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Wednesday, 14 January, 2026
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मोरबी हादसा : उच्च न्यायालय ने पूछा, संचालन और रखरखाव का ठेका बिना निविदा निकाले क्यों दिया

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अहमदाबाद, 15 नवंबर (भाषा) गुजरात उच्च न्यायालय ने मंगलवार को मोरबी पुल त्रासदी मामले में स्वत: संज्ञान वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से पूछा कि ब्रिटिश काल की इस संरचना के संरक्षण एवं संचालन के लिए किस आधार पर रुचि पत्र के लिए कोई निविदा नहीं निकाली गई और बिना निविदा निकाले ही किसी व्यक्ति विशेष पर ‘‘कृपा क्यों की गई।’’ मामले की अगली सुनवाई बुधवार को होगी।

गुजरात के मोरबी जिले में मच्छु नदी पर बना ब्रिटिश काल का पुल मरम्मत के बाद खोले जाने के पांच दिन बाद 30 अक्टूबर को ढह गया था और हादसे में महिलाओं, बच्चों सहित 135 लोगों की जान चली गई थी।

स्वत: संज्ञान के आधार पर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए अदालत ने जानना चाहा कि क्या राज्य सरकार ने अजंता मैन्युफैक्चरिंग प्राइवेट लिमिटेड (ओरेवा समूह) के साथ 16 जून, 2008 के समझौता ज्ञापन (एमओयू) और वर्ष 2022 के समझौते में फिटनेस प्रमाणपत्र के संबंध में किसी तरह की शर्त लगाई थी, यदि ऐसा था तो इसे करने के लिए सक्षम प्राधिकार कौन था?

मुख्य न्यायाधीश अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति आशुतोष शास्त्री ने कहा, ‘‘यह समझौता सवा पन्ने का है जिसमें कोई शर्त नहीं है। यह समझौता एक ‘सहमति’ के रूप में है। राज्य सरकार की यह उदारता 10 साल के लिए है, कोई निविदा नहीं निकाली गई, किसी तरह की रुचि की अभिव्यक्ति नहीं है।’’

अदालत ने पूछा, ‘‘15 जून, 2017 को अवधि बीतने के बाद राज्य सरकार और मोरबी नगरपालिका द्वारा निविदा निकालने के लिए कौन से कदम उठाये गये? क्यों अभिव्यक्ति की रुचि के लिए कोई निविदा नहीं निकाली गई और कैसे बिना निविदा निकाले किसी व्यक्ति विशेष पर कृपा की गई।’’

अदालत ने कहा कि 15 जून, 2017 को अवधि बीतने के बावजूद अजंता (ओरेवा समूह) को पुल के रखरखाव और प्रबंधन का काम बिना किसी समझौते के जारी रखने के लिए कहा गया। कंपनी के साथ वर्ष 2008 में एमओयू पर हस्ताक्षर हुए थे जिसकी अवधि वर्ष 2017 में समाप्त हुई। उच्च न्यायालय ने जानना चाहा कि क्या यह अवधि समाप्त होने के बाद संचालन और रखरखाव के उद्देश्य से निविदा निकालने के लिए स्थानीय प्राधिकारियों ने कोई कदम उठाए ?

उच्च न्यायालय ने सात नवंबर को कहा था कि इसने एक खबर के आधार पर पुल हादसा मामले में स्वत: संज्ञान लिया था और इसे जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया था।

अदालत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया था कि गुजरात सरकार (जिसका प्रतिनिधित्व मुख्य सचिव करते हैं), राज्य के गृह विभाग, नगर पालिका आयुक्त, मोरबी नगरपालिका, जिला कलेक्टर और राज्य मानवाधिकार आयोग को पक्षकार बनाया जाए।

पुल हादसे के बाद पुलिस ने 31 अक्टूबर को ओरेवा समूह से संबद्ध चार व्यक्तियों सहित नौ लोगों को गिरफ्तार किया था। पुल के संचालन एवं रखरखाव का जिम्मा संभाल रहीं कंपनियों के खिलाफ एक मामला दर्ज किया गया है।

उच्च न्यायालय को बताया गया है कि राज्य मानवाधिकार आयोग ने इस हादसे की जांच के लिए कमेटी गठित की है। उन्न न्यायालय ने राज्य सरकार से वर्ष 2008 के एमओयू समेत विभिन्न मुद्दों के संबंध में जवाब तलब किया है और 24 नवंबर तक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।

भाषा संतोष संतोष माधव

माधव

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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