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आईपीएस कल्लूरी | विशेष व्यवस्था
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नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने बुधवार रात एक चौंकाने वाला फैसला लेते हुए विवादित आईपीएस अधिकारी एसआरपी कल्लूरी को बड़ी जिम्मेदारी दे दी. उन्हें एंटी करप्शन ब्यूरो और ईओडब्लू का महानिरीक्षक बनाया गया. हाल में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में भूपेश बघेल ने रमन सरकार को कल्लूरी को लेकर घेरा था. ऐसे में भूपेश मंत्रालय द्वारा लिए गया यह फैसला अचंभित करने वाला है.

छत्तीसगढ़ की आधिकारिक राजधानी है रायपुर. लेकिन यह प्रदेश सबसे ज्यादा चर्चा में रहता है अपने सांस्कृतिक राजधानी बस्तर से. खूबसूरत पहाड़ियों से घिरे बस्तर संभाग की पहचान बाकियों से कुछ अलग है. यहां लड़ाई है जल, जंगल और जमीन की. लड़ाई है नक्सल और सरकार की. लड़ाई है सरकार और वामपंथी उग्रवाद की. इस लड़ाई में अगर किसी का नुकसान हो रहा है तो वह हैं वहां के रहने वाले लोग. वहां के 70 प्रतिशत जनजातीय आबादी का. लेकिन इन सब के बीच बस्तर में एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है. शिवराम प्रसाद कल्लूरी. 1994 बैच के आईपीएस अधिकारी कल्लूरी, आंध्र प्रदेश से आते हैं. सन 2000 में मध्य प्रदेश का एक हिस्सा अलग करके एक नया राज्य छत्तीसगढ़ का गठन कर दिया गया.

अपने हिसाब से काम किया

अलग राज्य बनने के बाद सामान्य कद काठी के कल्लूरी को उत्तरी छत्तीसगढ़ का एसपी नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने माओवादियों की कमर तोड़ने की ठानी. इसके बाद बतौर एसएसपी इनकी पदोन्नति बस्तर से दंतेवाड़ा कर दी गई. जहां से इन्होंने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अपना नेटवर्क तैयार करना शुरू किया. अपने सीनियर अधिकारियों से कम सलाह मशविरा करने वाले कल्लूरी किसी भी सलाह के लिए सीधे नेताओं को संपर्क करते.

2010 में दंतेवाड़ा और 2013 में ऐन विधानसभा चुनाव से पहले बड़े कांग्रेसी नेताओं पर हमला हो गया. राज्य में चारों तरफ निराशा का माहौल था. हमले के बाद कल्लूरी को बस्तर रेंज का आईजी बना कर भेजा गया. उन्हें सरकार से काम करने की खुली छुट मिल गई. कल्लूरी ने अपने हिसाब से रणनीति बनाई और कठिन परिस्थितियों में भी रिस्क लेते हुए नक्सलियों के खिलाफ अपना अभियान जारी रखा. कल्लूरी अपने साथी अधिकारियों को कहते थे कि हमारा मकसद सारे नक्सलियों का सफाया नहीं है. हमारा लक्ष्य उनको अपनी तरफ करना है. उन्हें मुख्यधारा में लाना है.

जब लगे आरोप

अपने को आदिवासियों का मसीहा और नक्सलियों का काल कहने वाले कल्लूरी पर आरोप भी खूब लगे. कुछ स्थानीय समाजसेवियों ने आरोप भी लगाए कि सरकार की निष्क्रियता से ही नक्सल समस्या का हल नहीं हो रहा है और कल्लूरी इसमें सरकार का पूरा सहयोग कर रहे हैं. वे सरकार का एक मुखौटा हैं. कल्लूरी ने जिन 1200 नक्सलियों का आत्मसमर्पण करवाकर शोहरत बटोरी, उसकी पोल सरकार द्वारा ही गठित एक कमेटी ने खोल दी. कमेटी के मुताबिक 1200 में से केवल तीन नक्सली थे. बाकी सब निर्दोष आदिवासी. कल्लूरी के काल में कई पत्रकार और समाजसेवी कार्यकर्ता अपने आप को असुरक्षित महसूस करते आए हैं.

कल्लूरी के खिलाफ रेप के भी आरोप लगे हैं. लेदा नामक महिला ने आरोप लगाया कि कल्लूरी ने उसके नक्सली पति को आत्मसमर्पण के लिए बुलाया लेकिन उसे गिरफ्तार न करके उसे गोली मार दी और खुद उसके साथ रेप किया.

2016 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कल्लूरी से मानवाधिकार के उल्लंघन मामले में लगे आरोप पर सफाई भी मांगी लेकिन कल्लूरी ने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया.

कांग्रेस ने तब लगाया था आरोप, अब दिया ऊंचा पद

हालिया संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को घेरने के लिए शिवराम प्रसाद कल्लूरी को भी एक मुद्दा बनाया था. कांग्रेस ने कल्लूरी पर शोधकर्ता बेला भाटिया के मानसिक शोषण और प्रताड़ना का आरोप लगाया था. इस घटना के बाद कल्लूरी को फरवरी 2017 में माओवाद प्रभावित क्षेत्र से बाहर भेज दिया गया. सरकार ने स्वास्थ्यगत कारणों से छुट्टी पर भेजने की बात कही. तब के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा था, ‘कभी-कभी अच्छा खिलाड़ी भी जब खेल के मैदान से अस्वस्थ हो जाए, तब उसे खेल के मैदान से वापस लौटना पड़ता है.’

तब भूपेश बघेल ने रमन सिंह सरकार पर आरोप लगाया था कि ये केवल दिखावा है. अगर सरकार कल्लूरी को हटाने को लेकर गंभीर है तो उसे तत्काल गिरफ्तार कर उनपर मुकदमा दर्ज करे.

छत्तीसगढ़ में 15 साल बाद सत्ता परिवर्तन हुआ है. कल्लूरी के ज्यादातर काम रमन सिंह के सरकार में ही हुए हैं. अब ये देखना होगा कि बुधवार को भूपेश बघेल द्वारा कल्लूरी को दी गई बड़ी जिम्मेदारी के बाद वह किस तरह से उसका निर्वाह करते हैं.

 


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