दी थीं. उन्होंने इसे ‘सम्मानजनक विसर्जन’ कहा. उसी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया.

विशेषज्ञों का कहना है कि अम्बेडकर की शिक्षाओं से निकटता से जुड़े होने के बावजूद बौद्ध धर्म अपनाने से ज्यादा कुछ नहीं बदलता है. दिप्रिंट से बात करते हुए राजनीतिक कार्यकर्ता और लेखक कांचा इलैया शेफर्ड ने कहा कि हिंदू धर्म की निंदा करने से दलितों के प्रति धारणा नहीं बदलने वाली है. यह तब तक नहीं बदल सकती, जब तक कि सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं हो जाता.

उन्होंने कहा, ‘अभी तक तो यह सिर्फ हिंदू मान्यताओं और गहरे तक पैठ बना चुकी अस्पृश्यता के लिए सिर्फ एक विरोध और चुनौती है.’


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जातिवाद को कायम रखना

शोरापुर विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जनजाति आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आता है. पुलिस के अनुसार, तालुक के ग्रामीण हिस्सों में जातिगत भेदभाव काफी ज्यादा है.

कुछ महीने पहले एक दलित परिवार को उनकी जाति के कारण मंदिर में जाने की अनुमति नहीं दी गई थी. पुलिस के हस्तक्षेप के बाद ही उन्हें अंदर जाने दिया गया. घटना नगर क्षेत्र से 30 किलोमीटर दूर अमलिहला गांव की है.

एक अन्य घटना में राज्य के कोलार जिले में एक दलित परिवार पर 60,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया, क्योंकि उनके बेटे ने एक हिंदू देवता की मूर्ति से जुड़े एक पोल को छू लिया था. इन घटनाओं ने उस शहर पर छाप छोड़ी है जो कर्नाटक के यादगीर जिले में है.

एक अजीब प्रथा के बारे में बताते हुए शोरापुर के पुलिस इंस्पेक्टर सुनील वी.एम. ने दिप्रिंट को बताया कि तालुक के किरधल्ली गांव में ज्यादातर होटल, दुकानें ऊंची जाति के लोगों की हैं. लेकिन किसी दलित परिवार के एक सदस्य की मौत के बाद उन्हें बंद रखा जाता है.

कई दलित समुदाय के सदस्यों ने आरोप लगाते हुए कहा कि इसकी एक खास वजह है. इस दौरान अन्य गांवों के दलित परिवार भी वहां आते हैं और वो उनकी उन दुकानों में जा सकते हैं. उच्च जाति के मालिकों को यह पसंद नहीं है. बस उसी कारण वो अपनी दुकानें बंद रखते हैं.

सुनील ने कहा, ‘गांव वाले इसे दशकों पुरानी परंपरा कहते हैं, लेकिन वे नहीं जानते कि ऐसा क्यों किया जा रहा है. यह तभी किया जाता है जब एक दलित व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है.’

एक आयोजक की 14 वर्षीय बेटी माया बी अपने घर के पास के ही एक स्कूल में पढ़ती है. उसने दिप्रिंट को बताया, ‘मेरी क्लास के कुछ बच्चे मेरे आस-पास नहीं बैठते क्योंकि मैं एक दलित हूं. कहते हैं हमसे दूर रहो, तुम नीची जाति के हो. लेकिन अब से मैं खुद की एक बौद्ध के रूप में पहचान बनाऊंगी और मुझे उम्मीद है कि इससे उनका नजरिया बदल जाएगा.’

इस समारोह में रायचूर से लगभग 20 महिलाएं यहां पहुंची थी. उनमें से एक राधा एम ने दिप्रिंट से बात करते हुए कहा, ‘रायचूर में अभी भी ऐसे गांव हैं जहां दलितों के लिए पीने का पानी का एक अलग स्रोत है. ऊंची जाति के लोग एक अलग कुएं से पीते हैं. मुझे कुछ साल पहले एक मंदिर में जाने से रोक दिया गया था.’

रायचूर के एक अन्य धर्मांतरित अमरलम्मा ने दिप्रिंट से बात करते हुए कहा, ‘अगर हिंदू धर्म हमें समानता नहीं देता है, अगर वह धर्म हमें सबसे निचले स्तर पर रखता है और हमें नहीं चाहता है, तो हम इसका पालन क्यों करें.’

उन्होंने कहा कि वे ‘बाबा साहब के रास्ते पर चलेंगे और एक समान जीवन जीएंगे. हिंदू धर्म में बने रहना हमारे बाबा साहब का अपमान है.’

सुनील ने कहा कि शोरापुर की साक्षरता दर मुश्किल से 50 प्रतिशत है. उन्होंने दावा किया कि अत्यधिक पिछड़ापन और गरीबी इस भेदभाव का एक बड़ा कारण है.


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‘कुछ नहीं बदलता है’

प्रसिद्ध राजनीतिक कार्यकर्ता और लेखक कांचा इलैया शेफर्ड ने बताया कि बौद्ध धर्म को अपनाना हिंदू धर्म के खिलाफ ‘विरोध’ का संकेत तो हो सकता है, लेकिन यह उनकी सामाजिक स्थिति में कोई सांस्कृतिक परिवर्तन लेकर नहीं आता.

उन्होंने कहा, ‘उनका पेशा वही रहता है, उनका गांव वही रहता है, उनके नाम भी वही रहते हैं. इसलिए, यह वास्तव में उनके प्रति दूसरों की धारणा को नहीं बदलता है. और ऐसा तब तक नहीं हो सकता, जब तक कि कोई सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं होगा.’

उन्होंने कहा कि विरोध अपने आप उनके लिए लोगों के बीच एक समान जगह नहीं बना सकता है. शायद उतनी भी नहीं जितनी कि अन्य धर्म इस्लाम या ईसाई धर्म में धर्मान्तरण करने पर मिल जाती है.

उन्होंने कहा, ‘इसका एक कारण यह भी है कि आरएसएस या भाजपा को बौद्ध धर्म अपनाने वाले दलितों के साथ कोई समस्या नहीं है, क्योंकि वे इसे हिंदू धर्म के हिस्से के रूप में देखते हैं. अगर वे इस्लाम या ईसाई धर्म जैसे अन्य धर्मों को अपना रहे होते, तो इसके बारे में बहुत शोर होता.’

उन्होंने समझाते हुए बताया, ‘उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश के पिदुगुरल्ला क्षेत्र में यादव समुदाय की एक बड़ी संख्या में लोगों ने ईसाई धर्म को अपनाया था. लेकिन उनके समुदाय के आधे से ज्यादा लोगों ने ऐसा नहीं किया. धर्मान्तरित लोगों ने सांस्कृतिक परिवर्तन देखा. उनकी महिलाओं ने रात के स्कूलों में भाग लिया, बच्चे रविवार के स्कूलों में गए और महिलाएं रविवार को चर्च के लिए तैयार होकर घर से निकलने लगीं. इससे समुदाय को अंततः उन लोगों की तुलना में कुछ प्रकार का सशक्तिकरण मिला, जिन्होंने धर्म परिवर्तन नहीं किया था. लेकिन बौद्ध धर्म यहां ऐसा कुछ नहीं कर रहा है.’

अम्बेडकर का बौद्ध धर्म

आंबेडकर के इस धर्म में आने के बाद से ही दलित समुदाय के लोग बौद्ध धर्म अपना रहे हैं. 14 अक्टूबर 1956 को 3.5 लाख से अधिक अनुयायियों के साथ बाबा साहेब ने हिंदू धर्म छोड़ दिया और बौद्ध धर्म की राह पर चल निकले थे. वह हिंदू धर्म को अपनी आजादी के लिए खतरा मानते थे क्योंकि यह जाति व्यवस्था का प्रचार करता है.

उनकी पुनर्व्याख्या- जिसे अक्सर दलित बौद्ध आंदोलन, नवयान या नव-बौद्ध धर्म के रूप में जाना जाता है – उसने पारंपरिक बौद्ध धर्म के ‘चार आर्य सत्य’ को खारिज करके वर्ग संघर्ष और सामाजिक न्याय को शामिल करते हुए इसे नए तरीके से पेश किया.

लेकिन मोटे तौर पर अम्बेडकर ने अन्य धर्मों पर बौद्ध धर्म को प्राथमिकता इसलिए दी क्योंकि उन्होंने समाज के हाशिए के वर्गों को जाति प्रथा से मुक्त करने के लिए इसे अधिक उपयुक्त पाया था.

शेफर्ड बताते हैं कि विशेष रूप से दलितों में धर्मांतरण– जिनके लिए ये एक राजनीतिक उपकरण है और हिंदू धर्म के खिलाफ विरोध- दर घट रही है.

उन्होंने कहा, ‘अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म को अपनाने के बाद उसमें कुछ संरचनात्मक परिवर्तन किए, लेकिन इस बारे में बहुत स्पष्टता नहीं है कि सामाजिक न्याय के लिए धर्म का पूरी तरह से उपयोग कैसे किया गया जाएगा. अगर वह इसे अपनाने के बाद अधिक समय तक जीवित रहते, तो शायद हम इसे देख सकते थे.’

उन्होंने समझाया कि प्रारंभिक विचार हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था का मुकाबला करना था. उन्होंने पूछा, ‘कोई संरचनात्मक परिवर्तन किए बिना जाति का सफाया कैसे किया जा सकता है.’

बौद्ध धर्म अपनाने वाले कई दलितों के लिए यह अंबेडकर के मार्ग पर चलने का विचार है. शेफर्ड बताते हैं कि धर्म परिवर्तन करने वाले युवाओं को इस कदम से फायदा मिल सकता है क्योंकि उनकी ग्रोथ अम्बेडकर की शिक्षाओं के साथ काफी नजदीकी से जुड़ी होगी.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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