नई दिल्ली: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में बार और बेंच के बीच हुई तीखी बहस, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस राजेश कुमार गुप्ता कर रहे थे, के बाद मुख्य न्यायाधीश को औपचारिक शिकायत दी गई है और जज से जुड़े पुराने विवाद फिर से चर्चा में आ गए हैं.
नई दिल्ली के वकील ऋषिकेश कुमार, जिन्होंने सोमवार को कोर्ट रूम नंबर 10 में अपना केस बुलाए जाने का इंतज़ार करते हुए यह घटना देखी, उन्होंने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा के सामने शिकायत दी और कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को ईमेल कर अपने सामने हुई पूरी घटना का विवरण भेजा.
वकील ने दिप्रिंट को बताया कि वह कोर्ट स्टाफ के जवाब का इंतज़ार कर रहे हैं और ज़रूरत पड़ने पर हाई कोर्ट के सामने प्रत्यक्ष गवाह के रूप में बयान देने को तैयार हैं.
सोमवार को ही वकील ने एक्स पर एक लंबी पोस्ट लिखी, जिसमें उन्होंने कहा कि “16 साल की वकालत में मैंने ऐसा कुछ पहले कभी नहीं देखा.”
उन्होंने लिखा, “यह घटना मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच में हुई, जिसकी अध्यक्षता माननीय जस्टिस राजेश कुमार गुप्ता कर रहे थे. न्यायिक संयम खोना और इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना बेहद चिंताजनक है. यह एक संवैधानिक अदालत के अनुरूप नहीं है और ऐसे पद पर बैठे जज से जिस गरिमा और संयम की उम्मीद होती है, उसके खिलाफ है.”
ऋषिकेश कुमार ने दिप्रिंट को प्रत्यक्षदर्शी के तौर पर बताया कि जो हुआ वह “सिर्फ असंसदीय ही नहीं बल्कि पहले कभी न सुना गया” था. उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट जज जैसा संवैधानिक पद बहुत महत्वपूर्ण होता है.
उनके अनुसार, जब एक अन्य मामला सुना जा रहा था और एक वकील वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपना पक्ष रख रहे थे, तभी लाइव स्ट्रीमिंग बंद कर दी गई. इसके बाद जज ने कथित तौर पर बेंच से “बहुत अपमानजनक और असंसदीय भाषा” का इस्तेमाल किया.
दिप्रिंट ने सोमवार को हुई इस कथित घटना पर प्रतिक्रिया के लिए हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार को ईमेल भेजा है. जवाब मिलने पर रिपोर्ट अपडेट की जाएगी.
ऋषिकेश कुमार की बात की पुष्टि करते हुए, वहां मौजूद एक अन्य वकील ने दिप्रिंट को बताया कि बहस कैसे बढ़ी. इस वकील के अनुसार, जज शायद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर पेश हो रहे वकील के लहज़े या दलीलों से नाराज़ हो गए थे.
इस वकील के मुताबिक, जज बेंच पर खड़े होकर चिल्लाने लगे और कथित तौर पर कहा, “मैं छोड़ूंगा नहीं, इसने पहले भी ऐसा किया है, मैं गुंडा हूं.” कुछ समय बाद कोर्ट स्टाफ ने उन्हें शांत करने की कोशिश की और बार के सदस्य भी उनसे बात करने पहुंचे.
प्रत्यक्षदर्शियों ने दिप्रिंट को बताया कि “लगता है कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पेश हो रहे वकील बाद में कोर्ट में नीचे आए और जज से बात की” और बार के सदस्यों की मदद से मामला आखिरकार शांत हुआ.
उन्होंने कहा कि अगर वकील और जज के बीच मतभेद भी हों, तो उसे सुलझाने के दूसरे तरीके होते हैं और “एक हाई कोर्ट जज का सार्वजनिक रूप से इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना उचित नहीं है.”
जस्टिस गुप्ता पिछले साल दो बार खबरों में रहे. जुलाई 2025 में, जब उन्हें दो साल के लिए हाई कोर्ट में पदोन्नत किया गया, तब एक महिला सिविल जज ने सार्वजनिक रूप से विरोध में इस्तीफा दे दिया था.
उन्होंने उस समय के भारत के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई सहित सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठ जजों को पत्र लिखकर कोलेजियम के फैसले पर चिंता जताई थी, जिसमें उस समय के जिला जज रहे गुप्ता को हाई कोर्ट में पदोन्नत करने की सिफारिश की गई थी. उन्होंने अलग से केंद्र सरकार को भी पत्र लिखा था.
यह सिविल जज 2023 में प्रदर्शन मूल्यांकन प्रणाली में कम अंक आने के बाद सेवा से हटा दी गई थीं. बाद में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपनी बर्खास्तगी को मनमाना बताते हुए चुनौती दी. पिछले साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बहाल कर दिया.
अपने पत्र में उन्होंने कहा था कि बर्खास्तगी के खिलाफ दायर याचिका में उन्होंने जस्टिस गुप्ता द्वारा कथित उत्पीड़न का ज़िक्र किया था. उनकी याचिका में ऐसे मामलों का जिक्र था, जहां जस्टिस गुप्ता और उनकी पत्नी ने कथित तौर पर सार्वजनिक रूप से उनके खिलाफ टिप्पणी की, जिससे “एक महिला और न्यायिक अधिकारी के रूप में उनकी गरिमा को ठेस पहुंची.”
दिप्रिंट ने उस पत्र का विवरण पहले प्रकाशित किया था.
सुप्रीम कोर्ट के सूत्रों ने उस समय दिप्रिंट को बताया था कि जस्टिस गुप्ता का नाम 2023 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट कोलेजियम ने भेजा था, लेकिन उस समय के सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ की अगुवाई वाले कोलेजियम ने उनकी फाइल वापस भेज दी थी और महिला जज की शिकायत की जांच करने को कहा था.
सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया, उसी महीने जस्टिस गुप्ता पर एक गोपनीय अदालत दस्तावेज़ लीक कराने के आरोप भी लगे थे. इस मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के एक जज को सौंपी गई थी, जिन्होंने बाद में जिला जज को क्लीन चिट दे दी.
सितंबर 2025 में भी जस्टिस गुप्ता सुर्खियों में आए, जब मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक ट्रायल कोर्ट जज के खिलाफ उनकी “अपमानजनक” टिप्पणियों पर कड़ी आपत्ति जताई.
जस्टिस अतुल श्रीधरन की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि 12 सितंबर को जस्टिस गुप्ता द्वारा दिए गए आदेश पर उसे स्वत: संज्ञान लेना पड़ा, जिसमें उन्होंने शिवपुरी के प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का सुझाव दिया था.
हाई कोर्ट की बेंच ने कहा कि जस्टिस गुप्ता का आदेश जरूरत से ज्यादा था और अधिकार क्षेत्र के बिना दिया गया था. बेंच ने यह भी कहा कि एएसजे के आदेश के गुण-दोष पर की गई टिप्पणियां गैर-ज़रूरी और अत्यधिक थीं, क्योंकि वे एक अलग मामले में की गई थीं.
बेंच ने आगे कहा कि इस तरह की टिप्पणियां सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का सीधा उल्लंघन हैं, जिनमें बार-बार कहा गया है कि ट्रायल कोर्ट जजों के खिलाफ ऐसी प्रतिकूल टिप्पणियां नहीं की जानी चाहिए, जो जिला अदालतों की छवि खराब कर सकती हैं.
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