Wednesday, 5 October, 2022
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सुप्रीम कोर्ट से कोई उम्मीद नहीं बची, संवेदनशील मामले कुछ खास जजों को सौंपे गए: कपिल सिब्बल

सिब्बल ने कहा कि, 'अगर आप सोचते हैं कि आपको सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलेगी, आप बड़ी गलत होंगे. और मैं यह सुप्रीम कोर्ट में 50 साल की प्रैक्टिस के पूरे होने पर कह रहा हूं.'

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नई दिल्ली: राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने हाल ही सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर नाखुशी जाहिर की है. उन्होंने कहा, ‘इस संस्था में ‘कोई उम्मीद नहीं बची.’

सिब्बल ने कहा कि, ‘अगर आप सोचते हैं कि आपको सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलेगी, आप बड़ी गलत होंगे. और मैं यह सुप्रीम कोर्ट में 50 साल की प्रैक्टिस के पूरे होने पर कह रहा हूं.’ उन्होंने कहा कि भले ही शीर्ष अदालत ने कोई ऐतिहासिक फैसला सुना दिया हो, लेकिन इससे जमीनी हकीकत शायद ही कभी बदलती हो.

इस साल मैंने सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस के 50 साल पूरे कर लिए हैं और 50 साल बाद महसूस करता हूं कि मेरे पास इस संस्था से कोई उम्मीद नहीं बची. आप सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए प्रगतिशील फैसलों की बात करते हैं लेकिन जमीनी स्तर पर जो होता है, उसमें बहुत अंतर होता है. आप की निजता कहां है? सिब्बल ने कहा.

सिब्बल शनिवार को यहां दिल्ली में न्यायिक जवाबदेही और सुधार अभियान (सीजेएआर), पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) और नेशनल अलायंस ऑफ पीपुल्स द्वारा ‘नागरिक स्वतंत्रता के न्यायिक रोलबैक’ पर आयोजित एक पीपुल्स ट्रिब्यूनल में बोल रहे थे.

सिब्बल ने 2002 के गुजरात दंगों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कई अन्य लोगों को विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा दी गई क्लीन चिट को चुनौती देने वाली कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की विधवा जकिया जाफरी द्वारा दायर याचिका को खारिज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की; धन शोधन निवारण अधिनियम के प्रावधानों को कायम रखना जो प्रवर्तन निदेशालय को व्यापक अधिकार प्रदान करते हैं; और छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियानों के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा 17 आदिवासियों की गैर-न्यायिक हत्याओं की कथित घटनाओं की स्वतंत्र जांच की मांग वाली 2009 में दायर याचिका को खारिज कर दिया था.

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न्यायमूर्ति एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ ने ये सभी फैसले पारित किए थे, जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं. सिब्बल जकिया जाफरी और पीएमएलए अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए थे.

उन्होंने यह भी कहा कि ‘संवेदनशील मामले’ केवल चुनिंदा न्यायाधीशों को सौंपे जाते हैं और कानूनी बिरादरी आमतौर पर पहले से जानती है कि फैसले का परिणाम क्या होगा.

‘मैं इस तरह उस कोर्ट के बारे में बात नहीं करना चाहता जहां मैंने 50 साल तक प्रैक्टिस की है लेकिन समय आ गया है. अगर हम इस पर बात नहीं करते, कौन करेगा? वास्तविकता यह है कि कोई भी संवेदनशील मामला जिसके बारे में हम जानते हैं कि कोई समस्या है, उसे कुछ न्यायाधीशों के सामने रखा जाता है और हम परिणाम जानते हैं.’

सिब्बल ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठाते हुए कहा, ‘जिस कोर्ट में जज बिठाए जाते हैं (जहां जज बैठते हैं) समझौता की प्रक्रिया के माध्यम से, एक अदालत जहां यह निर्धारित करने की कोई व्यवस्था नहीं है कि किस मामले की अध्यक्षता किस बेंच द्वारा की जाएगी, जहां भारत के मुख्य न्यायाधीश यह तय करते हैं कि किस मामले को किस पीठ द्वारा निपटाया जाएगा और कब, वह अदालत कभी भी स्वतंत्र नहीं हो सकती है.’

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि अगर लोग अपनी मानसिकता नहीं बदलेंगे तो स्थिति नहीं बदलेगी.

उन्होंने कहा, ‘भारत में हमारी माई-बाप संस्कृति है, लोग शक्तिशाली के चरणों में गिरते हैं. लेकिन समय आ गया है कि लोग बाहर आएं और अपने अधिकारों की सुरक्षा की मांग करें.’

सिब्बल ने आगे कहा कि ‘स्वतंत्रता तभी संभव है जब हम अपने अधिकारों के लिए खड़े हों और उस स्वतंत्रता की मांग करें’.

उन्होंने शीर्ष अदालत में लंबित धर्म संसद मामले का भी उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत ने मामले की सुनवाई की और सरकारों से जवाब मांगा. उन्होंने कहा कि आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया गया था और अगर गिरफ्तार भी किया गया था, तो उन्हें 1-2 दिनों में जमानत पर रिहा कर दिया गया और फिर दो सप्ताह के अंतराल के बाद धर्म संसद की बैठकें जारी रखीं गईं.


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