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Saturday, 13 July, 2024
होमदेशईशर सिंह- वज़ीरिस्तान में वीरता दिखने के लिए विक्टोरिया क्रॉस प्राप्त करने वाले पहले सिख सैनिक

ईशर सिंह- वज़ीरिस्तान में वीरता दिखने के लिए विक्टोरिया क्रॉस प्राप्त करने वाले पहले सिख सैनिक

साल 1921 में हैदर काच में महसूद कबीलों से लड़ते हुए इस सिपाही के सीने में गोली लग गई थी, लेकिन इसके बाद भी उसने एक दूसरे सिपाही की राइफल ले ली और दुश्मन पर जवाबी हमला बोल दिया.

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वजीरिस्तान की ताकतवर पश्तो जनजातियों के खिलाफ ब्रिटिश साम्राज्य के साल भर चले सैन्य अभियान के दौरान, 10 अप्रैल 1921 को 28 पंजाबीज, जो ब्रिटिश भारतीय सेना के तहत एक पैदल सेना रेजिमेंट थी, के जवान ईशर सिंह उनकी छाती के पास एक बंदूक की गोली लगने से घायल हो गए थे. हैदर काच में महसूद कबीलों के दुश्मनों की गोलियों की बौछार से घिरे हुए, सिंह ने एक अन्य घायल सैनिक की राइफल संभाली और दुश्मन पर जवाबी हमला करना शुरू कर दिया.

वह एक घायल सैनिक की ड्रेसिंग (मरहम-पट्टी) कर रहे ब्रिटिश भारतीय सेना के चिकित्सा अधिकारियों की रक्षा के लिए एक ढाल की तरह खड़े भी हो गए थे.

अपनी बहादुरी के इस बेमिशाल प्रदर्शन के लिए ही नवंबर 1921 में किंग जॉर्ज पंचम ने ईशर सिंह को विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया, और वह इस प्रतिष्ठित ब्रिटिश सैन्य सम्मान को पाने वाले पहले सिख बने.

25 नवंबर 1921 को लंदन के गजेट (राजपत्र) में प्रकाशित प्रशस्ति पत्र (साइटेशन) में कहा गया है, ‘हिज मेजेस्टी द किंग को निम्नलिखित के लिए विक्टोरिया क्रॉस के पुरस्कार की स्वीकृति देकर प्रसन्नता हुई है: नंबर 1012 सिपाही ईशर सिंह, 28 पंजाबीज, भारतीय सेना, को 10 अप्रैल, 1921 को हैदर काच (वजीरिस्तान) के पास सबसे विशिष्ट बहादुरी और कर्तव्य के प्रति समर्पण के लिए.‘

लंदन स्थित नेशनल आर्मी मेमोरियल के अनुसार, विक्टोरिया क्रॉस वीरता के लिए ब्रिटेन का संयुक्त सर्वोच्च पुरस्कार है. इसकी बराबरी सिर्फ 1940 में शुरू किये गए जॉर्ज क्रॉस से की जा सकती है, जो दुश्मन की गैर मौजूदगी में किये गए विशिष्ट बहादुरी के कृत्य के लिए स्थापित की गई थी. साल 1856 में इसकी स्थापना के बाद से अब तक 1,300 से अधिक प्राप्तकर्ताओं को विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया जा चुका है

बाद में, ईशर सिंह को ‘ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश इंडिया (ओबीआई), फर्स्ट क्लास –  ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा स्थापित आर्डर ऑफ़ मेरिट –   से भी सम्मानित किया गया था. इस ओबीआई के साथ ‘सरदार बहादुर’ की उपाधि जुडी हुई थी. नेशनल आर्मी मेमोरियल के अनुसार, विक्टोरिया क्रॉस और ओबीआई दोनों को संयुक्त रूप से धारण करना सिंह के लिए एक अनूठा सम्मान था.

उपमहाद्वीप के जांबाज सैनिक

30 दिसंबर 1885 को पंजाब के आज के होशियारपुर जिले के नैनवान गांव में जन्मे, ईशर सिंह की कहानी उपमहाद्वीप के उन सैनिकों, विशेष रूप से पंजाब के सैनिकों, की उस वीरता और साहस का प्रतीक है जो उन्होंने ब्रिटिश भारतीय सेना के लिए, और फिर ग्रेट वार (प्रथम विश्व युद्ध) के दौरान मित्र राष्ट्रों की सेनाओं के अभियानों के दौरान, प्रदर्शित की थी.

प्रथम विश्व युद्ध में अपनी सेवाएं देने वाले पंजाब के लगभग 3,20,000 सैनिकों के अभिलेखों को यूनाइटेड किंगडम के शोधकर्ताओं द्वारा लाहौर के एक संग्रहालय में खोज निकाला गया था. नवंबर 2021 में हुई इन खोजों तक, उनके रिकॉर्ड और कहानियां काफी हद तक अज्ञात, भूला दी गईं और बिना किसी पहचान वाली ही थीं.

रवींद्र राठी, जो एक पत्रकार हैं, की किताब ‘ट्रू टू देयर सॉल्ट’ में यह दलील दी गई है कि ब्रिटिश साम्राज्य के लिए भारतीय सैनिकों का प्रभाव और महत्व ऐसा था कि वे इसके उत्थान और पतन दोनों के लिए जिम्मेदार थे.


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लुईस गन सेक्शन के नंबर 1

अप्रैल 1921 में वजीरिस्तान में एक सिपाही के रूप में काम करते हुए, ईशर सिंह लुईस गन सेक्शन के नंबर 1 थे, यानि कि मूल रूप से वह सैनिक जो एक लाइट मशीन गन – लुईस गन –  को दागने के लिए जिम्मेदार होता था. उनकी इकाई पर महसूद जनजाति द्वारा तब हमला किया गया था, जब वह एक रसद पहुंचाने वाली वाले काफिले (सप्लाई कॉन्वॉय) को सुरक्षा प्रदान कर रही थी.

ईशर सिंह को हैदर काच के पास हुई इस लड़ाई के शुरुआती दौर में ही बंदूक की गोली से जख्मी कर दिया गया था. उनके सीने में लगी गोली ने उन्हें लुईस गन के बगल में गिरा दिया था और फिर दुश्मन ने उसे जब्त कर लिया था.

उनके प्रशस्ति पत्र में कहा गया है कि इस हालात से वह न तो वे भयभीत हुए और न ही विचलित हुए, दो अन्य जवानों को बुलाकर, वह (ईशर सिंह) उठे, दुश्मन पर धावा बोल दिया, लुईस गन को फिर से हासिल किया, और हालांकि उनका काफी सारा खून बह रहा था, फिर भी वे बंदूक को दुबारा हरकत में लाये.’

जब उनके जमदार (जो उनके सुपरवाईजिंग ऑफिसर थे) वहां पहुंचे, तो उन्होंने उन्हें बेस पर लौटने और अपनी चोट का इलाज करवाने का आदेश दिया. इसके बजाय, ईशर सिंह ने मेडिकल यूनिट में जाकर उन्हें अन्य घायल सैनिकों के ठिकाने के बारे में जानकारी दी, ताकि उन सभी का इलाज किया जा सके. उन्होंने अपने खुद के दर्द को भुलाते हुए अन्य घायल जवानों की मदद के लिए पानी भी पहुंचाया.

उनके प्रशस्ति पत्र में कहा गया है, ‘उन्होंने इसी मकसद से नदी के किनारे जाने और वापस आने के लिए अनगिनत चक्कर लगाए. तीन घंटे से अधिक का समय बीत जाने के बाद ही आखिरकार उन्होंने वहां से खुद को वहां ले जाए जाने के लिए प्रस्तुत किया, और तब तक वह खून निकल जाने की वजह से इतने कमजोर हो चुके थे की आपत्ति भी नहीं कर सकते थे.‘

तीन बार बिका उनका विक्टोरिया क्रॉस

इस लड़ाई के बाद, सिंह गोली लगने के घाव से उबर गए और फिर मार्च 1922 में रावलपिंडी में ‘प्रिंस ऑफ वेल्स’ द्वारा उन्हें विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया.

इसके बाद उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी सूबेदार के पद पर कार्य किया और बाद में उन्हें ‘कप्तान’ के रूप में पदोन्नत किया गया. सिंह को उनकी सेवाओं के बदले में अंग्रेजों द्वारा कथित तौर पर 75 एकड़ जमीन और एक घर भी दिया गया था.

हालांकि,  1963 में ईशर सिंह की मौत के बाद उनके विक्टोरिया क्रॉस की कहानी विवादित परिस्थितियाँ में घिर गई.

ख़बरों के अनुसार, उनके बेटे, हरभजन सिंह ने यूनाइटेड किंगडम में एक नया जीवन जीने के लिए उस देश में यह पदक बेच दिया था. परिवार के सदस्यों का मानना है कि उन्होंने अपनी मां से वीरता पुरस्कार ‘इंग्लैंड में अपने दोस्तों’ को दिखाने के बहाने लिया था.

हालांकि इसका संदर्भ अज्ञात है, मगर इस विक्टोरिया क्रॉस को साल 1973 में £400 में बेचा गया था. कुछ साल बाद, एक निजी संग्रहणकर्ता (कलेक्टर) द्वारा इस पदक को फिर से बेचा और खरीदा गया था.

फिर, साल 1997 में, इसी विक्टोरिया क्रॉस को लंदन के सोथबी ऑक्शन हाउस में बेच दिया गया. वहां इसके लिए £ 55,000 की उच्चतम बोली स्वीकार की गई थी. यह बोली जाने-माने फिलांथ्रोपिस्ट (परोपकारी व्यक्ति) और हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य लॉर्ड माइकल एशक्रॉफ्ट की ओर से लगाई गई थी.

आज के दिन में इस पदक को ‘द लॉर्ड एशक्रॉफ्ट गैलरी: एक्स्ट्राऑर्डिनरी हीरोज एक्जीबिशन, इंपीरियल वॉर म्यूज़ियम’ के एक हिस्से के रूप रोटेशन पर प्रदर्शित किया जाता है.

समाचार पत्र ‘द ट्रिब्यून’ की रविवार को प्रकाशित होने वाले पत्रिका ‘स्पेक्ट्रम’ ने बताया गया है :- ‘हालांकि होशियारपुर में एक सैनिक रेस्ट हाउस का नाम ईशर सिंह के नाम पर रखा गया है, वहीँ उनके परिवार ने भी युद्ध नायक की यादगार को जीवित रखने के लिए एक छोटा सा स्मारक बनवाया हुआ है.’

ईशर सिंह का योगदान इस बात को दर्शाता है कि वह एक सच्चे नेता थे जिन्होंने अपने सैनिकों के आराम और सुरक्षा के लिए हमेशा प्रयासरत रहते थे.

(अनुवाद: राम लाल खन्ना | संपादन: ऋषभ राज)

(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़नें के लिए यहां क्लिक करें)


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