Tuesday, 24 May, 2022
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शिवसेना एक नाम अनेक- पटियाला संघर्ष के बाद पंजाब में उभरकर आए कई शिवसेनाओं के नाम

पंजाब में दर्जन भर से अधिक देसी शिव सेनाएं काम कर रही हैं और उन सभी के दो लक्ष्य नज़र आते हैं: खालिस्तान आंदोलन का जो कुछ भी बचा है उसपर निशाना साधना, और पुलिस सुरक्षा हासिल करना.

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पटियाला: पिछले शुक्रवार पटियाला में एक ‘खालिस्तान-विरोधी’ प्रदर्शन को लेकर सिख और हिंदू समूहों के बीच हिंसक टकरावों ने, पंजाब में शिवसेना को उजागर कर दिया है जिसने कथित रूप से रैली का आह्वान किया था.

लेकिन, ये मामला उतना सीधा नहीं है. राज्य में कई देसी शिव सेनाएं हैं जिनका ज़ाहिरी तौर पर नाम के अलावा, महाराष्ट्र-स्थित शिव सेना के साथ कोई रिश्ता नहीं है.

शुक्रवार की घटना के कुछ घंटों के बाद ही पुलिस ने हरीश सिंगला को गिरफ्तार कर लिया, जो राज्य में शिवसेना (बाल ठाकरे) का कार्यकारी अध्यक्ष होने का दावा करता था. बाद में जल्द ही ख़बरें आ गईं कि उसे पार्टी से निकाल दिया गया है, जो महाराष्ट्र-स्थित शिव सेना की पंजाब इकाई है.

लेकिन, पार्टी नाम के बाद में शब्द जोड़ने की क्या ज़रूरत है? पंजाब में पार्टी प्रमुख योगराज शर्मा के अनुसार ऐसा करना इसलिए ज़रूरी था, कि राज्य में बहुत सारी असंबंधित शिव सेनाएं मौजूद हैं.

शर्मा ने कहा, ‘हमें विशेष रूप से कहना पड़ता है कि हम उस शिवसेना का हिस्सा हैं, जिसकी स्थापना बालासाहेब ठाकरे ने महाराष्ट्र में की थी’.

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उन्होंने आगे कहा, ‘पंजाब में 15-16 फर्ज़ी शिव सेनाएं हैं, जिनकी कोई पहचान नहीं है, कोई पंजीकरण नहीं है, जिनका हमारे मुम्बई कार्यालय से कोई वास्ता नहीं है, लेकिन फिर भी वो हमारा नाम रखती हैं’. शर्मा, जिन्होंने पहले सिंगला को पार्टी का उपाध्यक्ष बताया था, उन्होंने रैली से दूरी बनाने की कोशिश की जिसे उन्होंने शर्मा की व्यक्तिगत पहल बताया.

पंजाब की शिवसेनाएं जिनका कोई स्थाई ठिकाना स्पष्ट नहीं है, उनमें कुछ हैं शिव सेना (हिंदू), शिव सेना (पंजाब), शिव सेना (टकसाली), शिव सेना (हिंदुस्तान), शिव सेना (शेरे हिंद), और शिव सेना (समाजवादी).

शर्मा और पंजाब कांग्रेस तथा अकाली दल नेताओं के अनुसार, जो नाम नहीं बताना चाहते, इन स्वयंभू शिव सेनाओं की कोई राजनीतिक वैधता नहीं है, ये चुनाव नहीं लड़तीं, और सिख समूहों से टकराव को भड़काने के अलावा इनका कोई और उद्देश्य नहीं है.

लेकिन, हालांकि इनमें से अधिकतर शिव सेनाएं हाशिए पर काम कर रहे मामूली समूह हैं, लेकिन इनमें से कई को राज्य द्वारा स्वीकृत सुरक्षा मिली हुई है. मसलन, गिरफ्तारी के समय सिंगला के पास X-श्रेणी की सुरक्षा थी. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इससे उन्हें अपने रसूख़ के दिखावे में मदद मिलती है, और वो बेधड़क होकर आग लगाने वाले बयान देते रहते हैं.

आख़िर शिव सेनाओं की ये बहुतायत कैसे पैदा हुई, और ये क्या काम करती हैं?

पंजाब में ‘शिव सेनाओं’ का उदय

उथल-पुथल भरे 1980 के दशक के मध्य में खालिस्तानी उग्रवाद के दिनों में- जब राम जन्मभूमि मुद्दा भी ज़ोर पकड़ रहा था- तो उत्तर भारत में दो अलग अलग राजनीतिक धाराएं हिंदू पहचान के इर्द-गिर्द एक साथ मिल रहीं थीं.

1986 में इंडिया टुडे में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) देश भर में हर जगह हिंदुओं की आवाज़ होने का दावा करता था, लेकिन पंजाब में ये शिवसेना थी जिसने ख़ुद को इस भूमिका में रखा था.

पंजाब की शिवसेना महाराष्ट्र की अपनी पुरानी हमनाम से काफी अलग थी, जिसकी स्थापना 1966 में बाल ठाकरे ने की थी.

दोनों शिवसेनाओं ने एक कठोर हिंदुत्व रुख़ इख़्तियार किया, और महाराष्ट्र के शिव सैनिकों ने 17वीं सदी के मराठा योद्धा-शासक छत्रपति शिवाजी से अपनी प्रेरणा ली. लेकिन इस बीच उनके पंजाब समकक्षियों ने अपने आपको भगवान शिव के सैनिकों के रूप में ढाला, जो सबसे महत्वपूर्ण हिंदू देवताओं में से एक हैं.

और, जहां महाराष्ट्र शिवसेना ने 1980 के दशक में मुख्य रूप से मुसलमानों और बाहरी लोगों के खिलाफ एक आक्रामक रुख़ इख़्तियार किया, वहीं पंजाब शिवसेना ने काफी हद तक सिखों को अपने निशाने पर रखा.

इसके अलावा, पंजाब की शिवसेना में शुरू से ही कई गुट हो गए थे.

तथाकथित लुधियाना गुट के शुरुआती नेताओं में एक थे जगदीश टांगड़ी, जिन्हें 2002 में कई अन्य लोगों के साथ हथियार रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया- जिनमें कथित रूप से ‘सैकड़ों तलवारें’ और बहुत से कृपाण और बंदूक़ें थीं. टांगड़ी को 2011 में तीन साल की सज़ा सुनाई गई, लेकिन 2013 में 80 वर्ष की आयु में उनकी मौत हो गई.

पिछले साल एक इंटरव्यू में उनके बेटे सुनील टांगड़ी ने- हथियार मामले में उन्हें भी सज़ा सुनाई गई थी- कहा कि शिव सेना की जड़ें पंजाब में थीं: ‘1980-81 में हमने अपने धार्मिक आस्थाओं के अनुरूप भगवान शिव के नाम पर इस पार्टी की स्थापना की थी’.

पटियाला में 29 अप्रैल की झड़प के बाद सिख प्रदर्शनकारी | पीटीआई

सुनील टांगड़ी अब अखिल भारतीय शिवसेना राष्ट्रवादी कही जाने वाली एक राजनीतिक पार्टी के प्रमुख हैं, जिसने बठिंडा से दो लोकसभा चुनाव (2009 और 2014) लड़े और हारे हैं. उसने 2002 में चार और 2007 में दो विधान सभा सीटों पर भी चुनाव लड़ा, लेकिन सभी पर हार गई.

पंजाब की किसी भी देसी शिव सेना का कुल मिलाकर यही चुनावी इतिहास है.

पटियाला की पंजाब यूनिवर्सिटी में धार्मिक अध्ययन के प्रोफेसर गुरमीत सिंह सिद्धू के अनुसार, राज्य की तमाम शिव सेनाएं ‘सांप्रदायिक संगठन’ हैं जिनकी कोई राजनीतिक वैधता नहीं है.

सिद्धू ने कहा, ‘महाराष्ट्र में शिवसेना एक राजनीतिक पार्टी है…लेकिन पंजाब में शिवसेना की ऐसी कोई राजनीतिक ब्रांडिंग नहीं है’.

फिर भी, ये नाम बना रहा है और बहुत से ‘संगठनों’ ने इसे हथिया लिया है, जिनके सही कामकाज और ‘मूल’ शिवसेना के साथ उनके रिश्तों पर भ्रम ही बना रहा है.


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पंजाब में आज के शिव सैनिक क्या करते हैं?

‘मूल’ शिव सेना और सुनील टांगड़ी की अखिल भारतीय शिवसेना राष्ट्रवादी ने भी पंजाब में मौजूद अनिश्चित मूल की बहुत सी शिव सेनाओं की शिकायतें की हैं.

पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष योगराज शर्मा ने दिप्रिंट से कहा, ‘आज के पंजाब के तथाकथित शिवसैनिक जनता के लिए कुछ नहीं करते, वो बस अपने अहंकार को संतुष्ट करने में लगे रहते हैं’.

उन्होंने आगे कहा, ‘लॉकडाउन के दौरान शिवसेना ने लोगों को राहत पहुंचाने में सराहनीय कार्य किया था, लेकिन इन लोगों ने कुछ नहीं किया है. असली शिवसैनिक लोगों के मुद्दे उठाते हैं, चाहे वो महंगाई हो या बिजली कटौती, लेकिन ये लोग बेकार के मुद्दों का राग अलापते हैं और विवादित बयान देते रहते हैं’.

पहले हवाला दिए गए इंटरव्यू में सुनील टांगड़ी ने शिकायत की, कि पंजाब के स्वयंभू शिवसैनिक ‘आलसी’ हैं और ऐसे मुद्दे नहीं उठाते जो लोगों को प्रभावित करते हैं. उन्होंने कहा कि इसकी बजाय वो अतीत में डूबे हुए हैं, और उनपर अभी भी उग्रवाद की चिंता सवार है हालांकि अब वो कोई अहम मुद्दा नहीं रह गया है.

ये आंकलन कोई बहुत ग़लत नहीं है- पंजाब के अलग अलग शिव सैनिकों में जो चीज़ आम है, वो है खालिस्तान अलगाववादी आंदोलन के खिलाफ उनकी निरंतर बयानबाज़ी, जो 1980 के दशक से 1990 के शुरुआती दशक तक एक ज्वलंत मुद्दा था, लेकिन फिलहाल उसके सिर्फ अंगारे बचे हैं.

पंजाब के शिव सैनिकों द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न फेसबुक पन्नों से एक तरह का पैटर्न सामने आता है. पहले वो खालिस्तान की निंदा करते हैं, जिसमें अकसर तीखे अपशब्द होते हैं, और फिर स्थानीय ख़बरों के लेख साझा करते हैं, जिनमें सिख उग्रवादियों से धमकियां मिलने की बातें होती हैं.

इन दावों की सच्चाई की कोई गारंटी नहीं होती- मसलन, 2017 में शिव सेना (हिंद) के कई सदस्यों को, कथित रूप से धमकियां मिलने की झूठी कहानियां बनाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.

अब सवाल ये उठता है कि आख़िर ये सब ऐसा क्यों करते हैं?

2017 के मामले में फर्ज़ी धमकियों के पीछे का उद्देश्य कथित तौर पर अधिक पुलिस सुरक्षा हासिल करना था.

योग राज शर्मा के अनुसार बहुत सी शिव सेनाओं के अंदर आज भी यही इच्छा रहती है. उन्होंने कहा, ‘उनकी एक कार्यप्रणाली होती है- सिखों के खिलाफ चिल्लाएंगे, फिर कहेंगे कि हमें धमकियां दी जा रही हैं, और फिर इनका इस्तेमाल पुलिस से सुरक्षा हासिल करने के लिए करेंगे’.

तो, अधिक सुरक्षा की इच्छा क्यों?

शर्मा ने कहा कि हाशिए के वो समूह जिन्हें कोई सियासी पार्टी बहुत गंभीरता से नहीं लेती, सुरक्षा कवर से उनके बहुत सारे काम पूरे होते हैं. उनके भीड़ को भड़काने वाले तरीक़े अगर उल्टे भी पड़ जाएं, तो इस पुलिस सुरक्षा से उनके महत्व और संरक्षण का एक आभामंडल सा बना रहता है.

शर्मा ने आगे कहा, ‘ऐसा नहीं है कि वो अन्यथा असुरक्षित महसूस करते हैं…जब वो बाहर लोगों के बीच जाते हैं, और अगर उनके साथ 10-15 पुलिसकर्मी चल रहे हैं, तो ऐसे में उनके मत को वैधता सी मिल जाती है.

उन्होंने कहा कि इस सबके ऊपर एक ठोस सुरक्षा कवर रहने से शिव सैनिकों को लोगों को उकसाने और भड़काने की और छूट मिल जाती है.

शर्मा ने आगे कहा, ‘बो बिना सोचे-समझे किसी पर भी हाथ उठा सकते हैं, लेकिन इतने सब पुलिसकर्मियों के रहते हुए कोई पलटकर उनपर हाथ नहीं उठा सकता. जिस दिन ये सरकार इनकी सुरक्षा वापस ले लेगी, ये लोग अपने बाथरूम से भी बाहर नहीं निकल पाएंगे’.

सिंगला के पास कथित रूप से एक्स-श्रेणी की सुरक्षा थी, जिसमें दो हथियारबंद पुलिसकर्मी होते हैं. शिवसेना (टकसाली) नेता सुधीर सूरी के पास 2020 तक, 15 पुलिसकर्मियों का एक प्रभावशाली सुरक्षा कवर था. शिवसेना (पंजाब) के अमित अरोड़ा के लिए पुलिस ने इसी साल उसका सुरक्षा कवर चार से घटाकर दो कर दिया, जब उसने धमकियां मिलने की शिकायत की थी.

लेकिन, एक्सपर्ट्स का मानना है कि जैसा कि पटियाला की हिंसा से साबित हुआ, पंजाब की शिव सेनाओं जैसे हाशिए के समूहों के पास भले ही राजनीतिक समर्थन न हो, लेकिन उनके नुक़सान पहुंचाने की संभावना बनी रहती है.

दिल्ली-स्थित इंस्टीट्यूट फॉर कनफ्लिक्ट मैनेजमेंट के एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ अजय साहनी ने दिप्रिंट से कहा, ‘जब आपकी अर्थव्यवस्था घट रही हो, और ग़ुस्साए युवा देश छोड़कर जा रहे हों या यहां पर निराश बैठे हों, तो संभावना बनी रहती है कि लामबंद होकर वो अपनी भड़ास निकाल सकते हैं. पंजाब में सांप्रदायिक टकरावों का इतिहास नहीं रहा है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि युवाओं को गुमराह नहीं किया जा सकता’.

साहनी के अनुसार, हालांकि शिव सैनिकों का राज्य में कोई ख़ास जनाधार नहीं है, लेकिन ‘आग भड़काने के लिए एक चिंगारी ही काफी होती है’.

उन्होंने कहा, ‘ऐसे तत्वों की संख्या बढ़ रही है जो समाज को बांटना चाहते हैं. इन तत्वों को अलग करना होगा. पंजाब अभी बारूद के एक ढेर पर बैठा है- ऐसी स्थिति में आप माचिस नहीं जला सकते’.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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