नयी दिल्ली, 30 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने एक वकील के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करते हुए कहा है कि सलाह या सुझाव देने के अपने पेशेवर कर्तव्य के तहत किसी वकील की मात्र मौजूदगी को धमकी के बराबर नहीं माना जा सकता है।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और पी. बी. वराले की पीठ ने कहा कि यदि कोई आरोप अस्पष्ट हैं और उनके समर्थन में प्रारंभिक ठोस प्रमाण नहीं हैं तो आईपीसी की धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत अपराध का मामला नहीं बनता।
उच्चतम न्यायालय ने आईपीसी की धारा 506 के तहत दर्ज आपराधिक मामले को रद्द कर दिया है। यह मामला वकील बेरी मनोज के खिलाफ दर्ज किया गया था। बेरी मनोज यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) मामले में आरोपी के रिश्तेदार हैं।
पीठ ने गौर किया कि सीआरपीसी की धारा 161 (पुलिस अधिकारी के समक्ष बयान) और सीआरपीसी की धारा 164 (मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान) के तहत पीड़ित द्वारा दिए गए बयान में सुधार हुआ है।
पीठ ने 20 जनवरी के अपने आदेश में कहा, ‘‘किसी वकील (इस मामले में अपीलकर्ता) की पेशेवर कर्तव्य निर्वहन के रूप में सलाह या सुझाव देने की क्षमता मात्र उपस्थिति को धमकी नहीं माना जा सकता है और यह मूलभूत तथ्य इस मामले में स्पष्ट रूप से मौजूद नहीं है।’’
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज स्पष्ट बयान से यह पता चलता है कि आपराधिक धमकी का कोई इरादा प्रथमदृष्टया स्थापित नहीं हुआ है, क्योंकि आपराधिक धमकी के लिए किसी व्यक्ति पर मुकदमा चलाने के लिए भय उत्पन्न करने का स्पष्ट इरादा आवश्यक है, चाहे पीड़ित भयभीत हुआ हो या नहीं।
उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया और मनोज के खिलाफ 2022 में शुरू की गई कार्यवाही को निरस्त कर दिया और यह स्पष्ट कर दिया कि अन्य आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही संबंधित अदालत में जारी रहेगी।
वर्ष 2022 में तीन लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी और जांच पूरी होने पर पांच लोगों के खिलाफ आरोप-पत्र दायर किया गया था, जिसमें मनोज को आरोपी के रूप में नामित किया गया था।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि आरोप-पत्र में मौजूद सबूतों से पता चलेगा कि मनोज के खिलाफ मुख्य आरोप आईपीसी की धारा 506 के तहत आपराधिक धमकी का है, जो कथित घटना के आठ दिन बाद पीड़ित द्वारा सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज किए गए बयान पर आधारित है।
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देवेंद्र माधव
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