पुणे, आठ जनवरी (भाषा) पश्चिमी घाटों के संरक्षण की दिशा में किए गए कार्यों के लिए प्रसिद्ध, परिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल का पुणे में निधन हो गया। वह 83 वर्ष के थे।
गाडगिल के पारिवारिक सूत्रों ने बृहस्पतिवार को यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि गाडगिल पिछले कुछ वक्त से बीमार थे और बुधवार देर रात पुणे के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली।
गाडगिल बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी) में पारिस्थितिक विज्ञान केंद्र के संस्थापक और पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (डब्ल्यूजीईईपी) के अध्यक्ष थे, जिसे गाडगिल आयोग के नाम से जाना जाता है।
संयुक्त राष्ट्र ने 2024 में गाडगिल को पश्चिमी घाटों पर उनके महत्वपूर्ण कार्य के लिए वार्षिक ‘चैंपियंस ऑफ द अर्थ’ पुरस्कार से सम्मानित किया, जो संयुक्त राष्ट्र का सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान है। पश्चिमी घाटों को वैश्विक जैव विविधता का एक प्रमुख स्थान माना जाता है।
पश्चिमी घाट यूनेस्को का विश्व धरोहर स्थल है, जो भारत के पश्चिमी तट के समानांतर फैली 1,600 किलोमीटर लंबी पर्वत श्रृंखला है। यह अपनी समृद्ध स्थानिक वनस्पतियों और जीवों के कारण वैश्विक जैव विविधता केंद्र के रूप में प्रसिद्ध है।
गाडगिल ने भारत के पारिस्थितिक रूप से नाजुक क्षेत्र पश्चिमी घाटों पर जनसंख्या दबाव, जलवायु परिवर्तन और विकास गतिविधियों के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए सरकार द्वारा गठित पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल की अध्यक्षता की थी।
गाडगिल को 2010 में उस पैनल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया, जिसने एक ऐतिहासिक रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें पश्चिमी घाटों के एक अहम हिस्से को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की गई थी। इस रिपोर्ट ने भले ही तीखी बहस छेड़ दी हो, लेकिन इसे भारत के पर्यावरण संबंधी विमर्श में एक मील का पत्थर माना जाता है।
गाडगिल का जन्म 24 मई 1942 को पुणे में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनके पिता धनंजय रामचंद्र गाडगिल एक प्रख्यात अर्थशास्त्री और गोखले संस्थान के पूर्व निदेशक थे।
माधव गाडगिल ने 1963 में फर्ग्यूसन कॉलेज से जीव विज्ञान में स्नातक और 1965 में मुंबई विश्वविद्यालय से प्राणी विज्ञान में स्नातकोत्तर किया। इसके बाद उन्होंने 1969 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की, जहां उन्होंने गणितीय पारिस्थितिकी और पशु व्यवहार पर शोध किया।
गाडगिल 1971 में भारत लौटे और फिर 1973 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में शामिल हुए। उन्होंने 2004 में आईआईएससी से सेवानिवृत्ति ली और बाद में पुणे के अगरकर अनुसंधान संस्थान और गोवा विश्वविद्यालय में अपना अकादमिक कार्य जारी रखा।
गाडगिल के योगदान के लिए उन्हें पद्म श्री (1981), पद्म भूषण (2006), शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार, वोल्वो पर्यावरण पुरस्कार और पर्यावरण संबंधी उपलब्धियों के लिए टायलर पुरस्कार सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किए गए। उनका अंतिम संस्कार आज किया जाएगा।
भाषा
शोभना मनीषा
मनीषा
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