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Sunday, 16 June, 2024
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क्या सरकार आपके ट्वीट को बिना बताए हटा सकती है? क्या है कर्नाटक HC में चल रहे मोदी सरकार vs ट्विटर विवाद

कर्नाटक हाई कोर्ट में चल रहे गतिरोध ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में जताई जा रही चिंताओं के बीच, सोशल मीडिया एकाउंट्स को ब्लॉक करने के आदेश जारी करते समय सरकार द्वारा अक्सर उद्धृत किये जाने वाले आईटी अधिनियम की धारा 69 ए के इर्दगिर्द बुनी गई दलीलों को एक बार फिर से जीवित कर दिया है.

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नई दिल्ली: कर्नाटक हाई कोर्ट में ट्विटर और केंद्र सरकार के बीच चल रहे गतिरोध ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम, 2000 की विवादास्पद धारा 69 ए के आसपास के इर्दगिर्द बुनी गई दलीलों को एक बार फिर से जीवित कर दिया है क्योंकि सोशल मीडिया एकाउंट्स को बंद करने के आदेश जारी करते समय सरकार द्वारा अक्सर इसी फ्रेमवर्क का हवाला दिया जाता है.

हालांकि, यह धारा सरकार को किसी भी ऑनलाइन जानकारी को ब्लॉक (अवरुद्ध) करने का अधिकार देती है, मगर सोमवार को ट्विटर ने यह दलील पेश की कि सरकार यूजर्स (उपयोगकर्ताओं) को सूचित किए बिना और उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना सामान्य रूप से एकाउंट्स को ब्लॉक करने आदेश जारी नहीं कर सकती है.

इससे पहले, इस साल जुलाई में, सोशल मीडिया जगत की इस दिग्गज कंपनी ने कहा था कि सरकार को अपने ब्लॉकिंग ऑर्डर्स (एकॉउंटस को अवरुद्ध किये जाने के आदेशों) को धारा 69A में निर्धारित आधारों के साथ संरेखित (अलाइन) करना चाहिए.

फ़िलहाल, कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति कृष्ण एस दीक्षित उस मुकदमे में ट्विटर और केंद्र सरकार दोनों की दलीलें सुन रहे हैं, जो इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (मिनिस्ट्री ऑफ़ एलोक्ट्रॉनिक्स एंड इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी- एमआईईटीवाई- मेति) द्वारा फरवरी 2021 और फरवरी 2022 के बीच 39 यूआरएल को ब्लॉक करने के लिए जारी किए गए आदेशों पर आधारित हैं.

सोमवार को इस मामले में हुई सबसे हालिया सुनवाई के दौरान, आईटी अधिनियम के ‘गोपनीयता’ वाले पहलू के बारे में बात करते हुए न्यायमूर्ति दीक्षित ने मौखिक रूप टिपण्णी कि हालांकि सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2009 की नियम संख्या 16 (आईटी अधिनियम की धारा 69 ए के संदर्भ में पढ़ने पर) ब्लॉकिंग ऑर्डर्स के लिए सख्त गोपनीयता के पालन की अनुमति देता है, मगर यह ‘सर्वव्यापी’ भी हो सकता है. विचाराधीन नियम में केवल यह कहा गया है कि ‘प्राप्त सभी अनुरोधों और शिकायतों और उन पर की गई कार्रवाई के संबंध में सख्त गोपनीयता बनाए रखी जाएगी’.

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ट्विटर की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक हरनहल्ली ने अदालत में कहा कि वास्तविक आदेश को देखे बिना यह पता लगाना मुश्किल है कि सरकार ने निष्पक्ष और उचित प्रक्रिया का पालन किया है या नहीं.

जिन विशेषज्ञों से दिप्रिंट ने बात की, उनका मानना है कि गोपनीयता बनाए रखने की समस्या का समाधान खोजने की दिशा में हो रही प्रगति काफी धीमी रही है और जब भी ऐसा आदेश पारित किया जाता है तो केंद्र सरकार की तरफ से पारदर्शिता (अपनाये जाने) की सख्त आवश्यकता होती है.

इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन – जो दिल्ली स्थित एक डिजिटल अधिकारों और स्वतंत्रता की वकालत करने वाला गैर – सरकारी संगठन है – के लिए मुकदमे लड़ने वाले एक वरिष्ठ वकील तन्मय सिंह ने कहा, ‘सरकार की ओर से पारदर्शिता की कमी और पूरी सेंसरशिप प्रक्रिया के बारे में अक्सर सवाल उठते रहे हैं. हालांकि हम पुर्णतया किसी समाधान पर नहीं पहुंचे हैं, मगर हमने कुछ प्रगति जरूर की है, कम-से-कम कानूनी दृष्टिकोण से, क्योंकि अदालतों ने अधिक पारदर्शिता की मांग की है.’

उन्होंने कहा, ‘मिसाल के तौर पर, दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र को निर्देश दिया था कि वह अपने ब्लॉकिंग ऑर्डर्स, जिन्हे वह गोपनीय रखना चाहते थे, पर अधिक विवरण साझा करे.’

इस बीच, सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि मेति एकमात्र ऐसा मंत्रालय नहीं है जो ऑनलाइन सामग्री के लिए ब्लॉकिंग ऑर्डर जारी कर रहा है. यहां तक कि सूचना और प्रसारण मंत्रालयने भी इस साल की शुरुआत में कुछ ऐसे यूट्यूब वीडियोज के लिए ब्लॉकिंग ऑर्डर जारी किए थे, जिनमें उसे ऐसी विषय वस्तु मिली थी जो राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनयिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती थीं.

सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सूत्रों ने कहा, ‘चूंकि फर्जी ख़बरें एक बड़ा खतरा बन चुकी है, इसलिए ऐसी विषय वस्तु का पता लगाने के लिए ठोस प्रयास करना आवश्यक है जो राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाल सकती है. खुफिया इकाइयां भी इस पर काम कर रही हैं, यूट्यूब जैसी सोशल मीडिया मध्यवर्ती संस्थाएं (इंटरमीडियरिज) आमतौर पर ब्लॉकिंग के लिए किए गए हमारे अनुरोधों और आदेशों का पालन करते हैं.’


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धारा 69ए के बारे में

आईटी अधिनियम की धारा 69 ए ‘किसी भी कंप्यूटर आधारित संसाधन के माध्यम से किसी भी जानकारी की सार्वजनिक पहुंच को अवरुद्ध करने’ हेतु सरकार की शक्ति को परिभाषित करती है.

यह अधिनियम कहता है कि ‘केंद्र सरकार’ के किसी भी अधिकारी को ब्लॉकिंग आर्डर जारी करने के लिए अधिकृत किया जा सकता है बशर्ते ‘यह भारत की संप्रभुता और अखंडता, भारत की रक्षा, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध या सार्वजनिक व्यवस्था को बनाये रखने के हित में है या उपरोक्त से संबंधित किसी भी संज्ञेय अपराध को किये जाने के लिए उकसाने को रोकने के लिए है.‘

सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2009 उस प्रक्रिया के बारे में बात करता है जिसके तहत ब्लॉकिंग ऑर्डर्स को पूरा किया जाना चाहिए. इन नियमों के अनुसार, यूजर्स और मध्यवर्ती संस्थाओं सहित सभी हितधारकों को सुनवाई का अधिकार है.

पिछले साल फरवरी में, धारा 69 ए उन यूजर्स के ट्वीट और एकाउंट्स को ब्लॉक करने के लिए लागू की गई थी, जिन्होंने कथित तौर पर किसानों के विरोध के बारे में पोस्ट किया था. साथ ही साथ विपक्षी पार्टी के सदस्यों के एकाउंट्स भी ब्लॉक किये गए थे. इस आदेश से करीब 250 एकाउंट्स प्रभावित हुए थे, लेकिन उन सभी को जल्द ही बहाल कर दिया गया था.

‘विदेशी इंटरनेट मध्यवर्ती संस्थाओं को भारत के कानूनों का पालन अवश्य करना चाहिए’

अतीत में ऐसे प्रभावित हितधारकों के बारे में भी खबरें आई हैं, जिन्होंने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के माध्यम से एकाउंट्स ब्लॉक किये जाने के आदेशों के पीछे के कारणों की तलाश करने की कोशिश की थी, लेकिन सरकार ने गोपनीयता नियम का हवाला दिया और कोई विवरण प्रकट नहीं किया.

इस सारी उलझन पर सरकार के प्रमुख दृष्टिकोणों में से एक को इस साल जुलाई में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर द्वारा स्पष्ट किया गया था. उस समय, उन्होंने ट्विटर पर कहा था कि इंटरनेट की विदेशी मध्यवर्ती संस्थाओं और प्लेटफार्मों को न्यायिक समीक्षा का अधिकार है, लेकिन उन सभी पर भारत के कानूनों और नियमों का पालन करने का दायित्व भी है.

इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन के तन्मय सिंह ने बताया कि इस समस्या को कई बार अदालतों में ले जाया गया है और सरकार को ब्लॉकिंग ऑर्डर के आसपास विश्वास और पारदर्शिता बनाने का निर्देश भी दिया गया है.‘

सिंह ने कहा, ‘देश भर के कई उच्च न्यायालयों में कई याचिकाएं विचाराधीन हैं जो विशेष रूप से आईटी अधिनियम की धारा 69A के तहत सेंसरशिप प्रावधानों से संबंधित हैं. श्रेया सिंघल मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने साफा तौर पर कहा था की नियम नं. 8 [आईटी नियम 2009] सरकार द्वारा सुने जाने के अधिकार की अनुमति देती है. इसलिए, अब हम जो उम्मीद करते हैं वह यह है कि अदालतें मंत्रालयों को यह याद दिलाने के अपने प्रयासों में तेजी लाएं कि वे भी कानूनों से बंधे हैं. ‘

उन्होंने यह भी कहा कि धारा 69ए से संबंधित मामलों में सरकार द्वारा उचित प्रक्रिया और सही निर्णय प्रमुख चिंताएं हैं.

सिंह ने कहा, ‘यह चिंता का विषय है कि केंद्र अपनी शक्ति का ठीक से प्रयोग नहीं कर रहा है, खासकर तब जब हमारे पास इस तरह के आदेश के लिए एक निर्धारित प्रक्रिया है. सही विभाग और सही मंत्रालय के सही अधिकारी को ही अनुरोधों की जांच करने और उनके निर्णय का उपयोग करने के लिए जिम्मेदार होना चाहिए.’

उन्होंने कहा,’हालांकि, हाल के दिनों में, हमने देखा है कि कैसे विभिन्न मंत्रालयों ने इस क्षेत्र में अपनी टांग अड़ाई है. हमारी वर्तमान प्रक्रिया के अनुसार, केवल मेति को ही ऐसे आदेश जारी करना चाहिए. इस बारे में सूचना और प्रसारण मंत्रालय की शक्तियों पर बॉम्बे और मद्रास उच्च न्यायालयों ने रोक लगा दी थी. सभी तरह की निष्पक्षता के हक़ में, यह ठीक है कि कोई संस्था या मंत्रालय किसी विषय वस्तु को ब्लॉक करने के लिए मेति से अनुरोध करता है, लेकिन मंत्रालय को अपनी शक्तियों का पूरी बुद्धिमत्ता से से उपयोग करना चाहिए.’

भारत में इंटरनेट की आजादी

यूएस-स्थित गैर-सरकारी संगठन ‘फ्रीडम हाउस’ द्वारा इंटरनेट की स्वतंत्रता पर बुधवार को जारी किये गए नवीनतम रिपोर्ट में पाया गया कि हालांकि भारत के इंटरनेट स्वतंत्रता स्कोर में दो अंकों का सुधार हुआ – 2022 में 51 से 2021 में 49 तक – मगर जहां तक इंटरनेट की बात आती है, यह देश अभी भी केवल ‘आंशिक रूप से ही आजाद’ है.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘चार साल की गिरावट के बाद, भारत में इंटरनेट की स्वतंत्रता में पिछले एक साल में मामूली सुधार हुआ है, क्योंकि देश के डिजिटल विभेद को पाटने के प्रयासों ने इंटरनेट तक लोगों की पहुंच का विस्तार किया है. हालांकि सरकार इंटरनेट सेवा बंद करना जारी रखी हुई है, मगर उसने उनकी आवृत्ति और तीव्रता में कमी की है.’

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कानूनी चुनौतियों – जैसे कि ट्विटर ने शुरू की है – के परिणामस्वरूप सरकार की इन व्यापक शक्तियों में से कुछ पर सीमाएं लगाई जा रही हैं. फिर भी, इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार ऑनलाइन विषय वस्तु को ब्लॉक करना जारी रखे हुए है, और भारतीय इंटरनेट यूजर्स सरकार के प्रति आलोचनात्मक पोस्ट के लिए गिरफ्तारी का जोखिम उठाते हैं.

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि ‘जनता के दबाव’ के तहत, सोशल मीडिया कंपनियों ने ‘ऑनलाइन अभियक्ति पर नियंत्रण बढ़ाने’ के भारत सरकार के प्रयासों को पीछे धकेल दिया है.

इसमें आगे कहा गया है. ‘सरकारी सेंसरशिप के अनुपालन के बारे में सिविल सोसाइटी (नागरिक समाज) की तरफ से व्यापक निंदा के बाद, ट्विटर ने, इस कंपनी के कर्मचारी को जून 2002 में आपराधिक आरोपों की धमकी के बाद अंतत: घुटने टेकने से पहले, फ्रीडम हाउस के पोस्ट सहित कई विषय वस्तु को प्रतिबंधित करने के सरकारी आदेशों का विरोध किया था. फिर जुलाई 2022 में ट्विटर एक मुकदमा दायर करते हुए इस मामले को न्यायपालिका में ले गयी, जो सेंसरशिप शक्तियों के सरकार के व्यापक दावे पर लगाम लगा सकता है.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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