बेंगलुरु: कर्नाटक के गुंडलुपेट में गुरुवार को वन अधिकारियों ने एक मादा बाघ को पकड़ लिया. इसी दौरान बंडीपुर और बीलिगिरि रंगनाथ स्वामी मंदिर (बीआरटी) रेंज के अन्य इलाकों में भी अभियान चल रहे थे, ताकि जंगल से सटे गांवों के आसपास दिखे अन्य बाघों को पकड़ा जा सके.
कर्नाटक सरकार के अनुसार, चामराजनगर के नंजनदेवपुरा गांव के आसपास जो बेंगलुरु से करीब 184 किलोमीटर दूर है, एक मादा बाघ और उसके चार शावक देखे गए.
दक्षिणी कर्नाटक के अन्य हिस्सों से ऐसी कई खबरें आने के बाद, बुधवार को वन मंत्री ईश्वर खंड्रे ने आपात बैठकें कीं, जिसके बाद बाघों को पकड़ने के अभियान और तेज़ कर दिए गए. इनमें मैसूरु ज़िले के नेगथूर में किसान और उसके मवेशियों पर बाघ के हालिया हमले का मामला भी शामिल है.
पिछले महीने, बंडीपुर टाइगर रिज़र्व के मोलेयूरु रेंज, हेडियाला उप-डिवीजन में एक किसान की मौत के बाद बंडीपुर और नागरहोल टाइगर रिज़र्व में सफारी रोक दी गई थी.
बंडीपुर टाइगर रिज़र्व के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “इन बाघों के गांवों की ओर भटकने के कई कारण हैं, जिनमें मादा बाघों का अपने छोटे शावकों को तेंदुओं, जंगली कुत्तों और दूसरे बाघों जैसे शिकारियों से बचाने के लिए जगह बदलना भी शामिल है.”
अधिकारियों और वन्यजीव विशेषज्ञों ने बताया कि सर्दियों के महीने प्रजनन का चरम समय होते हैं और नर बाघ अक्सर उन शावकों को मार देते हैं, जो उनके नहीं होते, ताकि मादा फिर से प्रजनन के लिए तैयार हो जाए.
उन्होंने यह भी कहा कि धारीदार बिल्लियों यानी बाघों की बढ़ती संख्या, अतिक्रमण के कारण आवास का नुकसान और भारी मशीनों व दूसरे उपकरणों से उनके प्राकृतिक माहौल में पड़ने वाली गड़बड़ी भी ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से बाघ खाना और ठिकाना ढूंढने के लिए जंगल से बाहर निकलने लगते हैं.
वन्यजीवों का इंसानी बस्तियों में आना या इंसानों का जंगलों की ओर बढ़ना, दोनों ही स्थितियों ने कर्नाटक में इंसान-जानवर टकराव (एचएसी) के मामलों को बढ़ाया है, जिससे लोगों और वन्यजीवों दोनों की जान जा रही है.
नेशनल टाइगर कंज़र्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले एक साल में कर्नाटक में 14 बाघ मारे गए हैं. 2025 में औसतन हर महीने एक से ज़्यादा बाघ की मौत हुई है, जो राज्य में बढ़ते इंसान-जानवर टकराव की ओर इशारा करता है.
एनटीसीए के अनुसार, आखिरी मौत कोडागु ज़िले में दर्ज की गई, जहां पिछले हफ्ते एक बाघ फंदे में फंसने से मर गया.
इसी तरह, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कर्नाटक में 2025 में ही (30 नवंबर तक) 34 लोगों की मौत दर्ज की गई है. 2022 से 2025 की अवधि में यह संख्या कुल 203 तक पहुंच चुकी है.
बिना नियंत्रण का विकास
कर्नाटक सरकार के अनुमान बताते हैं कि भारत में कुल 27,312 हाथियों में से सबसे ज़्यादा हिस्सेदारी कर्नाटक की है—22.14 प्रतिशत, यानी संख्या में 6,395 हाथी.
कर्नाटक बाघों की आबादी में दूसरे नंबर पर है. पूरे भारत में मौजूद 3,682 बाघों में से 15.30 प्रतिशत, यानी 563 बाघ कर्नाटक में हैं. इसी तरह, तेंदुओं की हिस्सेदारी में यह तीसरे स्थान पर है, देश में कुल 13,874 तेंदुओं में से 13.54 प्रतिशत, यानी 1,879 तेंदुए कर्नाटक में हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि वन्यजीवों की बढ़ती संख्या और इंसानी बस्तियों का फैलाव, जो जंगलों में घुसपैठ कर रहा है, दोनों बढ़े हैं. इसका नतीजा इंसान-जानवर टकराव (एचएसी) के मामलों में बढ़ोतरी के रूप में सामने आया है.
हाल ही में खत्म हुए शीतकालीन सत्र में विधानसभा को दिए जवाब में खंड्रे ने कहा कि 2.21 लाख एकड़ से ज़्यादा वन भूमि से अतिक्रमण हटाना बाकी है.
वन्यजीव कार्यकर्ता जोसेफ हूवर, जो कर्नाटक राज्य वन्यजीव बोर्ड के पूर्व सदस्य रह चुके हैं, उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “प्राइवेट रैंच, रिसॉर्ट और होमस्टे के बेतहाशा निर्माण के कारण सभी वन्यजीव गलियारे नष्ट हो चुके हैं, जहां से पहले जानवर आवाजाही करते थे.”
उन्होंने आगे कहा कि तेज़ और बिना नियंत्रण वाला विकास और घास के मैदानों का बढ़ना, मादा बाघों के लिए अपने शावकों को दूसरे शिकारियों से सुरक्षित रखने वाले प्राकृतिक ठिकानों को खत्म कर रहा है.
उन्होंने समझाया, “बाघों की संख्या बढ़ने के साथ, मां बाघ छोटे शावकों को घूमते-फिरते बाघों से बचाने की कोशिश करती हैं. यह प्रजनन का मौसम है और काफी आवाजाही होती है. मां अपने शावकों को सुरक्षित रखने के लिए जंगल के किनारों की ओर चली जाती हैं.”
इससे इंसान-जानवर टकराव की संभावना बढ़ जाती है. बाघ भोजन के लिए मवेशियों पर हमला करते हैं और इसमें इंसानों की मौत भी होती है. कई बार गांव वाले खुद ही मामला अपने हाथ में ले लेते हैं और कभी-कभी वन्यजीवों को मारने के लिए फंदे या जाल लगा देते हैं.
2021 में, मडिकेरी से तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विधायक अप्पाचु रंजन ने विधानसभा में कहा था कि या तो वन विभाग को आदमखोर जानवर को मार देना चाहिए या फिर उन्हें खुद ऐसा करने की अनुमति दी जाए. एक अन्य भाजपा विधायक के.जी. बोपैया ने भी इंसानों की मौत के बढ़ते मामलों पर खुलकर चिंता जताई थी.
खंड्रे ने हाल ही में बेलगावी में हुए शीतकालीन सत्र में विधानसभा को बताया कि 2022-23 में एचएसी से 58 लोगों की मौत हुई, 2023-24 में 65, 2024-25 में 46 और मौजूदा कैलेंडर वर्ष में (30 नवंबर तक) 34 मौतें दर्ज की गई हैं.
2022 से 2025 (30 नवंबर तक) के बीच कोडागु में 32, चामराजनगर में 40, हासन में 19, मैसूरु में 25, रामनगर में 15 और चिकमगलूर में 18 मौतें दर्ज की गईं, जो कुल मौतों का बड़ा हिस्सा हैं.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2011-12 से 2025-26 (नवंबर तक) के बीच कुल 709 लोगों की मौत हुई. इनमें 479 मामलों में हाथी, 39 में बाघ, 41 में तेंदुए, 32 में मगरमच्छ, 34 में जंगली सूअर, 40 में भालू और 20 मामलों में गौर (भारतीय बाइसन) जिम्मेदार थे, जबकि बाकी अन्य जानवरों से जुड़े थे.
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