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Monday, 12 January, 2026
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नेशनल हेराल्ड मामला: क्या ED ने तोड़ी अपनी ही रुल-बुक? गांधी परिवार के खिलाफ चार्जशीट क्यों हुई खारिज

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कार्रवाई करते समय ED अपनी सामान्य प्रक्रिया के खिलाफ गई, जिसमें वह सीबीआई की एफआईआर और चार्जशीट के आधार पर जांच शुरू करती है, जबकि सीबीआई खुद इस केस की मजबूती को लेकर सतर्क थी.

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नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने कहा है कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गांधी, राहुल गांधी और अन्य लोगों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू नहीं कर सकता, क्योंकि मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत किसी “अनुसूचित अपराध” की जांच के लिए जरूरी एक बुनियादी शर्त पूरी नहीं हुई थी. इसी आधार पर कोर्ट ने ईडी की अभियोजन शिकायत को खारिज कर दिया.

अपने आदेश में विशेष सीबीआई जज विशाल गोगने ने कहा कि एफआईआर का दर्ज होना ही वह “कानूनी आधार” है, जिसके बाद ईडी ईसीआईआर (जो जांच एजेंसी की एफआईआर जैसी होती है) दर्ज कर जांच शुरू करता है और फिर अभियोजन शिकायत (जो पुलिस चार्जशीट के बराबर होती है) दाखिल करता है.

पीएमएलए के तहत “अनुसूचित अपराध” का मतलब उस मूल अपराध से है (जैसे आतंकवाद, ड्रग तस्करी या टैक्स चोरी), जिससे “अपराध की आय” पैदा होती है और जिसकी जांच मनी लॉन्ड्रिंग कानून के तहत की जाती है.

आदेश में कहा गया कि पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 223 के तहत किसी सार्वजनिक व्यक्ति द्वारा कोर्ट में दी गई सिर्फ एक शिकायत, भले ही उसमें कोई अनुसूचित अपराध बताया गया हो, ईडी को जांच का अधिकार नहीं देती.

कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में आगे बढ़ते हुए ईडी ने अपनी ही सामान्य प्रक्रिया के उलट काम किया. आमतौर पर ईडी, सीबीआई की एफआईआर और चार्जशीट के आधार पर जांच शुरू करती है, जबकि सीबीआई खुद इस केस की व्यवहारिकता को लेकर सतर्क थी. यानी ईडी ने पूरी प्रक्रिया को उलट दिया.

नेशनल हेराल्ड मामला

नवंबर 2012 में बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने दिल्ली की एक अदालत में निजी शिकायत दाखिल की थी. इसमें आरोप लगाया गया था कि कांग्रेस ने 2002 से 2011 के बीच दैनिक अखबार नेशनल हेराल्ड को फिर से शुरू करने के लिए एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) को 90.25 करोड़ रुपये का बिना ब्याज वाला कर्ज दिया.

इस अखबार की प्रकाशक कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स की स्थापना भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने की थी.

एक मजिस्ट्रेट के आदेश पर, ईडी ने जून 2014 में प्रवर्तन केस सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर) दर्ज की. इसके तहत गांधी परिवार और कांग्रेस के अन्य नेताओं, जिनमें दिवंगत मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडिस भी शामिल थे, को समन भेजा गया.

स्वामी ने आरोप लगाया कि 2010 में एजेएल के बोर्ड ने इस कर्ज को एक नई बनाई गई कंपनी यंग इंडिया लिमिटेड (वाईआईएल) को 50 लाख रुपये में ट्रांसफर करने को मंजूरी दी. यह कंपनी मुख्य रूप से गांधी परिवार के नियंत्रण में थी.

स्वामी के मुताबिक, इस कर्ज के ट्रांसफर के जरिए गांधी परिवार ने वाईआईएल के माध्यम से एजेएल की 99 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल कर ली और 2,000 करोड़ से 5,000 करोड़ रुपये तक की संपत्तियों पर “धोखाधड़ी से” कब्जा कर लिया. वाईआईएल में सोनिया और राहुल गांधी की 38-38 प्रतिशत हिस्सेदारी थी.

आखिरकार ईडी ने गांधी परिवार, सैम पित्रोदा, सुमन दुबे, कंपनी के निदेशकों और तीन अन्य लोगों के खिलाफ अभियोजन शिकायत दाखिल की.

इस हफ्ते दिल्ली की अदालत ने नेशनल हेराल्ड मामले में गांधी परिवार की ओर से पेश हुए वकील अभिषेक मनु सिंघवी और ईडी की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू की दलीलें सुनीं.

हालांकि, कोर्ट ने कहा कि वह दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर चल रही एजेंसी की जांच में दखल नहीं देगा. अक्टूबर में ईओडब्ल्यू ने इसी तरह के आरोपों में गांधी परिवार और अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था.

जज ने कहा, “ईओडब्ल्यू, दिल्ली द्वारा 03.10.2025 को दर्ज की गई एफआईआर के बाद ईडी द्वारा की जा रही जांच को देखते हुए, अब इस स्तर पर ईडी और प्रस्तावित आरोपियों द्वारा उठाए गए तर्कों पर आरोपों के गुण-दोष पर फैसला देना जल्दबाजी और अनुचित होगा.”

कोर्ट के आदेश के बाद बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि इस मामले का एकमात्र उद्देश्य “गांधी परिवार को परेशान करना” और विपक्ष को निशाना बनाना था. उन्होंने केंद्रीय जांच एजेंसियों के राजनीतिक दुरुपयोग का आरोप भी लगाया.

खरगे ने आगे कहा, “मैं कहना चाहता हूं कि इस फैसले के बाद मोदी और शाह को इस्तीफा दे देना चाहिए, क्योंकि यह उनके मुंह पर तमाचा है. उन्हें अपना इस्तीफा देना चाहिए, क्योंकि इस तरह लोगों को परेशान नहीं किया जाना चाहिए. उन्हें समझना चाहिए कि अगर वे ऐसा करेंगे, तो लोग इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे.”

कोर्ट ने ईडी पर उसी की नियम-पुस्तिका लागू कर दी

दिल्ली की अदालत ने कहा कि ईडी ने गांधी परिवार और अन्य लोगों को 26 जून 2014 को पटियाला हाउस कोर्ट द्वारा जारी समन को मनी लॉन्ड्रिंग जांच और अभियोजन शिकायत के लिए “मूल अपराध” (प्रेडिकेट ऑफेंस) का आधार बताया था. यह समन मजिस्ट्रेट ने सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत पर जारी किया था.

अदालत ने आगे कहा कि ईडी ने इसी समन आदेश को अपनी शिकायत का आधार बनाया, लेकिन यह नहीं बताया कि उसे स्वामी से उसी तरह के आरोपों वाली एक शिकायत सीधे भी मिली थी.

अदालत ने कहा, “इसलिए ईडी की मौजूदा अभियोजन शिकायत असल में स्वामी द्वारा 09.01.2013 को माननीय मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के सामने की गई शिकायत पर ही आधारित है, और साथ ही 04.07.2014 को ED को दी गई उनकी अलग शिकायत पर भी आधारित है.”

अदालत ने आगे कहा, “असल में, एक सार्वजनिक व्यक्ति यानी स्वामी की शिकायत न केवल मूल अपराध की कार्यवाही का आधार बनी, बल्कि इस अदालत के सामने पीएमएलए की धारा 4 के तहत दायर शिकायत की शुरुआती सामग्री भी वही है.”

इसके अलावा, अदालत ने 2024 की फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की रिपोर्ट का भी हवाला दिया. इस रिपोर्ट में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के भीतर नोडल अधिकारियों की भूमिका पर जोर दिया गया है, जो पीएमएलए के तहत जांच योग्य संभावित मामलों की पहचान कर ईडी को जानकारी देते हैं.

अदालत ने कहा कि इस व्यवस्था के तहत ईडी और कानून प्रवर्तन एजेंसी (एलईए) के बीच संभावित मामलों और उनसे जुड़े मूल अपराधों की पहचान को लेकर दो-तरफा जानकारी का आदान-प्रदान होता है, लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि यह दो-तरफा जानकारी का प्रवाह ईडी और स्वामी जैसे किसी निजी शिकायतकर्ता के बीच नहीं हो सकता. साथ ही यह जोड़ा कि अनुसूचित अपराध के मामले में एफआईआर, निजी शिकायत पर आधारित कार्यवाही की तुलना में “गुणात्मक रूप से बेहतर” होती है.

जज ने ईडी की वार्षिक रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिससे यह साबित होता है कि ईडी संभावित मामलों की पहचान करने और मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू करने के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जांच पर निर्भर रहती है.

उन्होंने दो उदाहरण भी दिए—नवंबर 2013 में केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के सामने और पिछले साल सूचना के अधिकार (आरटीआई) से जुड़े एक अपील मामले की सुनवाई के दौरान—जब खुद ईडी ने यह माना था कि मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू करने के लिए एफआईआर ज़रूरी है.

अदालत ने कहा, “एफएटीएफ रिपोर्ट, ईडी की अपनी वार्षिक रिपोर्ट और अलग-अलग प्राधिकरणों के सामने उसका लगातार लिया गया रुख यह पुष्टि करता है कि एजेंसी हमेशा पीएमएलए के तहत किसी अपराध की जांच को एफआईआर दर्ज होने और किसी दूसरी कानून प्रवर्तन एजेंसी द्वारा मूल अपराध की जांच शुरू होने पर निर्भर मानती रही है.”

फिर भी, अदालत ने कहा, ईडी ने 30 जून 2021 को—स्वामी की शिकायत और 26 जून 2014 के मजिस्ट्रेट आदेश के सात साल बाद—सिर्फ शिकायत मामले में जारी समन आदेश के आधार पर ईसीआईआर दर्ज कर ली.

अदालत ने कहा, “मूल अपराध में एफआईआर को पीएमएलए जांच शुरू करने का आधार मानने वाला लंबे समय से चला आ रहा नज़रिया, इस मामले में बिना ऐसी एफआईआर के अभियोजन शिकायत दायर करके ईडी ने तोड़ दिया.”

‘टेम्पलेट को उलट दिया’

विशेष सीबीआई जज गोगने ने आगे कहा कि ईडी के अधिकारी खुद भी इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं थे कि किसी निजी शिकायत और उस पर जारी समन आदेश को मनी लॉन्ड्रिंग जांच के लिए वैध “मूल अपराध” माना जा सकता है या नहीं. इसका पता ईडी की अपनी केस डायरी और सीबीआई के साथ हुए पत्राचार से चलता है.

ईडी की केस डायरियों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि 2014 से 2021 के बीच उसके अधिकारियों के बीच इस बात पर सहमति दिखती है कि जून 2014 में दिए गए कोर्ट के आदेश के तहत कोई मूल अपराध बनता ही नहीं था. अदालत ने उस समय लागू ईडी के एक “तकनीकी सर्कुलर” का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि मामला दर्ज करना उचित नहीं है.

दरअसल, ईडी ने 28 जुलाई 2014 को सीबीआई को पत्र लिखकर कहा था कि स्वामी द्वारा दी गई शिकायत के तहत कोई मूल अपराध नहीं बनता, क्योंकि उसमें किसी एफआईआर का कोई ज़िक्र नहीं था.

इसके बाद अदालत ने कहा कि ईडी निदेशक ने अपने सीबीआई समकक्ष को एक और पत्र लिखकर कहा कि “अगर उचित समझा जाए” तो जरूरी कार्रवाई की जाए. इसी बीच, स्वामी ने सीबीआई निदेशक को भी वही आरोप लगाते हुए एक अलग शिकायत भेजी थी.

स्वामी की शिकायत के सात साल बाद ईडी ने ईसीआईआर दर्ज कर दी, जबकि सीबीआई इस मामले की व्यवहारिकता को लेकर अब भी “सतर्क” बनी हुई थी. अदालत ने जोड़ा कि यह सब तब हुआ, जब आमतौर पर दोनों एजेंसियां साथ मिलकर काम करती हैं.

देश की प्रमुख जांच एजेंसी होने के नाते, अदालत ने कहा कि ईडी ने कई बार मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों और अभियोजन शिकायतों की शुरुआत करने के लिए सीबीआई की एफआईआर और चार्जशीट पर भरोसा किया है.

इसी आधार पर अदालत ने कहा कि समान अवधि तक आरोपों की जानकारी होने के बावजूद एफआईआर दर्ज करने में सीबीआई की “हिचक” को ईडी की जांच की दिशा तय करनी चाहिए थी.

अदालत ने कहा, “2014 में पहले सीबीआई के साथ जानकारी साझा करने और फिर सात साल तक सीबीआई की कार्रवाई का इंतजार करने के बाद, ईडी ने 30.06.2021 को अपनी खुद की ईसीआईआर दर्ज कर मनी लॉन्ड्रिंग को मूल अपराध के बाद होने वाली प्रक्रिया मानने वाले पूरे टेम्पलेट को ही उलट दिया.”

आदेश में आगे कहा गया, “यह कदम सिर्फ अपराध की आय की जांच करने वाली एक स्वतंत्र एजेंसी के रूप में ईडी की भूमिका का प्रदर्शन नहीं था. बल्कि यह एक ओर दूसरी कानून प्रवर्तन एजेंसी यानी सीबीआई के अधिकार क्षेत्र में एकतरफा दखल और दूसरी ओर पीएमएलए की पूरी व्यवस्था से आगे निकलने की गलत कोशिश को दर्शाता है. पीएमएलए के तहत पहले अनुसूचित अपराध दर्ज होना और उसकी जांच शुरू होना पहला कदम है, और उसके बाद मनी लॉन्ड्रिंग की जांच दूसरा कदम. शायद ईडी को भी सीबीआई की तरह ही संयम बरतना चाहिए था.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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