नई दिल्ली: विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पेश किया है. इससे संसद के पीठासीन अधिकारियों को हटाने से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों पर फिर से ध्यान गया है.
संविधान लोकसभा स्पीकर को सदन के प्रस्ताव के जरिए हटाने की अनुमति देता है. हालांकि, भारत के संसदीय इतिहास में ऐसे प्रस्ताव बहुत कम आए हैं और अब तक कोई भी सफल नहीं हुआ है.
हालांकि, यह प्रस्ताव केवल स्पीकर से जुड़ा है और यह सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नहीं है.
इसी वजह से, भले ही संविधान पीठासीन अधिकारियों की जवाबदेही तय करने का तरीका देता है, लेकिन ऐसे प्रस्तावों का नतीजा आमतौर पर संसद में सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन की संख्या पर निर्भर करता है.
स्पीकर आम तौर पर सदन में बहुमत वाली पार्टी द्वारा चुना जाता है. उनसे निष्पक्ष रहने की उम्मीद की जाती है और वे केवल बराबरी की स्थिति होने पर ही वोट करते हैं.
भाजपा सांसद ओम बिरला राजस्थान के कोटा से तीसरी बार सांसद चुने गए हैं. उन्हें पहली बार जून 2019 में लोकसभा का स्पीकर चुना गया था. इसके बाद जून 2024 में उन्हें दूसरी बार इस पद के लिए फिर से चुना गया.
ओम बिरला के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव पर कुल 118 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं. इन सांसदों का आरोप है कि स्पीकर “हर विवादित मुद्दे पर खुले तौर पर सत्तारूढ़ पार्टी का पक्ष लेते हैं.”
कांग्रेस सांसदों ने स्पीकर पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार करने और विपक्षी दलों की महिला सांसदों पर “बिना वजह आरोप” लगाने का भी आरोप लगाया. इस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भी राजनीतिक विवाद हुआ.
अपने नोटिस में कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने ओम बिरला पर चार आरोप लगाए हैं. इनमें विपक्ष के नेता को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान अपना भाषण पूरा नहीं करने देना, कांग्रेस के आठ सांसदों को निलंबित करना, एक भाजपा सांसद को जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने की अनुमति देना और कांग्रेस सांसदों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमले की योजना बनाने का आरोप लगाना शामिल है.
लोकसभा स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 94 (c) में बताई गई है. इसके अनुसार लोकसभा के उस समय के कुल सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव के जरिए स्पीकर को हटाया जा सकता है.
इस प्रक्रिया की शुरुआत लिखित नोटिस से होती है, जो कम से कम 14 दिन पहले देना जरूरी होता है. यह नोटिस लोकसभा के महासचिव को दिया जाता है.
इसके बाद प्रस्ताव पर चर्चा कराने के लिए कम से कम 50 सांसदों का समर्थन होना जरूरी होता है. अगर यह संख्या पूरी नहीं होती, तो प्रस्ताव पर विचार नहीं किया जाता.
जब प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो उस पर चर्चा के लिए समय तय किया जाता है. इस दौरान स्पीकर सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं कर सकते. उनकी जगह उपाध्यक्ष या सदन द्वारा तय किया गया कोई अन्य सदस्य कार्यवाही चलाता है.
स्पीकर को बहस में भाग लेने का अधिकार होता है, लेकिन वे निर्णायक वोट नहीं दे सकते.
अगर प्रस्ताव पास हो जाता है, तो स्पीकर को इस संवैधानिक पद से हटा दिया जाता है और वे केवल सांसद के रूप में ही बने रहते हैं.
स्पीकर को हटाने की पिछली कोशिशें
लोकसभा स्पीकर को हटाने के लिए प्रस्ताव पहले भी दो बार लाए जा चुके हैं.
पहली बार 1954 में भारत के पहले लोकसभा स्पीकर जी. वी. मावलंकर के खिलाफ प्रस्ताव लाया गया था. इस प्रस्ताव पर सदन में बहस हुई, लेकिन अंत में यह प्रस्ताव हार गया.
1987 में बलराम जाखड़ को हटाने के लिए भी प्रस्ताव लाया गया था. इस पर भी बहस हुई और अंत में यह प्रस्ताव भी हार गया.
1966 में सरदार हुकम सिंह के खिलाफ भी प्रस्ताव लाने की कोशिश हुई थी, लेकिन विपक्ष सदन में जरूरी न्यूनतम समर्थन नहीं जुटा सका, इसलिए यह कोशिश आगे नहीं बढ़ पाई.
इनमें से कोई भी प्रस्ताव सफल नहीं हुआ, इसलिए अब तक किसी भी लोकसभा स्पीकर को इस प्रक्रिया के जरिए नहीं हटाया गया है.
संविधान में स्पीकर के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के लिए कोई खास कारण तय नहीं किए गए हैं. लेकिन इतिहास में ऐसे प्रस्ताव आम तौर पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार के आरोप और भरोसे की कमी के कारण लाए गए हैं.
राज्यसभा: अलग संवैधानिक व्यवस्था
लोकसभा स्पीकर को हटाने की तुलना में राज्यसभा के सभापति को हटाने की प्रक्रिया ज्यादा कठिन है, क्योंकि इसके लिए संसद के दोनों सदनों की मंजूरी जरूरी होती है.
संविधान का अनुच्छेद 67 (b) राज्यसभा के पीठासीन अधिकारी को हटाने की प्रक्रिया बताता है. राज्यसभा के सभापति भारत के उपराष्ट्रपति भी होते हैं.
इस प्रक्रिया में पहले राज्यसभा में बहुमत से प्रस्ताव पास करना होता है. इसके बाद इस प्रस्ताव को लोकसभा में भी बहुमत से मंजूरी मिलनी जरूरी होती है. प्रस्ताव लाने से कम से कम 14 दिन पहले नोटिस देना जरूरी होता है.
भारत के संसदीय इतिहास में ऐसी कोशिशें और भी कम हुई हैं.
साल 2024 में पहली बार विपक्षी दलों ने ऐसा नोटिस दिया था और सभापति जगदीप धनखड़ को हटाने की मांग की थी. उन पर सदन में पक्षपातपूर्ण व्यवहार करने का आरोप लगाया गया था.
हालांकि यह प्रस्ताव वोटिंग तक नहीं पहुंच पाया और प्रक्रिया से जुड़े कारणों के आधार पर इसे खारिज कर दिया गया.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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