मुंबई: मानव-जानवर टकराव में मौतों की घटनाएं बढ़ने के बाद महाराष्ट्र सरकार ने बड़ी संख्या में तेंदुओं को पकड़ा है और अब उन्हें रखने के लिए जगह खोजने में मुश्किल हो रही है. दिप्रिंट को मिली जानकारी के अनुसार कई तेंदुओं को महीनों तक पिंजरों में रखना पड़ रहा है.
तेंदुओं और इंसानों के बीच बढ़ते टकराव की एक खास वजह पश्चिमी महाराष्ट्र के गन्ना उगाने वाले जिले—पुणे, नासिक और अहिल्यानगर, माने जा रहे हैं, जहां तेंदुए गन्ने के खेतों में रह रहे हैं और वहीं प्रजनन भी कर रहे हैं. गन्ने की ऊंची और घनी फसल इन तेंदुओं को छिपने के लिए सुरक्षित जगह देती है, खासकर तब जब मादा तेंदुआ भोजन की तलाश में जाती है और शावक खेतों में रहते हैं.
वन अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि पुणे डिवीजन के जुन्नर इलाके से 108 तेंदुओं को पकड़कर कैद में रखा गया क्योंकि वे गांवों के करीब घूम रहे थे और उन्हें खतरा माना जा रहा था. अधिकारियों के अनुसार, पिछले छह महीनों में तेंदुओं के गांवों में घुसने और लोगों पर हमले की 20 घटनाएं हुईं, जिनमें छह लोगों की मौत हुई.
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इससे यह सवाल उठता है कि राज्य की प्रतिक्रिया कितनी संतुलित है क्योंकि इन अकेले रहने वाले जानवरों को रखने के लिए पूरे राज्य में कुल लगभग 120-130 जगह ही उपलब्ध है.
जुन्नर की तरह अन्य जिलों में भी तेंदुओं को पकड़ने की कार्रवाई हुई, जिसमें अहिल्यानगर (पहले अहमदनगर) शामिल है, जहां से 21 तेंदुओं को पकड़ा गया.

जुन्नर के माणिकडोह केंद्र में पेड़ की डाली पर बैठा एक तेंदुआ | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंटपकड़े गए तेंदुओं को तीन जगहों पर रखा जाता है—जुन्नर वन क्षेत्र का माणिकडोह लेपर्ड रेस्क्यू सेंटर, मुंबई का संजय गांधी नेशनल पार्क और नागपुर का बालासाहेब ठाकरे गोरेवाड़ा इंटरनेशनल जूलॉजिकल पार्क.
एक डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ज्यादातर तेंदुए पुणे, नासिक और अहिल्यानगर से पकड़े गए, “जहां टकराव ज्यादा था.”

जगह कम पड़ने पर वन विभाग ने कम से कम एक केंद्र—माणिकडोह, से पकड़े गए तेंदुओं को गुजरात के जामनगर स्थित रिलायंस फाउंडेशन के ‘Vantara: Global Wildlife Rescue and Conservation Centre’ भेजना शुरू किया. 8 मार्च को 20 तेंदुओं का पहला समूह वहां भेजा गया और 30 और तेंदुओं को वहां भेजने की योजना है.
जुन्नर फॉरेस्ट डिवीजन के रेंज ऑफिसर प्रदीप चव्हाण ने तेंदुओं को पकड़ने और स्थानांतरित करने की पुष्टि की.
उन्होंने कहा, “Vantara भेजने से पहले माणिकडोह केंद्र में कुल 110 तेंदुए थे, जबकि इसकी क्षमता 94 है. फिलहाल यहां और तेंदुओं को रखने की जगह नहीं है.”

अहिल्यानगर के एक अन्य वन अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि 21 खतरनाक माने गए तेंदुओं को पकड़कर तीन महीने तक वन नर्सरी में ट्रांसपोर्ट पिंजरों में रखा गया वहां तेंदुओं के लिए अपना रेस्क्यू सेंटर नहीं है, “हमें उन्हें वहीं रखना पड़ा क्योंकि हम उन्हें कहीं और नहीं भेज पाए. हमारे पास पर्याप्त पिंजरे भी नहीं हैं, इसलिए जिन पिंजरों में पकड़ा गया था, उन्हीं में रखा. इनमें से किसी की मौत नहीं हुई.”
इन तेंदुओं की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद नाराज़गी देखने को मिली.
अधिकारी ने बताया, इन 21 तेंदुओं को इसी महीने की शुरुआत में वापस जंगल में छोड़ दिया गया, क्योंकि उनकी कैद की स्थिति को लेकर विरोध बढ़ गया था.
उन्होंने कहा, “पिछले साल भी हमने तेंदुओं को पकड़ा था, लेकिन माणिकडोह केंद्र की क्षमता पूरी होने के कारण केवल दो तेंदुओं को ही वहां भेज पाए. राज्य में ज्यादा क्षमता वाले और रेस्क्यू सेंटर की जरूरत है.”
इतनी बड़ी संख्या में तेंदुओं को पकड़ने के कारण पर चव्हाण ने कहा कि इसका उद्देश्य तेंदुओं को “भोजन उपलब्ध कराना” है और “उन्हें इंसानों के साथ रहने का आदी बनाने की कोशिश करना” है.
उन्होंने कहा कि तेंदुए स्वभाव से शर्मीले होते हैं और दिखना या सुनाई देना पसंद नहीं करते. अगर वे बाहर आकर इंसानों पर हमला कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि उनके पास विकल्प कम हैं, “हम कोशिश कर रहे हैं कि वे इंसानों के साथ रहने के अभ्यस्त हो जाएं, ताकि जब उन्हें छोड़ा जाए और वे फिर से आबादी वाले क्षेत्रों में लौटें, तो नुकसान न पहुंचाएं.”
चव्हाण ने आगे कहा, “फिलहाल गांव के लोग डरे हुए और नाराज़ हैं. लोगों और तेंदुओं दोनों को शांत रखने के लिए हमें उन्हें यहां रखना होगा, लेकिन हमारा उद्देश्य उन्हें हमेशा कैद में रखना नहीं है.”
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि बड़ी संख्या में जंगली जानवरों को पकड़ना मानव-वन्यजीव टकराव का समाधान नहीं हो सकता. वन अधिकारियों के अनुसार जुन्नर के गन्ना खेतों में करीब 100-150 तेंदुए हैं.
वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट-इंडिया में ह्यूमन वाइल्डलाइफ इंटरफेस मैनेजमेंट के प्रमुख डॉ. प्रशांत देशमुख ने कहा, “पिंजरों या छोटे केंद्रों से बड़े केंद्रों में भेजना केवल अस्थायी समाधान है. यह लंबे समय के लिए सही विकल्प नहीं है. जंगल में भोजन कम होने पर ये जानवर फिर से इंसानी बस्तियों की ओर लौट आते हैं. हमें ऐसे प्रयास करने चाहिए जिससे उनके लिए सुरक्षित प्राकृतिक आवास मौजूद रहे.”

बुधवार को महाराष्ट्र सरकार ने Wildlife Protection (Maharashtra Amendment) Bill, 2026 पारित किया. राज्य सरकार ने कहा कि इससे तेंदुओं समेत किसी भी वन्यजीव के शिकार की अनुमति नहीं मिलेगी.
वन मंत्री गणेश नाइक ने कहा कि यह संशोधन Wildlife (Protection) Act की धारा 12 से जुड़ा है. धारा 12 मुख्य वन्यजीव संरक्षक को शोध या आबादी नियंत्रण जैसे वैज्ञानिक प्रबंधन के उद्देश्य से शिकार की अनुमति देने का अधिकार देती है.
बहस के दौरान नाइक ने कहा कि इस बिल में तेंदुए को Wildlife (Protection) Act, 1972 की अनुसूची-I से हटाकर अनुसूची-II में डालने का प्रस्ताव नहीं है. ऐसा होने पर तेंदुए को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा कम हो जाती.
हालांकि, पिछले हफ्ते नाइक ने विधानसभा में कहा था कि राज्य तेंदुए के वर्गीकरण में बदलाव पर विचार कर रहा है. यह बिल वॉइस वोट से पारित हुआ और वन मंत्री ने कहा कि इसे केंद्र की मंजूरी भी लेनी होगी.
बहस के दौरान शिवसेना (यूबीटी) नेता आदित्य ठाकरे ने सरकार से बिल को जांच के लिए सेलेक्ट कमेटी को भेजने की मांग की.
उन्होंने कहा कि तेंदुए के वर्गीकरण में बदलाव से टकराव कम होगा, इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. ठाकरे ने “लेपर्ड मैनेजमेंट प्रोग्राम” शुरू करने की भी मांग की.
महाराष्ट्र के अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन) मिलिंद म्हैस्कर और वन मंत्री गणेश नाइक ने पकड़े गए तेंदुओं और भविष्य में उन्हें दूसरी जगह भेजने की योजना पर टिप्पणी के लिए किए गए कॉल और संदेशों का जवाब नहीं दिया.
वंतारा के एक प्रवक्ता ने दिप्रिंट को बताया कि तेंदुओं की स्थिति और प्रगति से जुड़ी जानकारी उनके सोशल मीडिया अभियान के जरिए साझा की जाएगी.
कानून क्या कहता है?
ऊपर उद्धृत डीएफओ ने कहा कि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत जानवरों को पकड़ने की दो ही वजहें अनुमति प्राप्त हैं, “पहली, मानव जीवन को खतरा और दूसरी—ऐसी बीमारी जिससे ठीक होना संभव न हो, जैसे अंधापन या शारीरिक विकृति. अधिनियम के SOP के अनुसार, पकड़े गए जानवरों को उसी जगह वापस छोड़ा जाना चाहिए, जहां से उन्हें पकड़ा गया था, जब तक कि विकृति या उस क्षेत्र में जगह की कमी के कारण उन्हें वापस नहीं छोड़ा जा सकता.”
उन्होंने आगे कहा कि तेंदुओं के मामले में उन्हें फिर से जंगल में बसाना ज्यादा जटिल हो सकता है.
उन्होंने कहा, “तेंदुओं को किसी दूसरे क्षेत्र के जंगल में नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि वे अक्सर वापस अपने पुराने क्षेत्र में लौटने की कोशिश करते हैं और ऐसा करते समय वे खुद को या दूसरों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. अगर किसी क्षेत्र में जंगल कम हो जाते हैं, तो इससे टकराव बढ़ता है. इसलिए मुख्य वन्यजीव संरक्षक (CWLW) उन्हें आजीवन कैद में रखने का आदेश दे देते हैं. माणिकडोह से वंतारा भेजे जा रहे 50 तेंदुओं में सभी (खतरनाक) नहीं हैं. उनमें से कुछ में शारीरिक विकृतियां हो सकती हैं.”
DFO ने कहा कि अगर ‘शेड्यूल I’ में शामिल कोई जानवर इंसानों के लिए खतरनाक माना जाता है, तो उसे मारने की अनुमति केवल CWLW दे सकता है. वहीं शेड्यूल II में, डिप्टी कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट भी जानवर को मारने की अनुमति दे सकता है.
उन्होंने दोनों शेड्यूल में ‘शिकार’ शब्द के इस्तेमाल पर भी ध्यान दिलाया. शेड्यूल I में स्पष्ट है—‘पहले गोली न चलाएं’. “केवल तब गोली चलाई जा सकती है जब जानवर को पकड़ना संभव न हो. शेड्यूल II में यह शर्त नहीं है.”
महाराष्ट्र में तेंदुए और टकराव
पिछले दो दशकों में गन्ने की खेती बढ़ने के साथ पश्चिम महाराष्ट्र का भौगोलिक स्वरूप तेंदुओं के लिए आदर्श आवास बन गया है.
हाल के हमलों ने इन गन्ना क्षेत्रों में डर का माहौल पैदा कर दिया है, जहां टूटे-फूटे जंगलों के कारण तेंदुए आसानी से इंसानी बस्तियों के पास पहुंच जाते हैं और कई बार उनका पता नहीं चल पाता. किसानों को इन खेतों में तेंदुए के शावक मिलना असामान्य नहीं है.
पिछले साल नवंबर में मंत्री नाइक ने पुणे के शिरूर तालुका में 13 साल के बच्चे की मौत के बाद संदिग्ध नरभक्षी तेंदुए को देखते ही गोली मारने (‘shoot-on-sight’) का दुर्लभ आदेश दिया था. बाद में उस तेंदुए को मार दिया गया. उसी महीने नासिक शहर के रिहायशी इलाके में एक तेंदुआ घुस आया था. वन विभाग के पकड़ने से पहले पांच घंटे चले ऑपरेशन के दौरान नौ लोग घायल हो गए थे. इन घटनाओं पर दिप्रिंट ने ग्राउंड रिपोर्ट की थी.
डीएफओ के अनुसार, 2022 की नवीनतम गणना में महाराष्ट्र में 1,980 तेंदुए दर्ज किए गए थे. अगली गणना इस साल होने की उम्मीद है. 2024 की एक केंद्रीय सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में 1,985 तेंदुओं के साथ महाराष्ट्र देश में दूसरे स्थान पर था, जो 2018 में 1,690 की तुलना में 17 प्रतिशत अधिक है.
मंत्री नाइक ने पिछले हफ्ते कहा था कि कुछ तेंदुओं को वंतारा भेजा जा चुका है और और भी भेजे जाएंगे, “अन्य राज्यों के वन विभागों ने भी तेंदुओं की मांग की है. केंद्र की मंजूरी मिलने के बाद उन्हें वहां भेजा जाएगा.”
विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी की क्लाइमेट एंड इकोसिस्टम टीम के लीड देबादित्यो सिन्हा ने दिप्रिंट से कहा, “वन्यजीव समवर्ती विषय है. इसका मतलब है कि कानून केंद्र सरकार बनाती है और राज्य उसे लागू करते हैं. राज्य अपने नियम बना सकते हैं, लेकिन वे केंद्रीय कानून से आगे नहीं जा सकते. वे केवल संशोधन के लिए केंद्र से अनुरोध कर सकते हैं.”
संरक्षण विज्ञान और पर्यावरण कानून के संबंध पर शोध करने वाले सिन्हा ने कहा कि WPA का मुख्य उद्देश्य वन्यजीवों की सुरक्षा है.
उन्होंने कहा, “अगर तेंदुओं को शेड्यूल I से शेड्यूल II में लाना है, तो राज्य को इसके लिए पर्याप्त कारण देने होंगे, क्या उनकी संख्या बहुत ज्यादा हो गई है या वे अब खतरे में नहीं हैं? क्या इस दावे के समर्थन में वैज्ञानिक शोध है? क्या पूरे देश में तेंदुओं की बढ़ती संख्या समस्या है? या कुछ इलाकों में आवास नष्ट होने या छेड़छाड़ के कारण वे इंसानी बस्तियों के पास आ रहे हैं? किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले विश्वसनीय वैज्ञानिक आधार ज़रूरी है.”
सिन्हा ने सवाल उठाया कि क्या तेंदुओं की सुरक्षा का स्तर घटाने का मकसद उन्हें ‘हानिकारक जानवर’ घोषित कर मारने का रास्ता खोलना है. उन्होंने कहा कि यह “पीछे जाने वाला कदम” होगा क्योंकि इससे समस्या के “वैज्ञानिक प्रबंधन” के बजाय “जानवरों को मारने” को बढ़ावा मिलेगा.
वंतारा में शिफ्टिंग
वन अधिकारियों के अनुसार, जन्नार से वंतारा भेजे गए 20 तेंदुओं—10 नर और 10 मादा, को ट्रांसपोर्ट वाहनों में ले जाया गया, जब वे गांवों में भटक कर पहुंच गए थे.
जामनगर स्थित इस केंद्र ने तेंदुओं के स्थानांतरण और देखभाल को लेकर सोशल मीडिया पर कई पोस्ट किए हैं.
8 मार्च को इंस्टाग्राम पर पोस्ट किए गए एक वीडियो में, जिसे एक पशु चिकित्सक बताया गया है, कहते हुए सुना गया: “आज हम जन्नार क्षेत्र से 20 तेंदुओं को प्राप्त कर रहे हैं, जहां मानव-तेंदुआ टकराव बहुत अधिक है. इन जानवरों के लिए यह सिर्फ स्थानांतरण नहीं है.”
उन्होंने कहा, “उनके नए घरों में गन्ने जैसे पौधे लगाए गए हैं ताकि उन्हें अपने वातावरण से परिचित महसूस हो. हर तेंदुए को सुरक्षित जगह मिलेगी, जहां वह स्वस्थ हो सके और स्वतंत्र रूप से घूम सके. समर्पित देखभाल करने वाले लोग इस बदलाव के दौरान उनका सहयोग करेंगे. इन तेंदुओं को कुछ चिकित्सकीय समस्याएं हो सकती हैं और हमारी टीम उनसे निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है.”
एक अन्य पोस्ट में वंतारा ने कहा कि राज्य सरकार के अनुरोध पर उसने वन विभाग को “लगभग 50 तेंदुओं की दीर्घकालिक देखभाल” के लिए सहयोग की पेशकश की है.
उसने कहा, “केवल पकड़ना दीर्घकालिक समाधान नहीं है, खासकर जब शिफ्टिंग की कोशिश सफल नहीं हुई. वास्तविक प्रगति समुदायों को तेंदुओं के साथ सह-अस्तित्व सिखाने, निगरानी प्रणाली मजबूत करने, मानव जीवन की सुरक्षा के लिए AI आधारित उपकरणों के उपयोग और आबादी नियंत्रण के लिए नसबंदी जैसे उपायों की संभावना तलाशने में है.”
अरबपति मुकेश अंबानी के बेटे अनंत अंबानी द्वारा संचालित वंतारा में बाघ और हाथियों सहित सैकड़ों जंगली जानवर हैं. जामनगर स्थित यह केंद्र पहले वन्यजीव कार्यकर्ताओं और पर्यावरणविदों के आरोपों के केंद्र में रहा था, जिनका कहना था कि यहां जानवरों का आयात वन्यजीव संरक्षण नियमों का उल्लंघन कर किया गया.
यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था, जिसने जांच समिति गठित की थी. पिछले साल जांच में निष्कर्ष निकला कि वंतारा ने किसी नियम का उल्लंघन नहीं किया. रिलायंस फाउंडेशन ने सभी आरोपों से लगातार इनकार किया है.
जब पूछा गया कि 50 तेंदुओं (जिन्हें अभी भेजा जाना बाकी है) का वंतारा में स्थानांतरण स्थायी है या नहीं, तो डीएफओ ने कहा, “जब हमारे पास अधिक क्षमता होगी, तो हम तेंदुओं को वहां से वापस ले आएंगे.”
‘वैकल्पिक’ तरीका
कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई दशकों से चल रहे इस मानव-वन्यजीव टकराव का स्थायी समाधान केवल जानवरों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना नहीं हो सकता.
Wildlife Conservation Trust-India के देशमुख ने कहा कि एक विकल्प यह हो सकता है कि “सबसे पहले तेंदुओं की आबादी का घनत्व और वे कारण समझे जाएं, जिनकी वजह से वे इंसानी बस्तियों के करीब आ रहे हैं.”
उन्होंने आगे कहा, “खाने की कमी को एक कारण माना जाता है, लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि तेंदुए इंसानी बस्तियों के पास आ रहे हैं या इंसान जंगलों के करीब पहुंच गए हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
