Sunday, 3 July, 2022
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कहां हैं राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख सिपाही- आडवाणी, उमा और कटियार

सुप्रीम कोर्ट आज राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद पर फैसला सुनाएगी.

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नई दिल्ली: बाबरी मस्जिद को गिराए जाने वाले दिन की तस्वीरें उन दिनों की ध्रवीकरण की याद दिलाती है. 16वीं सदी की मस्जिद को उपद्रवी कारसेवकों ने 6 दिसंबर 1992 को गिरा दिया था. कुछ हिंदू नेताओं और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की खुशियां मनाती तस्वीर आई थी.

उमा भारती की मुरली मनोहर जोशी के साथ हाथ पकड़े हुए तस्वीर सामने आई थी. भारती विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक सिंघल के साथ हंसते हुए भी नज़र आई थी. उनके साथ आडवाणी, जोशी और पूर्व भाजपा सांसद विनय कटियार भी थे. बाद के तीनों लोग जीत की स्थिति में अपने हाथों को लहराते हुए दिखे थे.

अब सुप्रीम कोर्ट काफी लंबे समय से इंजार किए जा रहे अयोध्या मामले के फैसले के लिए तैयार है.

विश्व हिंदूू परिषद तत्कालीन अध्यक्ष अशोक सिंघल ने मंदिर आंदोलन को शुरू किया था वो अब नहीं हैं और न ही वीएचपी नेता गिरिराज किशोर हैं.

और भी कई अन्य सदस्य जो मंदिर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे वो अपने को साइडलाइन होते हुए देख रहे हैं. यहां पर उन कुछ नेताओं के कैरियर के बारे में बताया जा रहा है जो मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे हैं. जो अब पूरे मामले की सुनवाई को बाहर के पाले से देख रहे हैं.

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उमा भारती

राम मंदिर आंदोलन में उमा भारती शायद अकेली हैं जो यह कहते हुए दिखीं हैं कि बाबरी मस्जिद गिराए जाने में वो शामिल थी. अभी वो 20 दिनों की गंगा यात्रा पर हैं.

वो गंगोत्री से गंगासागर की यात्रा कर रही हैं. उनके साथ उनके कुछ साथी हैं.

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में उमा भारती केंद्रीय मंत्री थी. लेकिन इस साल हुए लोकसभा चुनाव से वो बाहर हो गई थीं. वर्तमान में वो भाजपा की उपाध्यक्ष हैं. लेकिन उनके पास कोई खास दायित्व नहीं है.

यह माना जा रहा है कि उन्हें अच्छे प्रदर्शन न करने की वजह से टिकट नहीं दिया गया था.

वाजपेयी और आडवाणी युग में उमा मुख्य चेहरा थी. उनके पास उस समय महत्वपूर्ण मंत्रालय जैसे की खेल और कोयला मंत्रालय की जिम्मेदारी थी.

उनके साथ ही कई और लोगों का नाम इस मामले में है कि हिंसा, अपराध की योजना उन्होंने बनाई थी. कोर्ट इस मामले की लगातार सुनवाई कर रही है और सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई में फैसला दिया था कि नौ महीने के भीतर इसकी पूरी सुनवाई होगी.

हालांकि उमा भारती ने मस्जिद गिराए जाने पर कभी भी माफी नहीं मांगी. इसकी वजह से देश में दंगे भी हुए थे.

दिप्रिंट को उन्होंने बताया था कि राम मंदिर के लिए वो अपनी दूसरी जान भी दे सकती हैं. उन्होंने कहा था कि कोई साजिश नहीं रची गई थी जो हुआ था वो खुले में हुआ था. मुझे गर्व है कि मैं उस आंदोलन का हिस्सा रही.

लेकिन वो अब मानो निर्वासन पर हैं. वो अपनी गंगा यात्रा से तभी आएंगी जब मंदिर आंदोलन पुकारेगा.

विनय कटियार

जब बाबरी मस्जिद गिराई गई थी तो ओबीसी नेता विनय कटियार फ़ैज़ाबाद से सांसद थे. कटियार के घर पर ही राम मंदिर से जुड़ी कर सेवा की रणनीति तैयार की गई थी और तब के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के लिए अयोध्या में जो चल रहा है उससे जुड़ी स्थिति के लिए कटियार जानकारी के अहम श्रोत थे.

राम मंदिर आंदोलन चलाने के लिए कटियार ने 1984 में बजरंग दल और वीएचपी यूथ विंग की शुरुआत की. इस दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भी रहे जिसके अलावा तीन बार वो फ़ैज़ाबाद और एक बार राज्यसभा से सांसद रहे. हालांकि, 2019 की बात करें तो कटियार ख़ुद स्वीकारते हैं कि संस्था में उनकी कोई भूमिका नहीं है.

उन्होंने कहा, ‘इन दिनों मेरे पास कोई काम नहीं है. जब कभी कोई मिलने के लिए बुलाता है तो मैं चला जाता हूं लेकिन ज़्यादातर समय मैं लखनऊ में ही होता हूं.’ हालांकि, उन्होंने ये भी कहा कि फ़ैसले से पहले वो अयोध्या जाएंगे.

उन्होंने कहा, ‘मुझे उम्मीद है कि मेरे जीवनकाल में मंदिर बन जाएगा, हमने इस दिन के लिए संघर्ष किया है.’

लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी

एक दौर में आडवाणी और जोशी मंदिर मुहिम का चेहरा हुआ करते थे, लेकिन साल 2014 में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी द्वारा भाजपा का नेतृत्व संभालने के बाद से दोनों मंदिर मुहिम के चेहरे अभी कहीं दिखाई नहीं देते. उन्हें भाजपा की संसदीय समिति से भी हटा दिया गया. पार्टी से जुड़े फ़ैसले लेने के मामले में संसदीय समिति सबसे ताकतवर बॉडी होती है. अंत में दोनों को बिना किसी ताकत वाले ‘मार्गदर्शक मंडल’ में डाल दिया गया.

हालांकि, ‘मार्गदर्शन मंडल’ ने कोई मीटिंग नहीं की और 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी को मिली हार के बाद इन दोनों ‘मार्गदर्शकों’ के ‘मार्गदर्शन’ को अनदेखा किया जाने लगा.

पूर्व डिप्टी पीएम आडवानी ने 1966 के समय से भाजपा के राजनीतिक उदय में अहम भूमिका निभाई, लेकिन उन्हें राष्ट्रपति तक का पद नहीं मिला. वाजपयी के दौर में जोशी केंद्रीय मंत्री रहे हैं, लेकिन उन्हें भी उप-राष्ट्रपति का पद नहीं मिला. इस साल के लोकसभा चुनाव में दोनों को गांधीनगर और कानपुर की उन सीटों से टिकट नहीं मिला जो दोनों का गढ़ रहा है.

जोशी तो अक्सर सभाओं में बोलते पाए जाते हैं लेकिन लोकसभा में अक्सर अपनी बातों से प्रभावित करने के लिए जाने जाने वाले आडवाणी ऐसी सभाओं से भी दूर हैं. अब वो परिवार के साथ नई जगहें घूमने में लगे हैं, हाल ही में वो हिमाचल प्रदेश और केरल के ट्रिप पर गए थे.

कल्याण सिंह

6 दिसंबर 1992 में जब बाबरी मस्जिद को गिराया गया था तब कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. वो राज्य में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री थे. उन्होंने इसकी जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.

वो उन लोगों में से थे जो राजनीतिक केंद्र में थे. इसी साल सितंबर में राजस्थान के राज्यपाल के तौर पर उनका कार्यकाल खत्म हुआ है.

2014 में मोदी सरकार बनते ही उन्हें राज्यपाल बनाया गया था. भाजपा के भीतर से ही लोग कह रहे थे कि 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव में लोध समुदाय को देखते हुए ऐसा किया गया.

राज्यपाल के कार्यकाल खत्म होते ही उनके ऊपर फिर से ट्राइल शुरू हो गया है.

गोविंदाचार्य और प्रवीण तोगड़िया

उत्तर प्रदेश और बिहार में सोशल इंजीनियरिंग और कास्ट राजनीति को बनाने वाले गोविंदाचार्य पिछले एक दशक से गुमनामी का जीवन जी रहे हैं.

वो भाजपा के सबसे ताकतवर महासचिवों में से थे. लेकिन 1996 में वाजपेयी के साथ हुए मतभेदों के बाद उनका कैरियर गिरना लगा. उन्होंने वाजपेयी को भाजपा का मुखौटा कहा था. 2007 में राजनाथ सिंह के भाजपाध्यक्ष कार्यकाल के दौरान उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया था.

आरएसएस ने गोविंदाचार्य को भाजपा में लाने की कोशिश की थी लेकिन भाजपा में इसका विरोध हुआ था. उन्होंने सामाजिक कार्यों के लिए राष्ट्रीय स्वाभिमान मंच बनाई थी और फिलहाल गुमनामी का जीवन बिता रहे हैं. एक समय में वो मोदी के साथ प्रचारक थे और दोनों के मेंटर आडवाणी थे.

तोगड़िया को भी वीएचपी से इस्तीफा देने पर मजबूर किया गया. मोदी के साथ मतभेद के कारण ऐसा किया गया. मोदी के साथ तोगड़िया गुजरात के दिन से ही थे.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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