Sunday, 3 July, 2022
होमदेशन पढ़ाई, न काम, न नदी पार कर सकते, यूपी के 4 सबसे गरीब जिलों में से 3 में लोगों की दशा

न पढ़ाई, न काम, न नदी पार कर सकते, यूपी के 4 सबसे गरीब जिलों में से 3 में लोगों की दशा

श्रावस्ती, बहराइच और बलरामपुर नीति आयोग की बहुआयामी गरीबी इंडेक्स में क्रमश: एक, दो और चौथे स्थान पर हैं, यानी सेहत, शिक्षा और जीवन स्तर की दुर्दशा में सबसे अव्वल

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श्रावस्ती/बहराइच/बलरामपुर: 20 बरस के दानिश मंसूर खुद को ‘खुशकिस्मत’ मानते हैं. 2020 में वह एक पैरामेडिकल कॉलेज से आयुर्वेद में बैचलर डिग्री बीएएमएस (मेडिसिन और सर्जरी) के लिए उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में अपने गृह-शहर भिनगा से चले गए थे. हालांकि वह मुंबई, दिल्ली या वाराणसी नहीं गए, उनका मुकाम बिहार का सिवान जिला था जो उच्च शिक्षा के अवसरों से ज्यादा कानून-व्यवस्था की गड़बड़ियों के लिए जाना जाता है.

उन्होंने सिवान जाना क्यों चुना? वह बताते हैं, ‘12वीं में मेरे अंक अच्छे नहीं थे. यहां कुछेक सरकारी और प्राइवेट कॉलेज ही हैं, जहां पढ़ाई अच्छी नहीं होती. यहां कोई रोजगार भी नहीं है. ग्रेजुएट होने के बाद मैं बेरोजगार ही रहता.’ वह कहते हैं कि श्रावस्ती से कहीं भी बाहर जाना बेहतर है.

उत्तर प्रदेश के मौजूदा सात चरणों के चुनाव में वादों और तरक्की की बातें खूब हो रही हैं, जो 10 फरवरी से शुरू हुए हैं. विपक्षी पार्टियां बदलाव की बात कर रही हैं तो योगी आदित्यनाथ की मौजूदा बीजेपी सरकार विकास में अपनी उपलब्धियों का गुणगान कर रही है. हालांकि जोरदार प्रचार अभियान कुछ जिलों की जमीनी सच्चाई नहीं छुपा सकता.

चुनाव की तारीखों के ऐलान के कुछेक महीने पहले, पिछले नवंबर में केंद्र सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग ने राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी इंडेक्स (एमपीआई) जारी किया. इसमें सभी राज्यों के सैकड़ों जिलों के एमपीआई रैंक हैं. यह स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर के मानकों पर ‘वंचित’ परिवारों का पैमाना है.

इन मानकों पर देश में सबसे बुरा प्रदर्शन करने वाले चार जिलों में तीन उत्तर प्रदेश के हैं.
इस फेहरिस्त में श्रावस्ती ‘टॉप’ में है, जहां 74.38 फीसदी आबादी ‘बहुआयामी गरीब’ कैटेगरी में आंकी गई है. उसके बाद पड़ोसी जिला बहराइच (71.88 फीसदी) दूसरे नंबर पर और बलरामपुर (69.45 फीसदी) चौथे नंबर पर हैं. तीसरे और पांचवे स्थान पर मध्य प्रदेश के क्रमश: अलीराजपुर (71.31 फीसदी) और झाबुआ (68.86 फीसदी) जिले हैं. नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, 100 सबसे बुरा प्रदर्शन वाले जिलों में उत्तर प्रदेश के 15 जिले हैं.

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गौरतलब है कि रिपोर्ट राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस-4) के 2015-16 के आंकड़ों पर आधारित है. उसके बाद से कुछ जिलों में मातृ-शिशु स्वास्थ्य, साक्षरता, बिजली उपलब्धता वगैरह में सुधार हुआ है. श्रावस्ती, बहराइच और बलरामपुर केंद्र की आकांक्षी जिले कार्यक्रम में भी शामिल हैं. इसकी शुरुआत 2018 में देश में 117 सबसे अविकसित जिलों में कारगर बदलाव लाने के लिए किया गया.

हालांकि इन सुधारों के बावजूद, ये जिले कई मोर्चे पर अभी भी पिछड़े हुए हैं. साक्षरता दर, बच्चों में कुपोषण काफी ज्यादा है. शैक्षणिक सुविधाएं, रोजगार के अवसर कम है. इन्फ्रास्ट्रक्चर और शौचालय की स्थिति काफी खराब है.

‘बहुआयामी गरीबी’ हालात का जायज़ा लेने के लिए दिप्रिंट ने उत्तर प्रदेश के तीन सबसे गरीब जिलों का विस्तृत दौरा किया.


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मॉल और शोरूम तो हैं लेकिन प्राइवेट स्कूल या कोचिंग सेंटर कम हैं

श्रावस्ती की ओर जाते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग पर कई मठ, मंदिर और चमचमाते होटल समृद्धि का शुरुआती एहसास दिलाते हैं. श्रावस्ती बौद्ध और जैन तीर्थ सर्किट का अहम पड़ाव हैं. इसके एक तरफ बहराइच है और दूसरी तरफ बलरामपुर है.
श्रावस्ती के जिला मुख्यालय भिनगा की ओर जा रही मुख्य सड़क के चारों ओर छोटे कस्बे में पहुंच जाने के तमाम संकेत शामिल हैं. मसलन, बाइक शोरूम, मोबाइल की दुकानें, रिलायंस ट्रेंड्स मॉल और वुलन कपड़ों पर 30 फीसदी डिस्काउंट का ऐलान करता इंडियन फैशन बाजार. हालांकि थोड़ा धीरे चलेंगे तो वहां के हालात रंग बदलते नज़र आने लगते हैं.

फरवरी का धूप से खिला रविवार, भिनगा के मुख्य बाजार में हार्डवेयर शॉप के बाहर एक बेंच पर दोस्तों के साथ दानिश मंसूर आराम फरमा रहे हैं. मंसूर ने यह साफ कर दिया कि वह कभी-कभार ही आते हैं और जल्दी सिवान लौट जाएंगे. वहां वो महात्मा गांधी पैरामेडिकल कॉलेज में दूसरे वर्ष के छात्र हैं.

उनके मुताबिक, भिनगा सिर्फ एक कस्बा है और यहां कुछ खास नहीं है. वह कहते हैं, ‘यहां बमुश्किल कोई विकास है, जरा सड़कों की हालत देख लीजिए.’ वाकई भिनगा के आसपास की कई सड़कों में गड्ढे और कीचड़ ही नहीं बल्कि किनारे काफी कचरा भी भरा पड़ा है.

श्रावस्ती जिला मुख्यालय भिनगा में एक दुकान के बाहर टाइम पास करते युवा | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

मंसूर अपने ऊपर नेमत की बात बताते हैं जिससे उसे कहीं और अवसर तलाशने का मौका मिला जबकि उसके दोस्त श्रावस्ती में ही अटके पड़े हैं. वह कहते हैं, ‘मेरे अब्बा स्थानीय ठेकेदार हैं और पटना में भी मेरे रिश्तेदार हैं. मेरे ज्यादातर स्कूल के दोस्त यहीं (भिनगा में) हैं, कुछ डिग्री कॉलेज में पढ़ रहे हैं, कुछ छोटे-मोटे काम कर करके परिवार की मदद कर रहे हैं.’

छोटे-मोटे काम मिलना भी आसान नहीं है. जिले में कुछेक छोटी चीनी मिलों और ईंट भट्टों के अलावा कोई उद्योग या फैक्टरी नहीं है (इस क्षेत्र में इकलौती बड़ी कंपनी बलरामपुर जिले में बलरामपुर शूगर मिल है). सरकारी नौकरियां थोड़ी हैं. कुछेक इंडस्ट्रीयल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट जरूर हैं, मगर उनसे निकलने वालों को अपने हुनर को काम में लाने के लिए दूर कहीं जाना पड़ता है. ग्रामीण क्षेत्रों में खेती ही एकमात्र आसरा है. किसी के पास खेत नहीं है तो दूसरे के खेत में काम तो मिल सकता है लेकिन आमदनी बेहद थोड़ी होती है.

देश में दूसरे छोटे कस्बों के उलट, भिनगा में कोचिंग सेंटर्स और लुभावने नाम वाले अंग्रेजी मीडियम के प्राइवेट स्कूल न के बराबर हैं. लखनऊ के गिरी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज में सामाजिक अध्ययन विभाग के प्रोफेसर प्रशांत कुमार त्रिवेदी कहते हैं, ‘वजह यह है कि यहां बाजार (कोचिंग सेंटर, प्राइवेट स्कूल) की दुकानें या संस्थान बनाने की दिलचस्पी नहीं है. यहां लोगों की क्रय शक्ति कम है, इसलिए बाजार इधर नहीं देख रहा है.’

हालांकि भिनगा जैसे शहरी इलाके की हालत ग्रामीण इलाकों से बेहतर है लेकिन 2011 की जनगणना के मुताबिक श्रावस्ती की 11 लाख की आबादी में 95 फीसदी लोग गांवों में रहते हैं और ज्यादातर की जीविका का आधार खेती है.

अस्थायी लकड़ी के पुल पर झूलती जिंदगी

भिनगा से करीब 20 किलोमीटर दूर इकौना ब्लॉक में राप्ती नदी गुजरती है. आप वहां से गुजरेंगे तो आपको बड़ा सुंदर नजारा दिखेगा लेकिन बरसात के दो महीने नदी की बाढ़ निचले इलाकों के खेतों और घरों को अपने आगोश में ले लेती है जिससे संपर्क टूट जाता है.

दरअसल राजगढ़ गुलहारिया, नारायण जोत, मनका कोठरी और मौलाना घसियारी जैसे गांव करीब के मुख्य बाजार से साल भर कटे रहते, अगर गांववालों ने अपने संसाधन जुटाकर काकरा घाट पर अस्थायी पुल नहीं बना लिया होता.
काकरा घाट से सड़क के रास्ते चलना भी कम दुखदायी नहीं है क्योंकि आधी दूरी के बाद पक्की सड़क कीचड़ भरे कच्चे रास्ते में बदल जाती है. लकड़ी और घास-फूस से बना पुल भी खतरे से खाली नहीं है और बरसात में उसे हटा लिया जाता है ताकि राप्ती की बाढ़ में वह बह न जाए.

बरसात के दिनों में गांववाले टूटी-फूटी नाव के सहारे नदी पार करते हैं मगर पुल फिर भी जरूरी है. राजगढ़ गुलारिया गांव के किसान 27 साल के नरसिंह नारायण वर्मा कहते हैं, ‘यह हमारी जीवनरेखा की तरह है. पुल के बिना हमें लंबी दूरी तय करके करीब के बाजार या अस्पताल में पहुंचना पड़ता है. गांववालों ने कई बार स्थायी पुल की मांग की है मगर कुछ नहीं हुआ.’ वे अपनी पत्नी को पीछे बैठाए पुल पार करते हैं.

जिला मजिस्ट्रेट के दफ्तर में अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि काकरा घाट पर स्थायी पुल नहीं बन सकता क्योंकि यह बाढ़ग्रस्त इलाका है और बरसात में अक्सर नहीं अपना रास्ता बदल लेती है. हालांकि मौलाना घसियारी गांव 40 वर्षीय सुनील शुक्ला के मुताबिक, पुल और अच्छी सड़क का अभाव ही यहां की मुख्य समस्या नहीं है.

शुक्ला कहते हैं, ‘यहां कोई साधन नहीं है. कोई अवसर नहीं है. हमेशा से ऐसा ही है.’

वर्षों के अंतराल में कई छोटे और सीमांत किसान बेहतर संभावना के लिए शहरों में चले गए हैं और जो रह गए हैं, वे भी चाहते हैं कि उनकी अगली पीढ़ी चली जाए.

शुक्ला कहते हैं, ‘मेरे जैसे लोग पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते बाहर नहीं जा सकते, मगर मैं अपने बच्चों को उनका स्कूल खत्म होते ही बाहर भेज दूंगा.’

उत्तर प्रदेश में एक मां अपने कुपोषित बच्चे के साथ | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

श्रावस्ती लगभग सभी सामाजिक और विकास इंडिकेटर में पिछड़ा हुआ है. अलबत्ता एनएफएचएस-4 और एनएफएचएस-5 के बीच कुछ सुधार हुआ है.

जिले में औसत साक्षरता दर 46.74 फीसदी है और 2019-21 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक, 20-24 वर्ष आयु वर्ग की 52 फीसदी लड़कियों की शादी 18 वर्ष की उम्र में हो गई है.

खासकर महिलाओं में गर्भनिरोध के बारे में जागरूकता की कमी से परिवारों का औसत आकार बड़ा है. कुल प्रजनन दर (टीएफआर) 2011 की जनगणना के बाद सुधरा है, जो 5.5 से एनएफएचएस-4 के डेटा के मुताबिक 4.2 पर आ गया है लेकिन यह उत्तर प्रदेश के 2.7 से काफी अधिक है जो देश में सबसे ज्यादा है.

कम आमदनी और बड़े परिवारों के योग से बच्चों में कुपोषण की समस्या बेहिसाब है. एनएफएचएस-5 के आंकड़ों के मुताबिक, पांच से कम उम्र के 51 फीसदी बच्चे बौनेपन के शिकार हैं और 40 फीसदी का वजन कम है और करीब 20 फीसदी वजन के मामले में ‘बेकार’ हो गए हैं.

हालांकि परिवार नियोजन के बारे में लोगों को जागरूक करने वाले आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के मुताबिक, ज्यादातर लोगा बच्चों को बोझ नहीं, बल्कि काम करने के अतिरिक्त हाथ की तरह देखते हैं.

थारू आदिवासियों के इलाके श्रावस्ती के सिसिया ब्लॉक में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता रिंपी रानी के मुताबिक चीजें बदल तो रही हैं, मगर धीरे-धीरे. वे कहती हैं, ‘हम उन्हें सिर्फ बता सकते हैं लेकिन वे नहीं सुनते तो हम क्या करें? वे सोचते हैं कि ज्यादा बच्चे परिवार की आमदनी बढ़ाते हैं.’

श्रावस्ती के मुख्य विकास अधिकारी ईशान प्रताप सिंह का कहना है कि इस जिले का पिछड़ापन एक मायने में ऐतिहासिक है. उनके मुताबिक, अंग्रेजों के राज में भी श्रावस्ती में कुछ ऐसी दूरदराज की बस्तियां थीं, जिनका बाकी देश से संपर्क नहीं था. 2017 बैच के आईएएस अधिकारी सिंह कहते हैं, ‘जिले की इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से यहां पर्याप्त विकास नहीं हो पाया. 1998 के बाद जब यह अलग जिला बना, कनेक्टिविटी और ट्रांसपोर्ट की समस्या बनी रही. यही एक वजह है कि यहां दूसरा कामकाज नहीं बढ़ा और ज्यादातर लोग खेती पर आश्रित बने रहे.’

उनके मुताबिक, आकांक्षी जिला कार्यक्रम के तहत आने के बाद जिले में स्वास्थ्य और शिक्षा के इंडिकेटर्स में सुधार आया है. सिंह कहते हैं, ‘स्वास्थ्य खासकर प्रसूती सुविधाओं के मामले में हमने बेहतर किया है. ताजा एनएफएचएस सर्वे से पता चलता है कि श्रावस्ती में 80 फीसदी से ज्यादा संस्थागत प्रसव हुए हैं, जिनमें ज्यादातर सरकारी अस्पतालों और केंद्रों में हुए हैं. हमने परिवार नियोजन और टीएफआर के मामले में भी सुधार किया है.’


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कम साक्षरता दर, कम आमदनी, मुफ्त राशन

श्रावस्ती के साथ-साथ बगल के बहराइच और बलरामपुर में साक्षरता दर हमेशा ही राष्ट्रीय औसत से कम रही है और कई बच्चे जल्दी ही स्कूल छोड़ देते हैं. सबसे चौंकाने वाला तो यह है कि इसे सामान्य मान लिया जाता है. दिप्रिंट का वास्ता 18 से 24 वर्ष के कई लड़को से पड़ा, जिन्होंने कहा कि स्कूल छोड़ चुके हैं मगर कुछ गंवा बैठने का उन्हें एहसास नहीं है.

सबसे लगभग एक जैसा जवाब ही मिलता है, ‘मैं नाम लिखना जानता हूं, थोड़ा जोड़-घटाव भी कर लेता हूं. काम चल जाता है.’

गरीबी और स्थानीय स्तर पर कोई अवसर न होने से कई परिवारों को बच्चों को स्कूल भेजना समय बर्बाद करने जैसा लगता है.

बहराइच के चित्तौरा ब्लॉक के दुलारपुर गांव की 40 साल की हसीमम, पांच लोगों के परिवार के साथ एक कमरे के आधे-पक्का मकान में रहती हैं. वे बताती हैं कि उनके दोनों बड़े बेटे 25 साल का अनीस अहमद और 22 साल के तुफैल ने पांचवी कक्षा के बाद स्कूल छोड़ दिया क्योंकि स्कूल भेजना बूते में नहीं था. उनके छोटा बेटे 16 साल के रियाज ने कुछ साल से पढ़ाई छोड़ दी थी, मगर अब पांचवी में पढ़ रहा है. हालांकि वह स्कूल पूरा कर पाएगा, इसकी संभावना कम है.

बहराइच के दुलारपुर गांव में अपने घर पर 40 वर्षीय हसीमम जहान | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

जहां तक सवाल है, ‘यहां कोई रोजगार नहीं है. मेरे बेटे को आखिरकार परिवार की मदद के लिए अपनी उम्र के दूसरों लड़को की तरह बाहर जाना पड़ेगा. अगर वह स्कूल पूरा करे तब भी यहां कोई काम मिलने वाला नहीं है. ऐसे में मैं क्यों जोर डालूं कि वह पढ़ाई पूरी करे.’

हालांकि परिवार के बड़े बेटे भी आमदनी बढ़ाने में खास मदद नहीं कर पा रहे हैं. अनीस काम की तलाश में मुंबई गया लेकिन 2020 में लॉकडाउन के बाद गांव लोट आया. अब वह दैनिक मजदूरी करता है और 300 रु. रोजाना से ज्यादा नहीं कमा पाता. तुफैल कार मैकेनिक का काम सीख रहा है लेकिन अभी कुछ कमा नहीं रहा है.

अनीस के मुताबिक, दोनों भाइयों ने मनरेगा में काम पाने की कोशिश की, लेकिन गांव के प्रधान ने यह कहकर लौटा दिया कि कोई काम नहीं है.
कोविड और रोजगार के अभाव में परिवार सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) से मिलने वाले मुफ्त राशन के सहारे काम चलाने की कोशिश की. जहां कहती हैं, ‘मेरे पति बीमारी की वजह से काम नहीं कर पाते. मैं रोजमर्रा का काम करके रोजाना 200-250 रु. कमा पाती हूं, वह काम मिलने पर निर्भर है. मैं पांच लोगों के परिवार को कैसे खिलाऊं?’ उनका सपना तो जैसे ठहर गया है.

परिवार ने शौचालय बनाना शुरू किया मगर अधूरा ही रह गया और बेटे की शादी की योजना इसलिए छोड़नी पड़ी क्योंकि दुल्हन के रहने के लिए घर नहीं है.

जहां की तरह की कहानियां अपवाद नहीं हैं. तीन जिलों के गांवों में ऐसी कहानियां बहुत हैं.

लखनऊ के बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के डीन, प्रोफेसर बिभूति मलिक कहते हैं,

‘यह दुश्चक्र है. पीडीएस गरीबी उन्मूलन कुछेक कार्यक्रमों में एक है, जो काफी कामयाब रहा है लेकिन यह काफी नहीं है. अससे भूख मिटाने में मदद तो मिली है लेकिन विकास को व्यापक संदर्भों में देखना होगा. उसमें स्वास्थ्य, शिक्षा या इन्फ्रास्ट्रक्चर के सभी सामाजिक इंडिकेटर्स को ध्यान में रखना होगा.’

मलिक का कहना है कि इन जिलों में आदिवासी इलाके हैं और तराई के क्षेत्र में हैं. वे कहते हैं, ‘आबादी के लिहाज से वे पहले से अच्छी हालत में नहीं रहे हैं. इन इलाकों के विकास में लंबे समय से सरकारी कोशिशों के पिछड़ने के कारण हालात पेचीदा हो गए हैं.’

इन जिलों के पिछड़े रह जाने की दूसरी वजह, बकौल मलिक, सरकारी सेवाओं की खराब डिलिवरी के लिए किसी तरह की जवाबदेही की मांग न होना है. वे कहते हैं, ‘जो सेवाएं नहीं मिलतीं, उसके लिए कोई विरोध या मांग यहां नहीं है. खराब विकास के लिए कोई आंदोलन नहीं है. लोग व्यवस्था के आदी हो चले हैं और उसे अपना भाग्य मानकर शांत हो जाते हैं. वे यह भी नहीं सोच पाते कि कैसे इस हालात से बाहर निकला जाए.’


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तीन जिले ‘डी-क्लास टाउन’ की तरह

कम साक्षरता का मतलब है कि अनेक युवा गांव में रहते हैं तो मामूली पैसों वाले शारीरिक श्रम के काम से जिंदगी काटते हैं. परिवार बड़ा हो तो 200-250 रोजाना की आमदनी से मदद नहीं मिलती.

बहराइच में अमुल और डाबर के एकमात्र डिस्ट्रिब्यूटर सुभाष सिंह का कहना है कि इन जिलों में लोगों की क्रय शक्ति काफी कम है. वे कहते हैं, ‘हम बहराइच और पड़ोसी जिलों को डी-क्लास टाउन मानते हैं. लोगों की खर्च करने की ताकत कम है इसलिए हम कम कीमत वाले एफएमसीजी आईटम ही लाते हैं. मसलन, अगर लखनऊ में कोई डिस्टिब्यूटर 100 रु. की एक आइसक्रीम रखता है तो यहां हम सिर्फ 10 और 20 रु. वाली आइसक्रीम ही रखते हैं.’

यहां बैंकों के दिए कार लोन से भी खर्च की कम ताकत का पता लगता है. बहराइच के पद्मा मार्केट में भारतीय स्टेट बैंक के मेन ब्रांच से इस वित्त वर्ष में दिए गए कार लोन औसतन सिर्फ 5 लाख रु. के हैं. ब्रांच में डिप्टी मैनेजर मोहम्मद हुजैफा कहते हैं, ‘ज्यादातर छोटी कारें ही बिकती हैं.’

लखनऊ के गिरी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज के सामाजिक अध्ययन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. प्रशांत कुमार त्रिवेदी का कहना है कि क्रय शक्ति कम होने से प्राइवेट सेक्टर ने इन इलाकों में निवेश करने से परहेज बरता.

वे कहते हैं, ‘राजनैतिक वर्ग इस इलाके को सरकारी या बाजार के पैसे से विकास नहीं करने देना चाहते हैं. शिक्षा का प्रसार बहुत सीमित है. बहुत ज्यादा गैर-बराबरी है, जो सरकार की गलत नीतियों के चलते चौड़ी हुई है.’

तीनों जिले खेती-किसानी पर निर्भर हैं. गरीबों के पास छोटी जोत है इसलिए उनका गुजारा नहीं चलता. लिहाजा, कई परिवारों को रोजगार के बाहर जाने पर मजबूर होना पड़ता है.

त्रिवेदी के मुताबिक, श्रावस्ती, बहराइच और बलरामपुर में लंबे समय से ‘जमींदारों का दबदबा’ है. वे कहते हैं, ‘इन जगहों पर भूमि सुधार कभी लागू नहीं हो पाया. राजनैतिक अर्थव्यवस्था पर ब्राह्मणों और ठाकुरों का कब्जा है, जिनके पास सामाजिक पूंजी है. जमीन के मामले में गैर-बराबरी भारी है. राज्य के बाकी हिस्सों के मुकाबले यहां ऊंची जातियों के पास काफी जमीन है और बहुत सारे गरीब भूमिहीन हैं.’


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शौचालय लकड़ी रखने के काम, गैस सिलिंडर खाली

जहां नए उद्योग-धंधे बमुश्किल पैदा होते हों, ऐसे तीन जिलों के लोगों की उम्मीदें सरकारी योजनाओं पर ही टिकी रहती हैं. मनरेगा से लेकर उज्ज्वला तक किसी न किसी योजना से कई लोग लाभान्वित हैं मगर जिलों में इन कार्यक्रमों के अमल में काफी फर्क हैं.

कई गांवों में स्वच्छ भारत योजना के तहत बने शौचालय का अब इस्तेमाल लकड़ी या मवेशियों के लिए चारा-भूसा वगैरह रखने के लिए किया जाता है. कई जगहों पर सामुदायिक शौचालय वर्षों से बंद पड़े हैं और जहां खुले हैं, उनमें कोई नहीं जाता क्योंकि पानी की व्यवस्था नहीं है.

बलरामपुर जिले के एक गांव में बंद स्वच्छ भारत शौचालय | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

इसी वजह से बलरामपुर के गायसारी ब्लॉक के पहाड़पुर गांव की रूपा देवी जैसी गांववाले अभी भी खुले में शौच करते हैं.

उनका कहना है कि प्रधान के स्तर पर भारी भ्रष्टाचार है और मनरेगा में काम देने या प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर देने के मामले में जाति और समुदाय की ज्यादा चलती है.

बहराइच के दुलारपुर गांव में कुछ महीने पहले  (बिना शौचालय) घर पाने वाली हजूरा बेगम कहती हैं, ‘यहां कमीशन सिस्टम चलता है. मैंने पीएम-आवास के लिए अपने आवेदन को आगे बढ़ाने की खातिर प्रधान को 5,000 रु. देने पड़े.’

ज्यादातर गांववालों को उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलिंडर मिला लेकिन कई फिर लकड़ी का जलावन इस्तेमाल करने लगे क्योंकि वह सस्ता पड़ता है. खाली सिलिंडर भराने में करीब 900 रु. लगते हैं.

डॉ. बी.आर. आंबेडकर स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के कुलपति डॉ. एन.आर. भानुमूर्ति कहते हैं कि ये योजनाएं लंबे दौर के व्यवहार में बदलाव के बिना अधूरी हैं, ताकि ‘आश्वस्त हो सके कि खाते में जा रही रकम का लक्षित इस्तेमाल हो सके.’
उनका मानना है कि लोगों को खैरात पर निर्भर बनाने के बदले सरकार को ऐसे अवसर तैयार करने चाहिए जिससे आत्मनिर्भरता बढ़े और स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसे विकास के इंडिकेटर मजबूत हों. वे कहते हैं, ‘समग्र विकास पर जोर होना चाहिए.’

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