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Thursday, 30 May, 2024
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कैसे देहरादून स्थित WII का DNA लैब बीफ से लेकर अवैध शिकार के ‘मिस्ट्री मीट’ के मामले को सुलझाती है

भारतीय वन्यजीव संस्थान के फोरेंसिक सेल में मांस की पहचान करने वाले देश के शीर्ष अधिकारियों में से एक है जो पिछले 18 वर्षों में 3,000 से अधिक फोरेंसिक रिपोर्ट प्रस्तुत कर चुके हैं.

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बेंगलुरु: मॉनिटर छिपकली, पैंगोलिन से लेकर बाघ और मवेशी तक, डॉ. संदीप गुप्ता और उनकी टीम ने लगभग हर तरह के मांस का लैब-परीक्षण किया है. पिछले दो दशकों में उन्होंने 3,000 से अधिक फोरेंसिक रिपोर्ट जमा की है.

देहरादून में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के वन्यजीव फोरेंसिक और संरक्षण आनुवंशिकी प्रकोष्ठ में नोडल अधिकारी के रूप में गुप्ता का काम शिकारियों से जब्त किए गए मांस का परीक्षण करना और उसका पहचान करना है. यह प्रयोगशाला मांस के परीक्षण के लिए निजी लोगों के अनुरोध को भी स्वीकार करती है.

जानवर की पहचान करने के लिए पर्दे के पीछे की प्रक्रिया में रक्त सीरम परीक्षण और डीएनए विश्लेषण शामिल हैं. पर्याप्त डीएनए उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में परीक्षण में लगने वाला समय 24 घंटे से लेकर कई दिनों तक लग जाता है.

पुलिस द्वारा गोमांस जब्त किए जाने के संदेह वाले मांस के बारे में पूछे जाने पर गुप्ता ने कहा कि इसके लिए बुनियादी परीक्षण ही आमतौर पर पर्याप्त होते हैं.

उन्होंने कहा, ‘हालांकि स्थानीय स्तर पर भी फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाएं होती हैं जो पुलिस के साथ मिलकर काम करती हैं. ऐसी अधिकांश प्रयोगशालाएं बीफ, भैंस का मीट, मटन और अन्य मीट की पहचान करने में सक्षम होती है जो लोगों के बीच विवाद का बड़ा कारण बनता है.’

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ये लैब मांस की पहचान करने के लिए आमतौर पर सीरोलॉजिकल टेस्ट (रक्त सीरम विश्लेषण) का उपयोग करते हैं, और अधिकतर यह एक या दो दिन से अधिक नहीं लेते हैं. जबकि प्रत्येक जिले के कानून प्रवर्तन के पास ऐसी प्रयोगशालाओं तक पहुंच नहीं है, तो इसे मोबाइल प्रयोगशालाओं से भी आउटसोर्स किया जा सकता है जो कम-रिज़ॉल्यूशन का परीक्षण कर सकते हैं.

हाई-रिज़ॉल्यूशन प्रयोगशाला द्वारा मिले विश्लेषणों के विपरीत, कम-रिज़ॉल्यूशन वाला प्रयोगशाला परीक्षण नमूने के गुणों का अनुमान बताते हैं, जो संभावित रूप से आगे की जांच के लिए फ़्लैगिंग मुद्दे होते हैं, जैसे कि मवेशियों और नीलगाय के बीच भ्रम. बाद में यह डॉ गुप्ता की प्रयोगशाला में शामिल होता है.

जहां गुप्ता और उनकी टीम की विशेषज्ञता मुख्य रूप से खेल में आती है और वह खेल है शिकारियों या वन्यजीव तस्करों से जब्त किए गए ‘मिस्ट्री मीट’ की पहचान करना. ऐसे मामलों में, टीम निर्णय लेती है कि किस प्रकार के परीक्षण किए जाएं.

सीरोलॉजिकल बनाम डीएनए परीक्षण

गुप्ता ने कहा कि कम मात्रा के मांस में, जैसे कि गोमांस से संबंधित विवाद में सीरोलॉजिकल परीक्षण ‘अच्छी तरह से काम कर जाता है.’

सीरोलॉजिकल परीक्षण मुख्य रूप से एंटीबॉडी परीक्षण होते हैं, जहां प्रयोगशालाएं में एंटीजन या उसमें मौजूद पदार्थों की तलाश की जाती हैं जो आमतौर पर प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रतिक्रिया से उत्पन्न होती हैं.

इस तरह के परीक्षण के लिए एंटीसेरम (एक रक्त सीरम जिसमें विशिष्ट एंटीजन के खिलाफ एंटीबॉडी होते हैं) का उपयोग किया जाता है. मांस से एंटीजन को एंटीसेरम में भेजा जाता है और एंटीबॉडी प्रतिक्रिया मांस के प्रकार की पहचान करती है.

लेकिन जब जंगली मांस या सैकड़ों किलो मांस की पहचान की जानी हो, तो डीएनए परीक्षण करना जरूरी होता है.

ये परीक्षण एक मांस के नमूने से डीएनए को निकालने और प्रवर्धित करके किया जाता है, और फिर इसे अनुक्रमणित किया जाता है, जिससे जानवर की पहचान होती है. गुप्ता ने कहा, ‘डीएनए परीक्षण अंतिम होता है.’

लेकिन सभी लैब ऐसे परिष्कृत परीक्षणों से सुसज्जित नहीं हैं. मांस की पहचान के लिए, वे आम तौर पर देहरादून स्थित डब्ल्यूआईआई जैसे संस्थानों ले जाते हैं. इसके अलावा सेलुलर और आणविक जीव विज्ञान केंद्र – हैदराबाद में लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण के लिए प्रयोगशाला (CCMB, LaCONES) है और कोलकाता में जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ZSI) की प्रयोगशाला है, जहां यह हो सकता है.

डॉ गुप्तान ने कहा, ‘अधिसूचित सरकारी प्रयोगशालाएं – WII और ZSI – केवल वही हैं जो आमतौर पर डीएनए विश्लेषण के माध्यम से वन्यजीव संबंधी अपराधों और तस्करी की जांच करती हैं. हालांकि LaCONES भी परिक्षण में सक्षम है, लेकिन इसे सरकारी अधिनियम के तहत औपचारिक रूप से अनुमोदित नहीं किया गया है.’

उन्होंने कहा, ‘हमने मॉनिटर छिपकली, पैंगोलिन, बाघ, तेंदुआ, काला हिरण, चिंकारा और अन्य कई चीजों को परीक्षण किया है.’

पैंगोलिन नरसंहार, हत्था जोड़ी ‘पौधे’ के बारे में सच्चाई 

गुप्ता और उनकी प्रयोगशाला ने जिन नमूनों का परीक्षण किया उनमें से कई भारतीय पैंगोलिन (मणिस क्रैसिकाउडाटा) के हैं, जो देश भर में पाई जाने वाली एक संरक्षित प्रजाति है और अक्सर इसके शल्कों और त्वचा के लिए इनका शिकार किया जाता है और इन्हें मार दिया जाता है.

गुप्ता ने कहा, ‘जीवित पैंगोलिन को पानी में उबाल कर फिर काटा जाता है, जो बेहद अनैतिक और बहुत क्रूर है.’

उन्होंने कहा, ‘एक वयस्क पैंगोलिन की पैदावार 300 से 400 ग्राम शल्क के बीच होती है, और हमनें 337 किग्रा शल्क तक बरामद की है. इसका मतलब है कि लगभग 800 पैंगोलिन मारे गए.’

एक अन्य मामले में, जहां 90 किलो शल्क जब्त की गई थी, उन्होंने अनुमान लगाया कि कम से कम 250 पैंगोलिन मारे गए थे.

एक अन्य जानवर जिसकी प्रयोगशाला अक्सर पहचान करती है वह है मॉनिटर छिपकली (वाराणस बेंगालेंसिस). ये भारतीय उपमहाद्वीप में भी पाए जाते हैं, और मांस के लिए शिकार भी किए जाते हैं.

इसके अतिरिक्त, पुरुष मॉनिटरों का विशेष रूप से उनके यौन अंग के लिए शिकार किया जाता है, जिसका उपयोग हत्था जोड़ी बनाने के लिए किया जाता है, जो प्रार्थना में शामिल दो हाथों जैसा दिखता है और माना जाता है कि यह लोगों के भाग्य को बदल देता है.

गुप्ता ने कहा, ‘लोग आमतौर पर कहते हैं कि यह एक पौधे की जादुई जड़ है. लेकिन जब भी हमने एक हत्था जोड़ी का सीक्वेंस किया है, तो यह हमेशा एक मॉनिटर छिपकली का जैविक हिस्सा रहा है.’


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संदिग्ध मटन और ‘चिकन’ चाल

वन्यजीव पर फोरेंसिक प्रयोगशालाओं का एक पूरा ध्यान है लेकिन वे सभी प्रकार के मामलों के लिए डीएनए परीक्षण करते हैं जहां डीएनए उपलब्ध है, जिसमें मानव के नमूने भी शामिल हैं. वे मांस के परीक्षण के लिए निजी लोगों का अनुरोध भी स्वीकार करते हैं.

उन्होंने कहा, ‘एक महिला थी जो रेडी-टू-ईट प्रमाणित मटन का परीक्षण करने के लिए नियमित रूप से मेरे पास आती थी, जिसे वह खरीदती थी. वह परीक्षण करवाती थी कि मटन भेड़ या बकरी है या नहीं. लेकिन शुक्र है कि उसके नमूनों में हमेशा वहीं मिले जो वह लेकर आती थी.’

एक अवसर पर, गुप्ता और उनकी टीम ने एक लकड़ी के चॉपिंग ब्लॉक से डीएनए का विश्लेषण करके एक संदिग्ध वन्यजीव अपराध का मामला सुलझाया था.

2005 में ‘फॉरेंसिक साइंस इंटरनेशनल’ पत्रिका में प्रकाशित एक पत्र में, गुप्ता और उनकी टीम ने बताया कि एक वन वार्डन को संदेह था कि कुछ लोगों ने एक मोर को मारा, पकाया और खा लिया.

जब्त पका हुआ मांस और एक चॉपिंग ब्लॉक को डीएनए परीक्षण के लिए डॉ गुप्ता की प्रयोगशाला में भेजा गया था. पका हुआ मांस चिकन का निकला, लेकिन चॉपिंग ब्लॉक पर डीएनए एक भारतीय मोर का था.

मांस परीक्षण में बढ़ोतरी

गुप्ता ने कहा, ‘वन्यजीव संरक्षण में डीएनए टाइपिंग बहुत आम होती जा रही है और वन्यजीव फोरेंसिक डेटा को दस्तावेज करने के लिए सक्रिय कदम उठाने की जरूरत है.’

उन्होंने कहा कि इस्तेमाल की जा रही तकनीक भी बढ़ी है और संवेदनशीलता और सटीकता में सुधार भी हुआ है.

अधिक तेजी से डीएनए परीक्षण के तरीकों में भी तेजी देखी जा रही है. उदाहरण के लिए, पिछले साल, गुजरात सरकार ने एक घंटे के भीतर यह पुष्टि करने के लिए कि मांस का नमूना गोमांस था या नहीं, एलएएमपी डीएनए परीक्षण का उपयोग शुरू किया.

ये परीक्षण एक प्रजाति-विशिष्ट मार्कर का उपयोग करते हैं जो अनुक्रमण के अतिरिक्त, अत्यधिक जटिल चरण के बिना डीएनए प्रवर्धन के बाद एक प्रजाति की पहचान कर सकते हैं.

(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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