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Saturday, 31 January, 2026
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लैंड, लेबर और लाइसेंस: केंद्र की अगुवाई में नियमों में ढील को लेकर राज्यों की होड़

अनुपालन कटौती अभ्यास के चरण- I के तहत राज्यों में केंद्र के 76% विनियमन सुधार लागू किए गए. कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने लचीले भूमि उपयोग, तीसरे पक्ष के निरीक्षण, श्रम सुधारों को अपनाया.

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नई दिल्ली: अनुपालन बोझ कम करने के लिए कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन के नेतृत्व में गठित डी-रेगुलेशन टास्क फोर्स को काम शुरू किए एक साल हो गया है. यह टास्क फोर्स 23 प्राथमिक क्षेत्रों में काम कर रही है. इसके नतीजों से उत्साहित होकर कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ऐसे नए सुधार किए हैं, जो तय किए गए ढांचे से आगे जाते हैं और उनके अपने प्रशासनिक व आर्थिक हालात के अनुसार हैं. यह बात आर्थिक सर्वे 2026 में कही गई है.

उदाहरण के तौर पर, आंध्र प्रदेश और उत्तराखंड ने कुछ खास श्रेणियों के लिए भूमि परिवर्तन या भूमि उपयोग बदलने की अनिवार्यता खत्म कर दी है. इससे प्रक्रियागत देरी में काफी कमी आई है.

असम, जम्मू-कश्मीर, ओडिशा, पुडुचेरी और त्रिपुरा ने मिश्रित भूमि उपयोग क्षेत्रों के लिए नेगेटिव लिस्ट लागू की है. इसके तहत सभी गतिविधियां तब तक अनुमत हैं, जब तक उन्हें स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित न किया गया हो. इससे पहले के सख्त ज़ोनिंग ढांचे की जगह यह व्यवस्था लाई गई है. इससे नियामकीय स्पष्टता बनाए रखते हुए भूमि उपयोग में ज्यादा लचीलापन मिला है.

इसी तरह भवन और विकास मानकों के क्षेत्र में हरियाणा, मध्य प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड ने भवन उपविधियों को उदार बनाया है. इनमें सेटबैक, फ्लोर एरिया रेशियो, पार्किंग प्रतिबंध और न्यूनतम प्लॉट क्षेत्र से जुड़े विकास नियमों को सरल किया गया है.

आर्थिक सर्वे के अनुसार, इन उपायों से भूमि की बर्बादी कम हुई है, शहरी भूमि का बेहतर उपयोग संभव हुआ है और खासकर औद्योगिक व व्यावसायिक परियोजनाओं के क्रियान्वयन में आसानी हुई है.

एक दर्जन से अधिक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने नियामकीय अड़चनों को कम करने के लिए थर्ड पार्टी निरीक्षण और सेल्फ-सर्टिफिकेशन का दायरा भी बढ़ाया है.

छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान, त्रिपुरा और उत्तर प्रदेश ने भवन योजना मंजूरी के लिए थर्ड पार्टी निरीक्षण व्यवस्था शुरू की है. पर्यावरण मंजूरी के मामले में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, आंध्र प्रदेश, गोवा, तमिलनाडु और उत्तराखंड ने संचालन की अनुमति के लिए सेल्फ-सर्टिफिकेशन और थर्ड पार्टी सर्टिफिकेशन की व्यवस्था लागू की है. इससे नियमित विभागीय निरीक्षण पर निर्भरता कम हुई है.

बिहार, गुजरात, ओडिशा, महाराष्ट्र और तेलंगाना ने पिछले महीने केंद्र द्वारा चार श्रम संहिताओं की अधिसूचना जारी होने से पहले ही श्रम सुधार शुरू कर दिए थे. इनमें महिलाओं के लिए ज्यादा उद्योगों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में काम करने पर लगी पाबंदियों को हटाया गया है.

असम, ओडिशा, तेलंगाना और त्रिपुरा ने मान्यता प्राप्त थर्ड पार्टी के जरिए फायर सेफ्टी नियमों को सरल बनाया है.

आर्थिक सर्वे में कहा गया, “यह दिखाता है कि अनुपालन में कमी का एजेंडा राज्यों को डी-रेगुलेशन को एक सतत शासन प्रक्रिया के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है, न कि केवल एक चेकलिस्ट अभ्यास के तौर पर.”

केंद्र सरकार ने पिछले साल जनवरी में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में नियमों को सरल बनाने और प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए अनुपालन में कमी और डी-रेगुलेशन पर टास्क फोर्स का गठन किया था.

इस महीने टी. वी. सोमनाथन के नेतृत्व वाली टास्क फोर्स ने डी-रेगुलेशन अभ्यास के दूसरे चरण की शुरुआत 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में की है. इसमें भूमि, भवन और निर्माण, यूटिलिटीज और अनुमतियां, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, श्रम और व्यापक सुधार जैसे अतिरिक्त प्राथमिक क्षेत्रों को शामिल किया गया है.

पहले चरण में क्या हुआ

जनवरी 2025 में शुरू किए गए पहले चरण में केंद्र ने 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पांच व्यापक क्षेत्रों के तहत 23 प्राथमिक क्षेत्रों की पहचान की थी. इनका उद्देश्य वैध सुरक्षा उपायों से समझौता किए बिना प्रक्रियागत जटिलता को कम करना था.

इन क्षेत्रों में भूमि उपयोग, भवन और निर्माण, श्रम, यूटिलिटीज और अनुमतियां, और कुछ व्यापक प्राथमिकताएं शामिल थीं. टास्क फोर्स ने इन 23 प्राथमिक क्षेत्रों में कुल 828 लागू किए जा सकने वाले सुधारों की पहचान की थी.

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, 23 जनवरी तक इनमें से 630 सुधार, यानी कुल का 76 प्रतिशत, लागू किए जा चुके हैं. इसके अलावा 79 सुधार, यानी 10 प्रतिशत, सक्रिय रूप से लागू किए जा रहे हैं.

प्राथमिक क्षेत्रों की पहचान केंद्र सरकार के मंत्रालयों, राज्यों, उद्योग संगठनों और ज्ञान साझेदारों के साथ व्यापक परामर्श के जरिए की गई थी.

इस पहल का मकसद गैर-जरूरी, एक-दूसरे से टकराने वाले या पुराने अनुपालनों की पहचान कर उन्हें तर्कसंगत बनाना था. साथ ही राज्यों को कानूनों, अधीनस्थ नियमों और प्रक्रियाओं में संशोधन के लिए मार्गदर्शन देना था, ताकि न्यूनतम नियमन के सिद्धांतों के अनुरूप बदलाव हो सकें. इसके अलावा एकरूपता और पूर्वानुमेयता बढ़ाने के लिए मानकीकृत सुधार ढांचे अपनाने को बढ़ावा देना, जोखिम आधारित अनुपालन ढांचे और निरीक्षण में थर्ड पार्टी की भूमिका को प्रोत्साहित करना, खासकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए, भी इस पहल का हिस्सा था.

आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया कि अनुपालन में कमी और डी-रेगुलेशन पहल के नतीजे साफ दिख रहे हैं. इनमें कम अनुपालन बोझ, तेज मंजूरियां, डिजिटल प्रक्रियाओं पर ज्यादा निर्भरता और कारोबार के लिए बेहतर पूर्वानुमेयता शामिल है.

सर्वेक्षण में कहा गया, “सबसे अहम बात यह है कि यह पहल दिखाती है कि जब डी-रेगुलेशन को एक बार की कवायद की बजाय सतत शासन प्रक्रिया के रूप में अपनाया जाता है, तो यह राज्यों की क्षमता को मजबूत करता है. कंपनियों और राज्य के बीच संपर्क बिंदु पर घर्षण कम होने से प्रशासनिक ऊर्जा नियमित निगरानी से हटकर समन्वय, निगरानी और समस्या समाधान की ओर केंद्रित हो जाती है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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