गुरुग्राम: जब पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने पत्रकार राम चंदर छत्रपति की हत्या के मामले में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को दी गई उम्रकैद की सज़ा को रद्द किया, तो इसका कारण यह नहीं था कि अदालत ने उसे निर्दोष पाया. बल्कि इसलिए कि अभियोजन पक्ष उसके अपराध को साबित ही नहीं कर पाया.
अन्य तीन आरोपी—कुलदीप सिंह उर्फ काला, जिसने गोली चलाई; निर्मल सिंह, जो उसके साथ था; और कृष्ण लाल, जो डेरा का मैनेजर था और जिस पर अपना लाइसेंसी रिवॉल्वर और वॉकी-टॉकी देने का आरोप था, की सज़ा उसी फैसले में बरकरार रखी गई, जो 7 मार्च को सुनाया गया.
सोमवार को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किए गए फैसले के अनुसार, अदालत को इन तीनों के खिलाफ मजबूत सबूत मिले, लेकिन राम रहीम के खिलाफ ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जो जांच में टिक सके.
राम चंदर छत्रपति सिरसा से निकलने वाले शाम के अखबार पूरा सच के संपादक थे. उन्होंने 31 मई 2002 को एक साध्वी (शिष्या) का गुमनाम पत्र प्रकाशित किया था, जिसमें डेरा में हो रहे यौन शोषण का विवरण था. 24 अक्टूबर 2002 को उनके घर के बाहर उन्हें गोली मार दी गई और एक महीने बाद 21 नवंबर 2002 को उनकी मौत हो गई.
11 जनवरी 2019 को पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत ने राम रहीम और तीन अन्य को हत्या और आपराधिक साजिश का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी.
डेरा प्रमुख के खिलाफ आरोप आईपीसी की धारा 120-बी के तहत आपराधिक साजिश का था, कि उन्होंने अपने अनुयायियों को पत्रकार को खत्म करने का निर्देश दिया था.
यह आरोप लगभग पूरी तरह एक ही व्यक्ति के बयान पर आधारित था.
खट्टा सिंह के बदलते बयान
खट्टा सिंह, जिसे सीबीआई ने राम रहीम का ड्राइवर और कथित साजिश का अकेला प्रत्यक्षदर्शी बताया था, इस केस का सबसे अहम गवाह माना जा रहा था.
लेकिन हाईकोर्ट के शब्दों में वह ऐसा गवाह निकला जो “पिंग-पोंग बॉल की तरह बार-बार एक तरफ से दूसरी तरफ उछलता रहा.”
जब सीबीआई ने जून 2007 में उसका बयान दर्ज किया, जो छत्रपति को गोली लगने के करीब पांच साल बाद था—तो खट्टा सिंह ने कहा कि 23 अक्टूबर 2002 की शाम वह राम रहीम के साथ जालंधर में एक सत्संग में गया था.
उसने कहा कि जब वो उसी दिन सिरसा डेरा लौटा (राम रहीम), तो अन्य आरोपियों ने राम रहीम को उस दिन का पूरा सच अखबार दिखाया. इससे डेरा प्रमुख नाराज़ हुआ और उसने पत्रकार को “खत्म” करने का आदेश दिया. इसके अगले दिन शाम को हत्या हुई.
सीबीआई ने यह बयान आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 164 के तहत दर्ज किया. ऐसे बयान तब दर्ज किए जाते हैं जब पुलिस या एजेंसी को डर होता है कि गवाह बाद में मुकर सकता है.
लेकिन सीबीआई को यह बयान देने से पहले ही खट्टा सिंह अदालत में एक अलग कहानी बता चुका था.
मार्च 2007 में उसने अंबाला के एक न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन देकर आरोप लगाया कि सीबीआई अधिकारी उसे हत्या के मामलों में फंसाने की धमकी दे रहे हैं, अगर वह राम रहीम के खिलाफ झूठा बयान नहीं देता. उसने इसी तरह की शिकायतें अंबाला के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश और सिरसा के एसपी से भी की थीं.
जब वह ट्रायल में अभियोजन पक्ष का गवाह बनकर आया, तो वह मुकर गया. उसने सीबीआई के सामने दिए बयान से इनकार कर दिया और कहा कि उस पर दबाव डाला गया था. उसका बयान मई 2012 से अप्रैल 2013 तक करीब एक साल चला.
आखिरी मोड़ सितंबर 2017 में आया, जब साध्वी यौन शोषण केस में राम रहीम को दोषी ठहराया गया था.
खट्टा सिंह ने आवेदन देकर कहा कि इस सज़ा से उसे अब “सच बोलने की हिम्मत” मिली है और उसे फिर से गवाह के रूप में बुलाया जाए.
शुरुआत में विशेष सीबीआई अदालत ने इसे खारिज कर दिया, लेकिन हाईकोर्ट की एकल पीठ ने अनुमति दे दी. इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन वहां भी इसे खारिज कर दिया गया. इसके बाद खट्टा सिंह को फिर बुलाया गया और इस बार उसने सीबीआई के पक्ष में बयान दिया.
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने उसके इस पूरे व्यवहार को उसकी विश्वसनीयता के लिए घातक माना. अदालत ने कहा कि जो गवाह हर बात पर अपना बयान पूरी तरह बदल देता है, उसके किसी भी बयान पर भरोसा नहीं किया जा सकता.
अदालत ने यह भी पूछा कि अगर खट्टा सिंह डेरा से डरता था, तो उसने 26 दिसंबर 2006 को रणजीत सिंह हत्या मामले में राम रहीम का नाम क्यों लिया, लेकिन उसी समय छत्रपति केस में कुछ नहीं कहा?
बेंच ने कहा, “यह समझ में नहीं आता कि उसे डर सिर्फ इसी मामले में क्यों था और रणजीत सिंह मामले में क्यों नहीं.”
अदालत ने आगे कहा कि उसके व्यवहार से यह लगता है कि वह डेरा के डर से चुप नहीं था, बल्कि जांच एजेंसी के दबाव में बयान दे रहा था. अदालत ने कहा, “ऐसा लगता है कि सीबीआई ने जांच जल्दी खत्म करने के दबाव में उससे बयान दिलवाया. यह बेहद चिंता की बात है कि एक प्रमुख जांच एजेंसी ने ऐसा तरीका अपनाया.”
वह सत्संग जिसकी जांच ही नहीं हुई
हाईकोर्ट ने पाया कि खट्टा सिंह की कहानी की बुनियाद ही पक्की नहीं थी. उसके अनुसार पूरी साजिश 23 अक्टूबर को जालंधर में हुए सत्संग के बाद बनी थी.
लेकिन अदालत ने कहा कि सीबीआई ने न जालंधर जाने की पुष्टि की, न सत्संग की, न उसी दिन सिरसा लौटने की, और न ही 24 अक्टूबर को खट्टा सिंह के दिल्ली जाने की.
सीबीआई जांच के प्रमुख एम. नारायणन ने जिरह में यह बात स्वीकार की.
अदालत के सामने पूरा सच अखबार का 27 अक्टूबर 2002 का अंक भी रखा गया, जिसमें बताया गया था कि सत्संग जालंधर में नहीं बल्कि जीरा में हुआ था. जीरा जालंधर से करीब 150 किलोमीटर दूर है.
अखबार में यह भी लिखा था कि उस सत्संग में बचा हुआ खाना खाने से कुछ गायों की मौत हो गई थी.
इस तरह सीबीआई का मुख्य गवाह अपनी कहानी ही गलत शहर में बता रहा था और जांच एजेंसी ने इसे कभी जांचने की कोशिश नहीं की.
पुलिस अधिकारी जिसे बुलाया ही नहीं गया
फैसले में सबसे कड़ी आलोचना उस बात पर है कि सीबीआई ने सब-इंस्पेक्टर राम चंदर को गवाह के रूप में पेश ही नहीं किया.
यही वह पुलिस अधिकारी थे जिन्होंने 26 अक्टूबर 2002 को पीजीआई रोहतक में घायल राम चंदर छत्रपति का मरते समय दिया गया बयान दर्ज किया था.
छत्रपति के परिवार का कहना था कि उस बयान में उन्होंने राम रहीम का नाम लिया था, लेकिन पुलिस अधिकारी ने दबाव में उसे लिखित बयान में शामिल नहीं किया.
वहीं बचाव पक्ष का कहना था कि बयान में राम रहीम का नाम था ही नहीं और इसलिए सीबीआई ने उसे पेश नहीं किया.
सीबीआई ने राम चंदर को “अनावश्यक” बताते हुए गवाहों की सूची से हटा दिया.
हाईकोर्ट ने इसे समझ से बाहर बताया. अदालत ने कहा कि मेडिकल रिकॉर्ड से पता चलता है कि 26 अक्टूबर से 1 नवंबर तक छत्रपति होश में थे और बयान देने की स्थिति में थे, फिर भी उनसे दोबारा बयान लेने की कोशिश नहीं की गई.
अदालत ने कहा, “वह सबसे महत्वपूर्ण गवाह थे. क्योंकि A1 (राम रहीम) के खिलाफ आरोप सिर्फ आपराधिक साजिश का था, इसलिए एसआई राम चंदर का बयान दोनों पक्षों के लिए बेहद अहम होता.”
अदालत ने यह भी कहा कि वह यह नहीं कह रही कि पुलिस अधिकारी ने जानबूझकर राम रहीम को बचाया या सीबीआई ने बयान छिपाया, लेकिन इतना ज़रूर है कि जब इतना महत्वपूर्ण गवाह पेश नहीं किया गया तो अदालत के मन में संदेह पैदा होता है.
ऐसी स्थिति में संदेह का फायदा आरोपी को देना पड़ता है.
ट्रायल कोर्ट का फैसला
ट्रायल कोर्ट ने खट्टा सिंह के बदले हुए बयान को स्वीकार कर लिया था और उसके धारा 164 के बयान को समर्थन मान लिया था. उसने जालंधर सत्संग की जांच न होने या एसआई राम चंदर को गवाह न बनाने पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.
ट्रायल कोर्ट ने माना कि राम रहीम के पास छत्रपति से नाराज़ होने का कारण था और यह भी संभव है कि उसके अनुयायियों ने उनके कहने पर काम किया हो.
लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि कारण और संभावना होना सबूत नहीं होता.
अदालत ने कहा, “अभियोजन पक्ष A1 के खिलाफ अपना मामला संदेह से परे साबित नहीं कर पाया.”
राम रहीम फिलहाल जेल में ही है और साध्वी रेप केस में 20 साल की सज़ा काट रहा है. छत्रपति हत्या केस में बरी होने से उस सज़ा पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
छत्रपति के बेटे अंशुल ने शनिवार को दिप्रिंट से कहा कि वह इस फैसले से निराश हैं और सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे.
राम रहीम के वकील जितेंद्र खुराना ने कहा कि डेरा प्रमुख के अनुयायियों को हाईकोर्ट पर पूरा भरोसा है.
उन्होंने कहा, “पूज्य गुरु गुरमीत राम रहीम सिंह को हाईकोर्ट ने बरी कर दिया है. सच्चाई की जीत हुई है. हम हमेशा कहते रहे हैं कि गुरु जी निर्दोष हैं और किसी भी मामले में उनका कोई संबंध नहीं है. हम हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
