Thursday, 30 June, 2022
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रामायण, महाभारत की गाथा सुनाकर आदिवासियों को ‘हिंदू पहचान’ के प्रति जागरूक करेगा संघ से जुड़ा संगठन

2011 की जनगणना में 82 धर्मों ने भारत में ‘अन्य धर्म और धारणाओं’ (ओआरपी) के तहत अपनी पहचान बनाई थी. यह भारत के छह धर्मों- हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन से अलग हैं.

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नई दिल्ली: अन्य धर्मों और धारणाओं (ओआरपी) में भरोसा रखने वालों के तौर पर पहचान की जरूरत पर जोर देने वाले आदिवासी समुदायों के लोगों की बढ़ती संख्या या 2021 की जनगणना में ‘आदिवासी धर्म’ के लिए एक अलग श्रेणी की बढ़ती मांग को लेकर चिंतित आदिवासी मुद्दों पर काम करने वाले आरएसएस से जुड़े संगठन वनवासी कल्याण आश्रम (वीकेए) ने आदिवासियों को हिंदू धर्म में वापस लाने के लिए देश के प्रमुख आदिवासी बहुल इलाकों में जागरूकता कार्यक्रम चलाने की तैयारी कर ली है.

2011 की जनगणना में 82 धर्मों ने भारत में ‘अन्य धर्म और धारणाओं’ (ओआरपी) के तहत अपनी पहचान बनाई थी. यह भारत के छह धर्मों- हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन से अलग हैं.

हालांकि, वीकेए का असली डर, आदिवासियों की तरफ से अपनी अलग पहचान की मांग किए जाने से भी ज्यादा बड़ा, यह है कि ओआरपी के तौर पर पहचान रखने वाले अंततः ईसाई धर्म अपना सकते हैं.

वीकेए के एक पदाधिकारी ने दिप्रिंट से कहा कि 2011 की जनगणना के मुताबिक 79 लाख व्यक्ति ऐसे थे जिन्होंने अपनी पहचान ओआरपी के तौर पर दर्ज कराई, जिनका आंकड़ा 1991 में 42 लाख था.

उन्होंने कहा, ‘हमने देखा कि ये ओआरपी बाद में ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए, इसलिए यह देश के भीतर कलह उत्पन्न करने और धर्मांतरण को अंजाम देने के अलावा और कुछ नहीं है.’

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जागरूकता कार्यक्रम या ‘जनजागरण’ बैठकें इसका मुकाबला करने और आदिवासियों को हिंदू धर्म के दायरे में बनाए रखने का एक प्रयास हैं.

वीकेए के एक अन्य पदाधिकारी ने कहा, ‘हमें पता चला है कि ईसाई मिशनरी हमारे महाकाव्यों रामायण और महाभारत की गाथाएं विकृत करने की कोशिश कर रहे हैं. वे उन्हें हमारे खिलाफ खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, जो हम नहीं होने देंगे. हम अपने महाकाव्यों जैसे रामायण और महाभारत की गाथाएं भी सुनाएंगे जो आदिवासियों की कहानियों से भरी हुई हैं. इससे उन्हें यह समझने में मदद मिलेगी कि वे हिंदू समाज का ही हिस्सा हैं.’

पहचान का संकट

19 जून को ट्राइबल आर्मी, जो खुद को देश में मूल निवासियों की पीढ़ी दर पीढ़ी उपेक्षा को चुनौती देने वाला एक मंच बताती है, ने ट्वीट किया, ‘जनगणना 2021 में आदिवासी धर्म को अलग से श्रेणीबद्ध करने की मांग करना हमारा अधिकार है. और हम वनवासी नहीं हैं, हम आदिवासी हैं. हम भारत के मूलनिवासी हैं. आदिवासी धर्म की श्रेणी बनाएं. #आदिवासी_मूलनिवासी_है.’
पिछले साल नवंबर में झारखंड विधानसभा ने सरना को 2021 की जनगणना में एक अलग धर्म के रूप में शामिल करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी. सरना प्रकृति पूजा का एक रूप है, जिसके अनुयायी ‘जल, जंगल, जमीन’ में विश्वास करते हैं और खुद को वन क्षेत्रों का संरक्षक मानने के साथ पेड़ों और पहाड़ों की पूजा करते हैं.

अगर झारखंड के नए ‘सरना कोड’ को केंद्र मंजूर कर लेता है तो 2021 की जनगणना में एक नए धर्म को श्रेणीबद्ध करना होगा.
यद्यपि सरना अनुयायी मानते हैं कि कुछ ‘धर्मांतरण’ हुए हैं, वे खुद को हिंदुओं में गिने जाने को तैयार नहीं हैं.

सरना धर्म गुरु बंधन तिग्गा ने कहा, ‘यह हमारी पहचान की लड़ाई है और हम यह लड़ाई तब तक लड़ते रखेंगे जब तक जीत नहीं जाते. हमारी अपनी परंपरा है और हमें अपनी अलग आस्था का पालन करने की अनुमति दी जानी चाहिए. हमें अनुसूचित जनजातियों में शुमार किया गया है जो हिंदू हो सकते हैं या देशभर में किसी अन्य धर्म का पालन कर सकते हैं जो सही नहीं है.’
उन्होंने कहा, ‘यह सच है कि कुछ धर्मांतरण हुए हैं लेकिन हम दोहराना चाहते हैं कि हम पूरी तरह से एक अलग धर्म का पालन करते हैं और हिंदू नहीं हैं. हमने एक अलग ही तरह की आस्था को अपना रखा है.’


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झारखंड में सरना धर्म का पालन करने वाले आदिवासियों को लेकर एक और चिंता यह है कि वह ‘धर्मांतरित’ आदिवासी हैं और अल्पसंख्यक और अनुसूचित जनजाति दोनों के ही तौर पर आरक्षण का लाभ ले रहे हैं.

‘ये हमारे अपने हैं’

इस बीच, वीकेए ने आदिवासियों को लुभाने की पूरी तरह तैयारी कर रखी है.

पहले वीकेए पदाधिकारी के मुताबिक, योजना यह है कि संगठन कार्यकर्ता ग्राम स्तर पर आदिवासी समुदायों के साथ बैठकें करेंगे और उन्हें यह समझाएंगे कि कैसे आदिवासी हिंदू धर्म का ही अभिन्न हिस्सा हैं. यद्यपि बैठकें देशभर में आयोजित होंगी लेकिन उन राज्यों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा जहां आदिवासी आबादी अच्छी-खासी है. इनमें झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और ओडिशा शामिल हैं.

हालांकि इस तरह के ‘जनजागरण’ कार्यक्रमों की योजना संगठन की तरफ से पहले भी बनाई गई थी, लेकिन कोविड महामारी के कारण उसे टाल दिया गया था. अब, जबकि 2021 की जनगणना शुरू होने जा रही है, इस योजना को फिर पटरी पर ले आया गया है.

ऊपर उद्धृत वीकेए के पहले पदाधिकारी ने कहा, ‘जनगणना से पहले हम प्रमुख जनजातीय क्षेत्रों में ‘जनजागरण’ अभियान चलाएंगे. हम ग्रामीणों तक पहुंचेंगे और उन्हें ईसाई मिशनरी की कुटिल योजनाओं से अवगत कराएंगे जो अफवाहें फैलाकर सामूहिक रूप से उनके धर्मांतरण की कोशिश कर रही हैं. वे आदिवासी समुदाय को व्यापक हिंदू धर्म से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं.’
आरएसएस के एक पदाधिकारी ने कहा, ‘उनके बीच यह डर फैलाया जा रहा है कि अगर उन्होंने खुद को बतौर हिंदू पहचाने जाने का फैसला किया तो अपनी पहचान खो देंगे. हम उन्हें आश्वस्त करना चाहते हैं कि न केवल व्यापक हिंदू पहचान से जुड़े रहेंगे बल्कि उनकी व्यक्तिगत आदिवासी पहचान भी सुरक्षित रहेगी.’

उन्होंने आगे कहा, ‘हिंदू समाज आदिवासियों के साथ खड़ा है और उन्हें यह समझाना चाहता है कि ‘राष्ट्र-विरोधी’ ताकतें उनका इस्तेमाल कर रही हैं जो भारत को तोड़ना चाहती हैं. हमारा फोकस तथ्यों के आधार पर चर्चा करना और आदिवासी समुदाय को ही यह तय करने देने पर होगा कि आखिर वे क्या करना चाहते हैं.’

हालांकि, देश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में ईसाई हाल में धर्मांतरण की बात तो स्वीकार करते हैं, लेकिन इस बात पर जोर देते हैं कि वे स्वैच्छिक थे और किसी प्रकार के दबाव में आकर ऐसा नहीं किया गया.

छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम (रजिस्टर्ड) के अध्यक्ष अरुण पन्नालाल ने कहा, ‘हां, धर्मांतरण की एक बड़ी लहर चल रही है, लेकिन यह स्वत: स्फूर्त है…दूसरी तरफ, आरएसएस सभी आदिवासियों को हिंदू घोषित करने के लिए एक बड़ा कार्यक्रम चला रहा है. जबकि वे हिंदू नहीं हैं. आदिवासी तो धार्मिक स्तर पर स्वतंत्र और प्रकृति के उपासक हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भी आदिवासियों को धर्म-स्वतंत्र करार दिया है. इसलिए आदिवासी हिंदू नहीं हैं.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )

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