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Saturday, 25 May, 2024
होमदेशज़िंदा दफना दी गई थी नवजात, UP की ‘मिरैकल’ गर्ल के एडॉप्शन पर BJP नेता और विदेशी युगल आमने-सामने

ज़िंदा दफना दी गई थी नवजात, UP की ‘मिरैकल’ गर्ल के एडॉप्शन पर BJP नेता और विदेशी युगल आमने-सामने

बच्ची को बचाने में मदद करने वाले पूर्व विधायक राजेश मिश्रा के परिवार का कहना है कि नोडल एडॉप्शन एजेंसी ने माल्टा के एक जोड़े को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों का उल्लंघन किया है. मामला अब SC में है.

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नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के बरेली की एक ‘अवांछित’ बच्ची, जिसे तीन साल पहले जन्म के कुछ समय बाद ही जिंदा दफनाकर मरने के लिए छोड़ दिया गया था, उसके लिए अब दो परिवार कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं. इसमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक पूर्व स्थानीय विधायक का परिवार है और दूसरा माल्टा का रहने वाला एक युगल आमने सामने हैं.

गोद देने वाली भारतीय नोडल एजेंसी ने पिछले साल एक विदेशी जोड़े को बच्ची गोद लेने की अनुमति दी थी. बच्ची को बचाने के बाद उसकी देखभाल करने वाले पूर्व विधायक राजेश मिश्रा उर्फ पप्पू भरतोल का परिवार इसका विरोध कर रहा है. उनका दावा है कि बच्ची को गोद लेने के आवेदन को गलत तरीके से मंजूर किया गया है.

हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने पिछले साल नवंबर में माल्टा के दंपति को बच्ची गोद दिए जाने को हरी झंडी दिखा दी थी, लेकिन लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है.

शीर्ष अदालत में दायर याचिका में नेता के भतीजे अमित मिश्रा ने आरोप लगाया है कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अधीन वैधानिक निकाय सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी (कारा) ने भावी भारतीय माता-पिता को प्राथमिकता देने के बजाये बच्ची को विदेशियों को गोद देने की प्रक्रिया अपनाकर दिशानिर्देशों का उल्लंघन किया है.

इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं ने कारा पर गलत तरीके से बच्ची को ‘स्पेशल नीड’ वाली श्रेणी रखने का आरोप लगाया है, जिससे गोद देने की प्रक्रिया का समय कम हो जाता है और साथ ही नए सिरे से मेडिकल जांच की मांग की है.

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राजेश मिश्रा ने दिप्रिंट से बातचीत में कहा कि वह और उनका परिवार भावनात्मक रूप से बच्ची से जुड़ गया था और 10 अक्टूबर 2019 को जबसे वह मिली थी तबसे उसके इलाज और अन्य खर्चों का ध्यान भी उनका परिवार ही रख रहा था. मिश्रा के भतीजे और उनकी पत्नी ने कारा में पंजीकरण कराया था और उसके तुरंत बाद बच्ची को गोद लेने के लिए आवेदन दिया था.

मिश्रा ने कहा, ‘‘परिवार का बच्ची के साथ एक जुड़ाव हो गया है.’’

इस पूरे मामले ने डब्ल्यूसीडी मंत्रालय के तहत काम करने वाली दो सरकारी संस्थाएं भी बंटी नज़र आ रही हैं. कारा ने अभी तक सुप्रीम कोर्ट की याचिका में लगाए आरोपों का जवाब नहीं दिया है, जबकि पहले हाईकोर्ट में उसने माल्टा के दंपति को बच्चा देने के अपने फैसले पर दृढ़ रहने की बात कही थी.

वहीं, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अधीन आने वाले राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) मिश्रा परिवार के समर्थन में सामने आया है और उसने कारा की तरफ से गोद देने संबंधी कागज़ी खानापूर्ति में खामियों की ओर इशारा किया है.

मौजूदा समय में यह मामला शीर्ष अदालत में जस्टिस सुधांशु धूलिया की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष लंबित है, जिसने अमित और उनकी पत्नी को बच्चा गोद लेने के अपने अधिकार को साबित करने को कहा है. अदालत ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से कहा कि मौजूदा कानून दंपति को गोद लेने के लिए बच्चा चुनने का अधिकार नहीं देता और उन्हें अपनी प्रामाणिकता साबित करनी होगी. अगली सुनवाई के लिए 28 फरवरी की तारीख मुकर्रर की गई है.

आइये जानते हैं कि बच्ची के मिलने से लेकर उस पर अधिकार को लेकर कानूनी लड़ाई के बीच तक आखिर क्या-क्या हुआ.


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यह सब कैसे शुरू हुआ

अक्टूबर 2019 में राजेश मिश्रा बरेली जिले के बिठारी चैनपुर से विधायक थे. उनके मुताबिक, जब एक नवजात शिशु को ज़मीन में दबा पाया गया तो सबसे पहले उन्हें ही इसकी जानकारी मिली. हैरानी की बात थी की मिट्टी में दफना दिए जाने के बावजूद बच्ची जीवित थी.

राजेश मिश्रा ने दिप्रिंट को बताया, ‘‘बच्ची 10 अक्टूबर 2019 को मिली थी. जब एक सब-इंस्पेक्टर का परिवार अपने मृत बच्चे को दफनाने के लिए उपयुक्त जगह तलाश रहा था. गड्ढा खोदते समय कुदाल किसी बर्तन से टकराई और तभी वहां मौजूद लोगों को एक बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी. चूंकि, मैं उस समय इलाके का विधायक था, इसलिए जिन लोगों को यह पता चला, उन्होंने तुरंत मुझे फोन किया. ऐसा लगता है कि बच्ची को ज़िंदा ही दफना दिया गया था. वह समय से पहले पैदा हुई थी.’’

मिश्रा ने कहा कि वह पहले बच्ची को जिला अस्पताल ले गए, लेकिन उसकी हालत बेहद खराब थी, इसलिए उसे एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया.

पूर्व विधायक ने कहा, ‘‘बच्ची को बरेली का सबसे अच्छे अस्पताल में रखा गया और वह दिसंबर 2019 तक 56 दिन वहां रही. मैंने ही उसके इलाज का बिल भरा था.’’ साथ ही कहा कि इसी दौरान परिवार को बच्ची से भावनात्मक लगाव हो गया.

इस बीच, परिवार ने जिला बाल कल्याण समिति को एक पत्र भी भेजा, जिसमें बच्ची को बचाए जाने की जानकारी दी गई थी. अस्पताल से छुट्टी के बाद बच्ची की देखभाल के लिए परिवार ने उसे तब तक के लिए बरेली के वार्न बेबी फोल्ड नामक एक स्पेशल एडॉप्शन एजेंसी (एसएए) को सौंप दिया, जब तक कानूनी तौर पर गोद लेने की प्रक्रिया पूरी नहीं होती.

बीजेपी नेता ने दावा किया कि जब वह एसएए में थी तब भी उन्होंने और उनके परिवार ने बच्ची की देखभाल की और उसकी ज़रूरतों का ध्यान रखा. उन्होंने कहा, ‘‘हमने उसके सभी ज़रूरी खर्च उठाए हैं.’’

कोर्ट में पेश दस्तावेज़ के मुताबिक, बच्ची को एसएए में भेजने से पहले ही मिश्रा के भतीजे अमित और उनकी पत्नी ने उसे गोद लेने के लिए किशोर न्याय अधिनियम, 2015 और दत्तक ग्रहण नियम, 2017 के तहत आवेदन कर दिया था.

राजेश मिश्रा ने कहा, ‘‘हम नियमित तौर पर कारा की वेबसाइट चेक करते रहते क्योंकि हमें बताया गया था कि एक बार बच्ची को गोद देने का फैसला हो जाने के बाद उसका नाम और अन्य ब्योरा पोर्टल पर अपलोड कर दिया जाएगा. मैंने वेबसाइट पर नज़र रखने के लिए अपनी टीम के कम से कम 50 लोगों को लगा रखा था, लेकिन हमने कभी भी भारतीय माता-पिता द्वारा गोद लिए जाने वाले बच्चों में कभी उसका नाम नहीं देखा.’’

गोद दिए जाने वाले बच्चों में उक्त बच्ची का नाम औपचारिक तौर पर जुलाई 2020 में शामिल किया गया, लेकिन मिश्रा का आरोप है कि उनके परिवार को इस बारे में कोई सूचना नहीं दी गई.

2022 में, परिवार को सूत्रों से पता चला कि माल्टा के दंपति को बच्ची गोद लेने की मंजूरी मिल गई है.

राजेश मिश्रा ने तब एनसीपीसीआर से शिकायत की, जिसमें आरोप लगाया गया कि लड़की को गलत तरीके से ‘स्पेशल नीड’ श्रेणी के तहत गोद देने की प्रक्रिया अपनाई गई.


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दिल्ली HC से SC पहुंचा मामला

मिश्रा की शिकायत के आधार पर ही अगस्त 2022 में एनसीपीसीआर ने कारा से गोद देने की प्रक्रिया नहीं अपनाने को कहा और बरेली के जिला मजिस्ट्रेट से एक रिपोर्ट भी मांगी. एसएए से भी बच्ची को गोद देने संबंधी आवेदन वापस लेने को कहा गया था.

इसके आधार पर ही कारा ने माल्टा के दंपति को सूचित किया कि एनसीपीसीआर के हस्तक्षेप के कारण बच्चे को गोद देने की प्रक्रिया रोक दी गई है.

माल्टा के दंपति ने इसे दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां कारा ने गोद लेने की प्रक्रिया में किसी भी तरह से नियमों के उल्लंघन से इनकार किया.

पिछले साल नवंबर में कारा के रुख से सहमति जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अमित मिश्रा और उनके परिवार को बच्ची पर सिर्फ इसलिए ही कोई कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता है कि उन्होंने बचाए जाने के बाद उसकी देखभाल की थी. हाईकोर्ट ने कहा कि मिश्रा परिवार की तरफ से बच्ची की देखभाल करना एक ‘सराहनीय’ कदम था, लेकिन इस तरह देखभाल की वजह से उसे गोद लेने का ‘‘न तो अधिकार मिल जाता और न ही उसे खारिज किया जा सकता है.’’

हाईकोर्ट ने कारा को माल्टा दंपति के गोद लेने के आवेदन को आगे बढ़ाने को मंजूरी देते हुए कहा कि प्लेसमेंट प्रक्रिया में तीन साल लग गए थे और यह वो ‘‘समय था जिसमें (बच्ची को) घर-परिवार की देखभाल मिलने की व्यवस्था हो जानी चाहिए थी.’’

इसके बाद अमित मिश्रा और उनकी पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां मामले की सुनवाई चल रही है.


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‘स्पेशल नीड’ श्रेणी पर उठते सवाल

दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों के समक्ष दायर हलफनामे में एनसीपीसीआर ने मामले की जांच की मांग की है.

बाल अधिकार निकाय के मुताबिक, 2022 तक किसी बच्चे को ‘स्पेशल नीड’ वाला घोषित करने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को लेकर गोद लेने के नियमों में स्पष्टता नहीं थी.

आयोग का मानना है कि कानून में इस बारे में कुछ स्पष्टता न होने का ऐसी घोषणा में दुरुपयोग किया जा सकता था.

नए नियम किसी जिले के मुख्य चिकित्सा मुख्य अधिकारी की तरफ से प्रमाणपत्र देने को अनिवार्य बनाते हैं और इसके आधार पर ही बच्चे को ‘स्पेशल नीड’ वाला घोषित किया जा सकता है. एनसीपीसीआर ने कहा है कि ‘पहले के नियमों के दुरुपयोग की आशंकाओं को दूर करने के लिए’ ही नियमों को संशोधित किया गया था.

एनसीपीसीआर ने दावा किया है कि इसके अलावा, स्पष्ट नियमों के अभाव में एसएसए को दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों संबंधी नियम, 2017 के प्रावधानों का पालन करना चाहिए था, ताकि बच्ची को ‘स्पेशल नीड’ वाला घोषित किया जा सके. इसके तहत, एसएसए को एक चिकित्सा प्राधिकरण के समक्ष विकलांगता प्रमाणपत्र के लिए आवेदन करना चाहिए था.

इस बीच, मिश्रा जोर देकर कहते हैं कि लड़की कोई ‘स्पेशल चाइल्ड’ नहीं है और इसे साबित करने के लिए वह दोबारा मेडिकल जांच की मांग कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, ‘‘एनसीपीसीआर के पत्र के बाद, जिला मजिस्ट्रेट ने प्रमाणपत्र जारी करने वाले एक निजी चिकित्सक से रिपोर्ट मांगी थी. उस रिपोर्ट में कहा गया था कि बच्चे को मिर्गी की बीमारी है, लेकिन अक्टूबर 2020 में की गई उसकी एमईआर (माइक्रोइलेक्ट्रोड रिकॉर्डिंग) में उसके स्पेशल चाइल्ड होने के कोई संकेत नहीं मिले हैं.’’

(अनुवादः रावी द्विवेदी | संपादनः फाल्गुनी शर्मा)

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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