नई दिल्ली: रोहिणी कोर्ट ने महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट (MCOCA) के एक मामले में आरोपी संदीप उर्फ काला जठेड़ी को डिफॉल्ट बेल देने से इनकार कर दिया. काला जठेड़ी ने तय समय सीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल न होने का हवाला देते हुए डिफॉल्ट बेल की मांग की थी.
जठेड़ी ने यह भी दावा किया था कि जब उसने जमानत याचिका दायर की, उस समय न तो चार्जशीट दाखिल की गई थी और न ही जांच की अवधि बढ़ाई गई थी.
कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया कि जांच अवधि बढ़ाने की अर्जी किसी सक्षम जज के सामने दायर नहीं की गई थी.
यह मामला 2024 में अमन विहार थाने में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है.
स्पेशल जज (MCOCA) मुनीश गर्ग ने गुरुवार को संदीप उर्फ काला जठेड़ी की जमानत याचिका खारिज कर दी.
जमानत याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा, “चूंकि आगे जांच अवधि बढ़ाने की अर्जी आरोपी द्वारा डिफॉल्ट बेल की अर्जी दायर करने से पहले ही अभियोजन पक्ष द्वारा दाखिल कर दी गई थी, इसलिए आरोपी को डिफॉल्ट बेल का अधिकार नहीं मिलता.”
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “उपरोक्त चर्चा के आधार पर आरोपी की ओर से दायर डिफॉल्ट बेल की अर्जी में कोई दम नहीं है. इसलिए इसे खारिज किया जाता है.”
एडवोकेट रोहित कुमार दलाल ने डिफॉल्ट बेल की अर्जी दाखिल करते हुए कहा था कि MCOCA के तहत तय समय सीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं की गई. जांच अवधि बढ़ाने की अर्जी ड्यूटी ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने दायर की गई थी.
कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि अभियोजक के पास ड्यूटी मजिस्ट्रेट के सामने अर्जी देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था और चार्जशीट दाखिल करने की तय समय सीमा खत्म होने से पहले ही अर्जी दायर कर दी गई थी.
कोर्ट ने यह भी कहा, “ऐसा नहीं है कि अभियोजक ने अपने अधिकारों का उपयोग नहीं किया या समय सीमा खत्म होने के बाद अर्जी दायर की या गलती से मजिस्ट्रेट के सामने अर्जी लगाई.”
कोर्ट ने कहा कि अचानक छुट्टियां घोषित होने की वजह से मजबूरी में अभियोजक ने जिले में उपलब्ध ड्यूटी मजिस्ट्रेट के सामने समय पर अर्जी दायर की. ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने जांच अवधि नहीं बढ़ाई, बल्कि सिर्फ अर्जी पर आरोपियों को नोटिस जारी किया था.
कोर्ट ने कहा, “ऐसी स्थिति में और डि-फैक्टो सिद्धांत को देखते हुए, जो आवश्यकता और सार्वजनिक नीति का सिद्धांत है, अभियोजक द्वारा ड्यूटी मजिस्ट्रेट के सामने दायर अर्जी को अस्तित्वहीन नहीं माना जा सकता.”
संदीप उर्फ काला जठेड़ी ने यह कहते हुए डिफॉल्ट बेल मांगी थी कि 2 मार्च 2026 को MCOC एक्ट की धारा 21(2)(b) के तहत 121 दिन से बढ़ाकर 180 दिन करने की अर्जी स्पेशल पब्लिक प्रॉसीक्यूटर अखंड प्रताप सिंह द्वारा मजिस्ट्रेट के सामने दायर की गई थी, जबकि मजिस्ट्रेट के पास इस मामले में सुनवाई करने का अधिकार नहीं था.
एडवोकेट रोहित दलाल ने दलील दी कि मजिस्ट्रेट ने केवल अर्जी को 6 मार्च 2026 को इस कोर्ट के सामने पेश करने का निर्देश दिया था. उन्होंने कहा कि 5 मार्च 2026 को, जब जांच और हिरासत की पहले बढ़ाई गई अवधि खत्म हुई, तब स्पेशल कोर्ट द्वारा समय बढ़ाने का कोई वैध आदेश नहीं था और न ही इस कोर्ट के सामने कोई सक्षम अर्जी लंबित थी.
वकील ने कहा, “मौजूद एकमात्र अर्जी ऐसे कोर्ट में दायर की गई थी जिसके पास अधिकार क्षेत्र नहीं था, इसलिए इसे कानून के तहत लंबित अर्जी नहीं माना जा सकता.”
यह भी कहा गया कि 5 मार्च 2026 की आधी रात तक स्पेशल कोर्ट द्वारा जांच और हिरासत की अवधि आगे नहीं बढ़ाई गई थी और इस मामले में आरोपी के खिलाफ चार्जशीट भी दाखिल नहीं की गई थी.
वहीं, स्पेशल पब्लिक प्रॉसीक्यूटर अखंड प्रताप सिंह ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि रिकॉर्ड के अनुसार यह अर्जी 6 मार्च 2026 को फाइलिंग काउंटर पर दायर की गई और उसी दिन कोर्ट में पेश हुई.
SPP ने 2 मार्च 2026 को जांच पूरी करने के लिए समय बढ़ाने की रिपोर्ट ड्यूटी मजिस्ट्रेट के सामने दायर की थी, जो 6 मार्च 2026 को कोर्ट में पेश हुई.
6 मार्च 2026 को स्पेशल जज छुट्टी पर थे, इसलिए मामले की सुनवाई 12 मार्च 2026 के लिए टाल दी गई.
कोर्ट ने कहा, “यह निर्विवाद तथ्य है कि आगे समय बढ़ाने की रिपोर्ट आरोपी की ओर से डिफॉल्ट बेल की अर्जी दायर करने से पहले ही SPP द्वारा दायर की जा चुकी थी.”
