कोच्चि, 16 जनवरी (भाषा) केरल उच्च न्यायालय ने हत्या के एक मामले में 14 साल जेल में बिता चुके व्यक्ति की दोषसिद्धि और उसे सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया। न्यायालय ने कहा कि उसे निष्पक्ष सुनवाई से वंचित किया गया था।
न्यायमूर्ति राजा विजयराघवन और न्यायमूर्ति के. वी. जयकुमार की पीठ ने पाया कि आरोपी को लंबे समय तक हिरासत में रखा गया और उसे ऐसे मुकदमे का सामना करना पड़ा, जो ‘‘टुकड़ों-टुकडों’’ में चलाया गया था।
पीठ ने सत्र अदालत की न्यायाधीश द्वारा मुकदमे के संचालन में हुई खामियों को उजागर करते हुए कहा कि मुकदमे की एक महत्वपूर्ण अवधि के दौरान आरोपी का प्रतिनिधित्व किसी सक्षम वकील ने नहीं किया था, उसे अहम गवाहों से जिरह स्वयं करनी पड़ी और कई गवाहों से उसकी गैरमौजूदगी में पूछताछ की गई।
इसके अलावा, रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि सत्र न्यायाधीश ने लोक अभियोजक की अनुपस्थिति में स्वयं ही लोक अभियोजक की भूमिका निभाई और मुख्य जिरह खुद की।
उच्च न्यायालय ने 12 जनवरी के अपने फैसले में कहा कि सत्र न्यायाधीश का दृष्टिकोण ‘अवैध और अनुचित’ था क्योंकि अभियोजन पक्ष के गवाहों से अभियुक्तों की अनुपस्थिति में पूछताछ की गई थी।
मामले को जुलाई 2012 में सत्र न्यायालय में भेजा गया था और आरोपी को अक्टूबर 2019 में दोषी ठहराया गया और सजा सुनाई गई। पीठ ने कहा कि वह पूरी अवधि के दौरान न्यायिक हिरासत में था।
उच्च न्यायालय ने कहा कि सात साल की सुनवाई अवधि के दौरान, आरोप तय होने के बाद मामले को ‘‘सौ से अधिक बार स्थगित किया गया’’। उसने सत्र न्यायाधीश द्वारा इसके लिए दिए गए कारणों को ‘अनुचित और बाध्यकारी नहीं’ करार दिया।
हत्या के आरोप में दोषी पाए जाने के बाद आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी और 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 18 सितंबर 2011 को ओणम उत्सव के दौरान कोट्टायम जिले के पम्पाडी के पास ताश खेल रहे दो समूहों के बीच कहासुनी हो गई। अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि कहासुनी के दौरान आरोपी ने पीड़ित को चाकू मार दिया, जिसकी बाद में चोटों के कारण मौत हो गई थी।
भाषा शोभना वैभव
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