प्रयागराज, 27 जनवरी (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रदेश की सभी अदालतों को निर्देश दिया है कि वे आपराधिक मुकदमों में आरोप तय करना महज इसलिए ना टालें क्योंकि आरोप से बरी करने का आवेदन खारिज किए जाने के खिलाफ आरोपी ने पुनर्विचार याचिका या अपील दायर कर रखी है।
न्यायमूर्ति सी. प्रकाश ने यह निर्देश देते हुए अवनीश चंद्र श्रीवास्तव नाम के एक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका खारिज कर दी। सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी अवनीश चंद्र श्रीवास्तव 2004 के धोखाधड़ी के एक मामले में आरोपी है।
याचिकाकर्ता ने कौशांबी के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी थी। निचली अदालत ने आरोप से बरी करने की उसकी अर्जी खारिज कर दी थी।
अदालत ने कहा कि यदि आरोप से बरी करने का आवेदन खारिज कर दिया जाता है और ऊपर की अदालत द्वारा उस आदेश पर रोक नहीं लगाई जाती है तो आरोप तय करना निचली अदालतों का एक वैधानिक कर्तव्य है।
अदालत ने आठ जनवरी के अपने आदेश में निचली अदालतों द्वारा यह बहाना बनाकर कि उच्च न्यायालय में आपराधिक पुनरीक्षण या रिट याचिका लंबित है, आरोप तय करने से बचने के चलन पर चिंता व्यक्त की।
अदालत ने कहा, ‘‘यह कानून का स्थापित प्रावधान है कि किसी आदेश के खिलाफ आपराधिक पुनर्विचार या आपराधिक अपील दायर करने का अर्थ यह नहीं है कि उस अदालत के मुकदमे पर रोक लगा दी गई है।’’
अदालत ने कहा कि यदि सत्र अदालत या मजिस्ट्रेट को आरोपी व्यक्ति को आरोप से बरी करने का कोई आधार नहीं मिलता है तो जब तक आरोप से बरी करने के आवेदन को खारिज करने के आदेश को चुनौती ना दी जाए और उच्च न्यायालय द्वारा उस पर रोक ना लगा दी जाए, सत्र न्यायालय और मजिस्ट्रेट की अदालतें सीआरपीसी की धारा 228 और 240 के तहत आरोपी के खिलाफ आरोप तय करने के लिए वैधानिक रूप से बाध्य हैं।
भाषा सं राजेंद्र शोभना
शोभना
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