Tuesday, 5 July, 2022
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कंगना रनौत: पांच साल में ‘अर्बन नक्सल’ से ‘माचो राष्ट्रवादी’ बनने तक का सफर

2014 में फिल्म क्वीन और 2015 में तनु वेड्स मनु रिटर्न्स के रिलीज होते वक्त कंगना रनौत औरतों की चैंपियन बन गई थीं और उनके बयानों ने परंपरागत राष्ट्रवादियों की नींद उड़ा दी थी.

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नई दिल्ली: कंगना रनौत की फिल्म ‘मणिकर्णिका’ का ट्रेलर ना सिर्फ जनता में जोश जगा रहा है, बल्कि दक्षिणपंथी राजनीतिक चेहरों पर चमक भी ला रहा है और फिल्म में ‘एक ब्रिटिश अफसर से रानी लक्ष्मीबाई के कथित अफेयर’ की उड़ी खबर की वजह से करणी सेना को एक बार फिर आंदोलन करने का मौका दे रहा है. इसी क्रम में हमें कंगना के माध्यम से ये भी पता चला कि वो भी राजपूत हैं और फिल्म का बेतुका विरोध करने वालों की ईंट से ईंट बजा सकती हैं. अपने बयानों की वजह से कंगना एक तेज-तर्रार फेमिनिस्ट के रूप में स्थापित हुई थीं. और अब राष्ट्रवाद की तरफ उनके बढ़ते कदमों ने उन्हें एक पॉपुलर नेशनलिस्ट के रूप में स्थापित करना शुरू किया है. ये कदम अब रुकनेवाले नहीं हैं. पर हमेशा ऐसा नहीं था. एक वक्त कंगना वो बातें बोलती थीं जो उनको ‘अर्बन नक्सल’ बना सकता था.

2014 में फिल्म क्वीन और 2015 में ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ के रिलीज होते वक्त कंगना रनौत औरतों की चैंपियन बन गई थीं और उनके बयानों ने परंपरागत राष्ट्रवादियों की नींद उड़ा दी थी. फिल्मों के नामों को देश की बेइज्जती समझनेवाले लोग कंगना के बयानों पर रिएक्ट ही नहीं कर पा रहे थे.

लंदन समिट 2015 के ‘वीमेन इन द वर्ल्ड’ में कंगना ने भारत देश में महिलाओं की स्थिति पर कमेंट करते हुए कहा था, ‘ भारत में एक लड़की को आर्थिक जिम्मेदारी समझा जाता है. एक लड़की से अपेक्षित है कि बड़ी होकर आप ऐसी जवान युवती बनें जिसे एक प्रतिष्ठित वर मिल सके.’

साक्षात्कारकर्ता के महिलाओं को ऑब्जेक्टिफाई यानी उन्हें वस्तु की तरह समझने जाने वाले सवाल पर कंगना ने कहा था कि हो सकता है मेरे जवाब के लिए मुझे भारत में कोसा जाए लेकिन मैं सच्चाई बताऊंगी उनका जवाब हां था, लेकिन साथ ही यह जोड़ा कि सब नहीं करते. ये सवाल बॉलीवुड के परिप्रेक्ष्य में पूछा गया था.

इस पूरे इंटरव्यू के दौरान कंगना ने अपनी महिला होने की ‘आइडेंटिटी’ पर काफी कुछ बोला. उन्होंने इंटरनेशनल मीडिया को बताया कि दिल्ली गैंग रेप के बाद भी चीज़ों में खास बदलाव नहीं आया है. लड़कियों का ‘लड़की’ होना अभी भी सेलिब्रेट नहीं किया जाता है. अपने बचपन के एक्सपीरियंस बताए कि कैसे उन्हें एक ‘लड़की’ की तरह पाले जाने से कोफ़्त होती थी और वे डिनर टेबल होने वाली राजनीतिक चर्चाओं का हिस्सा बनना चाहती थीं.

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उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्र के तौर पर हम विकसित नहीं हो पाए हैं. हमें और काम करने की ज़रूरत है.

यह वही समय भी था उन्हें अपनी फिल्म क्वीन के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला. ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ फिल्म में निभाए किरदार ने और फिल्मफेयर अवॉर्ड्स ने उन्हें भारतीय जनमानस के बीच ‘नारीवाद’ का उभरता और उग्र चेहरा बन दिया. ये चेहरा हर उस व्यक्ति की क्लास लगाता था जो उनकी ‘महिला’ होने की आइडेंटिटी को कमतर समझता. धीरे-धीरे उनके घर से भागने और अकेले ही मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में पैर जमाने के संघर्ष की कहानियों ने उनको बाकी अभिनेत्रियों से अलग कर दिया.

ऐसा लगने लगा कि कंगना की हर फिल्म की महिला चरित्र उनके निजी जीवन से ही निकलकर आने लगी है. ये भी आभास हुआ कि कंगना फिल्म को फिल्म तक ही नहीं रहने देना चाहतीं बल्कि नारीवाद की उग्र मशाल भी बनाना चाहती हैं.

साल 2017 में उनकी फिल्म सिमरन (महिला नायक) आई. अब तक कंगना ने अपनी ‘महिला’ आइडेंटिटी को उग्रता के साथ स्थापित कर लिया था. वह हर फिल्म के प्रमोशन के दौरान दुर्गा मां की तरह अवतार बदलती गईं. ‘तनु वेड्स मनु’ में खुद को तनु की तरह बताया तो सिमरन फिल्म में सिमरन की तरह. उन्होंने यहां तक घोषणा की कि उन्हें भी वे सारी बीमारियां हैं जो कथित तौर पर फिल्म में उनके किरदारों को हैं. फिर कंगना ने पुरुषों से लेकर राजनीति, गांव-शहर से लेकर युवाओं से जुड़े हर मुद्दे पर बोला और खूब बोला. इतनी कि आसानी से उन्हें प्रचलित ‘अर्बन नक्सल’ कहा जा सकता था.

फिर वो वक्त आया जब लगा ‘बॉर्डर’ की रीमेक में कंगना को सन्नी देयोल का रोल दिया जाए

लेकिन जब से 2017 के बाद उनकी फिल्म ‘मणिकर्णिका’ चर्चा में आने लगी तब से उन्होंने अपनी ‘महिला आइडेंटिटी’ को ‘नेशनलिस्ट आइडेंटिटी’ में तब्दील करना शुरू कर दिया. इसी दौरान वो ऋतिक रोशन के साथ हुए विवाद में भी उलझी रहीं. देश के एक बड़े पुरुषवादी वर्ग ने कंगना को वैम्प साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. हालांकि ये कभी पता नहीं चल पाया कि आखिर हुआ क्या था.

इस दौरान एक रोचक घटना घटी. ‘मणिकर्णिका’ फिल्म की घोषणा के बाद कंगना नये अवतार में नजर आने लगीं. वो औरतों की बातों की जगह देश की बातें करने लगीं. जो तथाकथित ‘देशभक्तों का समूह’ ऋतिक-कंगना विवाद पर कंगना को ट्रोल करने पर लगा हुआ था, वही धड़ा अब कंगना के पाले में हो गया.

‘मणिकर्णिका’ के प्रमोशन के दौरान कंगना ने इंडियन एक्सप्रेस की एक महिला पत्रकार को धमकाने के लहजे में भारतीय लोकतंत्र और संविधान की क्लास लगाई. जो कंगना बार-बार अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर डेमोक्रेसी की आड़ लेती रही हैं, वही कंगना अब असहिष्णु होती नज़र आ रही हैं.

पिछले साल न्यूज़ 18 के राइजिंग इंडिया समिट में उन्होंने दो बातें जाहिर की थीं-

– मौका मिला तो राजनीति में आएंगी बशर्ते उन्हें ग्लैमरस रहने दिया जाए.

– वो किस विचारधारा से जुड़ेंगी ये बात भी इस दौरान साफ हो गई थी, जब उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान में इतनी बुराइयां हैं तो दूसरे देश क्यों नहीं चले जाते.

कारण जौहर के साथ हुई नेपोटिज्म की बहस पर कंगना ने मीडिया से कहा था कि इंडस्ट्री में हर मुद्दे पर बात होनी चाहिए. हम एक डेमोक्रेटिक देश में रहते हैं, मैं क्या महसूस करती हूं वो जाहिर कर देती हूं. आप सहमत हों या न हों. खुद को एक्सप्रेस करना मेरा फंडामेंटल राइट है.

लेकिन यही ‘फंडामेंटल राइट’ वो वर्तमान राजनैतिक माहौल में भूलती नज़र आ रही हैं जब कहती हैं कि देशभक्ति के नाम पर आपकी छाती गर्व से क्यों नहीं फूलती? देश से प्यार करते हैं जताना तो पड़ेगा ही न.

सदगुरु, कंगना और मॉब लिंचिंग

पिछले साल सदगुरू के साथ एक इंटरव्यू के बाद कंगना ने पत्रकारों को बताया कि जो सवाल उन्होंने पूछे वाे सारे सवाल उनके खुद के थे. क्योंकि वह खुद ऐसे सवालों के बारे में सोचती रहती हैं. जब पत्रकारों ने सवाल पूछा तो कंगना ने किसी राजनेता की तरह जवाब दिया कि राजनीति आपके लिए करियर नहीं होना चाहिए. उसके लिए पहले वैराग्य होना चाहिए. देश सेवा के लिए परिवार में नहीं रह सकते.

कठुआ रेप केस पर बात करते हुए कंगना ने कहा कि लिबरल ये क्यों कह रहे हैं कि हिंदुस्तान ने रेप कर दिया. हालांकि किसी ने भी ऐसा नहीं कहा था. कुछ लोगों ने फोटो शेयर की थी जिसमें लिखा था कि मैं हिंदुस्तान हूँ और मैं शर्मिंदा हूँ. क्योंकि रेप के आरोपियों को बचाने के लिए जम्मू-कश्मीर में तिरंगे के बैनर के नीचे रैली निकाली गई थी.

गाय और मॉब लिंचिंग पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि मैं गांव से आती हूँ और मेरे यहां भी गाय की पूजा होती है. इस पूरे एपिसोड में लिचिंग को किसी न किसी तरह डिफेंड किया गया. कहा गया कि शहरी लोग ग्रामीण लोगों के लॉ एंड ऑर्डर से परिचित नहीं हैं. जब उनके पेड़ काटे जाते हैं या उनके बच्चे चोरी किए जाते हैं तो वे पुलिस को बुलाने का इंतज़ार नहीं करते बल्कि खुद न्याय करते हैं. ऐसे ही गाय का केस है. लिबरल लोगों को समझ नहीं आएगा.

फिर कंगना ने एक बार फिर पलटी मारी. नेपोटिज़्म पर देशभर में डीबेट शुरू करने वाली कंगना ने बाद में कहा करण जोहर को हम नहीं कह सकते कि वे कैसे काम करें. जो तरीका उनके लिए काम करता है वो करें क्योंकि हम एक डेमोक्रेसी में रहते हैं.

इसके साथ ही उन्होंने ये भी कह दिया कि आजकल देश की बुरी बातों के बारे में बात करना कूल बन गया है. आजकल का यूथ शिकायतें करता रहता है कि यहां ये हो रहा है, वो हो रहा है. अरे वहां जाओ जहां अच्छा है. यहां क्या कर रहे हो.

एक सशक्त महिला बनते ही कंगना का ‘माचो देश प्रेम’ जाग गया

जब 2014-2015 में कंगना अपनी स्थिति मजबूत कर रही थीं तब वो एक ‘असुरक्षित’ महिला की आइडेंटिटी’ से आगे बढ़ रही थीं. इसलिए 2015 में उनकी लड़ाई खुद की पहचान की थी. लेकिन 2019 में वे एक ताकतवर महिला की इमेज के साथ उभरी हैं. लेकिन अब वो खुद को राष्ट्र की पहचान से जुड़ा हुआ पाती हैं. लेकिन इस सफर में कंगना भूल जाती हैं कि अभी भी इस देश में महिलाएं उतनी ही असुरक्षित हैं जितनी कभी कंगना हुआ करती थीं.

पर यहां कंगना एक बात भूल जाती हैं. फेमिनिज्म और पॉपुलर नेशनलिज्म एक साथ नहीं चलता. जो पॉपुलर नेशनलिज्म है, वो सिर्फ माचो मैन की इमेज गढ़ता है. बंदूक लेकर बॉर्डर पर लड़ते सैनिक की इमेज बनाता है. इस नेशनलिज्म में शांति कहीं नजर नहीं आती. नेशनलिज्म के लिए एक दुश्मन का होना जरूरी है. इसमें ये कल्पना नहीं की जा सकती कि सारे लोग शांति से रह रहे हैं और प्रगति कर रहे हैं.

इस पॉपुलर नेशनलिज्म की आड़ में बाकी सारे मुद्दे गौण कर दिये जाते हैं. उदाहरण के तौर पर ब्रिटेन में औरतें पचास साल से अपने हक की लड़ाई लड़ रही थीं पर प्रथम विश्व युद्ध होते ही उस लड़ाई को भुला दिया गया. उसका अस्तित्व ही नहीं रहा. ठीक ऐसे ही भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महिलाओं की स्थिति सुधारने के प्रयास किये गये पर निर्णायक क्षणों में ये मुद्दा गौण ही रह गया. यही हाल ईस्ट यूरोप के देशों में भी रहा. यही हाल इस्लामिक देशों में भी है. हमेशा ‘देश से जुड़ा मुद्दा’ औरतों के मुद्दे को गौण बना देता है.

यही हमारे देश में भी हो रहा है. हर योजना में ये भुला दिया जाता है कि औरतें देश की आधी आबादी हैं. अगर उनका विकास नहीं हुआ तो देश आगे बढ़ ही नहीं सकता, चाहे आप कोई भी योजना क्यों ना बना लें.

राष्ट्रवाद यहीं पर औरतों के लिए दोषी साबित होता है. राष्ट्रवादी पार्टी भाजपा की मुगलसराय से विधायक साधना सिंह उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को औरत ही नहीं समझतीं, उनकी नजर में वो ‘किन्नर से भी बदतर’ हैं.

गौरतलब है कि राष्ट्रवाद से प्रेरित लोग ‘शुचिता’ की बात करते हैं और यही लोग कंगना के उन विचारों से सहमत नहीं होंगे जिनमें वो कभी कहा करती थीं कि औरतों को किसी के साथ भी सोने का हक है. उन्होंने अपने अफेयर्स पर खुल के बोला है और एक इंटरव्यू में तो मैरिड मेन के प्रति अपनी पसंद खुल के भी जाहिर की थी.

जाते-जाते: राष्ट्रवाद के आगे अंधविश्वास?

‘मणिकर्णिका’ के प्रमोशन के दौरान कंगना ने ये भी कहा कि फिल्म की शूट के पहले दिन कंगना तलवार से घायल हो गई थीं और उनको लगा कि कोई देवी खून चाहती हैं. गौरतलब है कि अध्ययन सुमन ने एक बार कंगना पर काला जादू करने और तंत्र मंत्र करने के आरोप लगाये थे. अध्ययन की बातें बचकानी और बेवकूफाना थीं. यकीन ही नहीं हुआ कि कोई एक सशक्त और आधुनिक महिला पर इस तरह के अंधविश्वास के आरोप लगा सकता है.

(लेखिका एक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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