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Friday, 14 June, 2024
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RTI, UAPA और तीन तलाक-3 प्रमुख मामलों से जुड़ी याचिकाओं पर 2019 के बाद से SC में केवल एक बार सुनवाई हुई

तीनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा था जो अब तक दायर नहीं किया गया है. याचिकाकर्ताओं और वकीलों का कहना है कि यह ‘केंद्र के स्तर पर गंभीरता की कमी’ को दर्शाता है.

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नई दिल्ली: नागरिक अधिकारों के सवालों से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ एक बार सुनवाई हुई है और अब भी उन पर निर्णायक फैसले का इंतजार है.

तीन ऐसे उल्लेखनीय मामलों में तीन तलाक को आपराधिक कृत्य बनाने वाले कानून को अवैध घोषित करने की मांग वाली याचिकाएं और आतंकवाद विरोधी कानून—गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम—में संशोधन रद्द करने की अपील शामिल हैं, जो सरकार को कोई सफाई सुने बिना ही किसी व्यक्ति को आतंकी घोषित करने का अधिकार देता है. इसके अलावा सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम को कमजोर करने वाले संशोधनों के खिलाफ एक एकल याचिका भी विचाराधीन है.


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तीन तलाक पर याचिकाएं

सुप्रीम कोर्ट में नौ रिट याचिकाएं स्वीकार की गई हैं, जिसमें मुस्लिम समुदाय में तीन तालक के माध्यम से वैवाहिक संबंध विच्छेद को एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध बनाने वाला कानून लाने के केंद्र सरकार के कदम को चुनौती दी गई है. इस कानून के तहत तीन साल की कैद की सजा का भी प्रावधान भी है.

इस कानून को मुस्लिम महिला (विवाह अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 कहा गया है. शीर्ष अदालत ने अगस्त 2017 के अपने फैसले में एक बार में तीन तलाक की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया था. केंद्र ने इसे मुस्लिम महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम बताया है.

हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत के समक्ष दलील दी कि विवाह के मामले को दीवानी की जगह आपराधिक बनाना गलत है क्योंकि इससे पति-पत्नी के बीच सुलह के सारे रास्ते बंद हो जाएंगे.

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उन्होंने कहा कि इसमें अत्यधिक और असंबद्ध सजा का प्रावधान है. कोर्ट से कहा गया कि भारतीय दंड संहिता के तहत कई ऐसे गंभीर अपराध हैं जिनके लिए इससे कम सजा निर्धारित की गई है.

पहली चार याचिकाओं पर 23 अगस्त 2019 को केंद्र को नोटिस जारी किए गए थे. इसके बाद दायर अन्य याचिकाओं पर केंद्र से 13 सितंबर, 20 सितंबर, 14 अक्टूबर और 13 नवंबर 2019 को जवाब मांगा गया था.

कोर्ट के आदेश पर अमल संबंधी रिपोर्ट के लिए याचिकाओं के दो बैच दो बार में—30 सितंबर 2019 और 25 अक्टूबर 2019—रजिस्ट्रार के समक्ष सूचीबद्ध किए गए थे. इसमें पाया गया कि सभी मामलों में नोटिस दिए जाने के बावजूद केंद्र की ओर से कोई पेश नहीं हुआ.

2020 में दो और याचिकाएं शीर्ष अदालत में पहुंचीं, जिन पर 6 मार्च और 6 जुलाई को केंद्र को जवाब दाखिल करने को कहा गया.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता एम.आर. शमशाद ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए प्राथमिकता निर्धारित करने के सुप्रीम कोर्ट में एकसमान नियम न होने पर नाखुशी जताई है.

उन्होंने कहा, ‘संसद से कानून को मंजूरी मिलने के बाद से ये मामले (तीन तलाक पर) अगस्त 2019 से लंबित हैं. विभिन्न मामलों को सूचीबद्ध करने और उसके निपटारे में प्राथमिकता और निरंतरता हमेशा एक मुद्दा रही है. शीर्ष अदालत की ओर से मामलों को सूचीबद्ध करने, सुनवाई और निपटारे के लिए एक पारदर्शी तंत्र बनाने की जरूरत हैं.’

यूएपीए

संसद से आतंकवाद निरोधक कानून, यूएपीए की धारा 35 में संशोधन को मंजूरी मिलने के करीब एक महीने बाद सुप्रीम कोर्ट में सितंबर 2019 में दायर दो याचिकाओं पर उस महीने सिर्फ एक बार सुनवाई हुई—6 सितंबर को.

नागरिक अधिकारों से जुड़े एक एनजीओ एसोसिएशन ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स, जो आतंकवाद के आरोपों का सामना करने वाले लोगों की मदद करता है, और एक्टिविस्ट सजल अवस्थी ने यूएपीए में संशोधन को खारिज करने की मांग की है क्योंकि यह ‘आतंकवादी’ घोषित कर दिए गए किसी व्यक्ति को सफाई का मौका भी नहीं देता, जो उसके नागरिक अधिकारों का हनन है.

याचिकाकर्ताओं ने अपनी अपील में कहा है कि इस तरह का कानून संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करता है और केंद्र सरकार को ऐसी विवेकाधीन, असमान और असीमित शक्तियां प्रदान करता है जो समानता के अधिकार संबंधी अनुच्छेद 14 के खिलाफ है.

तत्कालीन प्रधान न्यायाधीन रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पीठ ने सुनवाई की पहली तारीख पर ही नोटिस जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि अदालत मामले को देखेगी. हालांकि, इस मामले को शीर्ष अदालत में एक और सुनवाई का अभी इंतजार ही हो रहा है.

दो याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रही अधिवक्ता फौजिया शकील ने दलीलों का महत्व रेखांकित करते हुए दिप्रिंट को बताया, ‘यूएपीए संशोधन की संवैधानिकता से केंद्र को नोटिस या सुनवाई बिना किसी भी व्यक्ति को आतंकी घोषित करने का अधिकार मिलना मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को लेकर गंभीर सवाल उठाता है.’

फौजिया ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत केंद्र को नोटिस जारी किए गए थे. हालांकि, उनकी ओर से अदालत में कोई जवाब नहीं भेजा गया है.

उन्होंने कहा, ‘सितंबर 2019 में नोटिस जारी होने के बावजूद केंद्र ने अब तक कोई जवाब दाखिल नहीं किया है और मामले पर सुनवाई नहीं हुई है. एक वर्ष से ज्यादा समय बीत गया है और सरकार ने संशोधित यूएपीए के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल भी किया है. कई लोग बतौर आतंकवादी अधिसूचित हो चुके हैं जबकि इसकी संवैधानिकता का मुद्दा अभी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित ही है.’

उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि वह ‘जानबूझकर अपना जवाब दाखिल न करके मामले में पीछे हट रही है’. साथ ही जोड़ा कि ‘केंद्र इस मुद्दे को जल्दी निपटाने में शीर्ष अदालत की कोई खास रुचि न होने का पूरा फायदा उठा रहा है.’


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सूचना का अधिकार

आरटीआई अधिनियम 2005 में संशोधन को अल्ट्रा वायर (असीमित शक्तियां देने वाला) घोषित करने की कांग्रेस सांसद जयराम रमेश की एक याचिका पर 31 जनवरी 2020 को शीर्ष अदालत द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद आदर्श रूप से चार सप्ताह बाद ही सुनवाई होनी चाहिए थी.

इस मामले में सरकार से जवाब मांगने के साथ न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने उम्मीद जताई थी कि आदेश चार हफ्ते में ही आ जाएगा. हालांकि, 11 महीने से अधिक समय बीत जाने बाद भी ये मामला शीर्ष कोर्ट की कार्यसूची तक में जगह बनाने में नाकाम रहा है.

रमेश की याचिका में कहा गया था कि संशोधन इस कानून के उद्देश्य को कमजोर करता है क्योंकि यह केंद्र सरकार को सूचना आयुक्तों का कार्यकाल और उनका वेतन तय करने की अनुमति देता है, जो पूरी तरह उनकी ‘स्वतंत्रता को नष्ट करने’ वाला है.

जुलाई 2019 में पारित नया कानून सूचना आयुक्त के कार्यकाल को विचार योग्य बनाता है जो ‘पूरी तरह केंद्र सरकार की इच्छा के अधीन होगा और उनका वेतन भी उस पर ही निर्भर करेगा.’ यह अधिकारियों को आरटीआई अधिनियम में मिली ‘उनकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता’ से वंचित करता है.

याचिका में दावा किया गया था कि यह संशोधन केंद्र सरकार को ‘बेलगाम और असीमित विवेकाधीन शक्तियां प्रदान करता है, जो सूचना आयुक्तों की स्वतंत्रता को खतरे में डालने वाली है.’

जयराम रमेश के वकील सुनील फर्नांडिस ने दिप्रिंट से बातचीत में कहा कि कांग्रेस सांसद की याचिका में शीर्ष अदालत से अपने अधिकारों के इस्तेमाल की अपील की गई थी और वह केवल ‘उम्मीद’ कर सकते हैं कि यह जल्द से जल्द सूचीबद्ध हो जाए.

फर्नांडिस ने कहा, ‘यह सार्वजनिक महत्व के मुद्दों से जुड़े कानून पर बड़े सवाल उठाता है. यह सर्वविदित तथ्य है कि सूचना का अधिकार कानून प्रशासन में पारदर्शिता लाने और सार्वजनिक अधिकारियों को जवाबदेह बनाने की दिशा में एक लंबा रास्ता तय कर चुका है. हालांकि, हाल के संशोधनों ने इसके प्रभावकारी होने को लगभग खत्म कर दिया है.’

फर्नांडिस ने कहा कि नोटिस जारी होने के महीनों बाद भी केंद्र सरकार ने अपना जवाब दाखिल नहीं करने का फैसला किया है. यह बताता है कि ‘केंद्र के स्तर पर गंभीरता का अभाव’ है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने  के लिए यहां क्लिक करें)


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