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नयी दिल्ली, 16 जनवरी (भाषा) उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने शुक्रवार को कहा कि विचारों की विविधता के बीच शालीनता और गरिमा के साथ बहस, संवाद और चर्चा को सुगम बनाना विश्वभर की विधायिकाओं के पीठासीन अधिकारियों की साझा और प्राथमिक जिम्मेदारी है।
राधाकृष्णन ने राष्ट्रमंडल देशों की संसदों के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के 28वें सम्मेलन के इतर यहां उनके सम्मान में भोज का आयोजन किया। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक संविधान सदन (पुराना संसद भवन) साढ़े सात दशकों से अधिक समय से भारत के जीवंत और समृद्ध संसदीय लोकतंत्र का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन राष्ट्रमंडल लोकतंत्रों को एकजुट करने वाले सामूहिक सद्भाव और साझा उद्देश्य की भावना को दर्शाता है। उन्होंने भारत की सभ्यतागत विचारधारा से प्रेरित संवाद, सहयोग और पारस्परिक सम्मान द्वारा एक साथ आगे बढ़ने के महत्व पर जोर दिया।
संसदीय अध्यक्षों और पीठासीन संवैधानिक अधिकारियों की भूमिका का उल्लेख करते हुए राधाकृष्णन ने विचारों की विविधता के बीच शालीनता और गरिमा के साथ बहस, संवाद और चर्चा को सुगम बनाने की साझा और प्राथमिक जिम्मेदारी पर जोर दिया।
राज्यसभा के सभापति ने कहा कि राष्ट्रमंडल देशों की भौगोलिक स्थिति, संस्कृति और ऐतिहासिक अनुभव भिन्न हैं, फिर भी वे समान संसदीय लोकाचार और लोकतांत्रिक सिद्धांतों एवं मूल्यों के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता से बंधे हैं।
उन्होंने कहा कि पीठासीन अधिकारी विधायिका की गरिमा और लोगों की आकांक्षापूर्ण आवाज के अंतिम संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं, जिन्हें लोकतंत्र के पवित्र सदन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यवस्थित आचरण के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन बनाये रखने का दायित्व सौंपा गया है।
भाषा
देवेंद्र प्रशांत
प्रशांत
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