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Tuesday, 27 February, 2024
होमदेशSC ने कहा- नबाम रेबिया फैसले के रेफरेंस के बारे में 'एकाकी' तरीके से तय नहीं किया जा सकता

SC ने कहा- नबाम रेबिया फैसले के रेफरेंस के बारे में ‘एकाकी’ तरीके से तय नहीं किया जा सकता

2016 के फैसले में कहा गया है कि अगर स्पीकर को हटाने का नोटिस लंबित है तो वह विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही शुरू नहीं कर सकता है. यह पिछले साल एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले विधायकों के बचाव में आया था.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि 2016 के नबाम रेबिया के फैसले को सात न्यायाधीशों की एक बड़ी बेंच को संदर्भित करने का फैसला “अमूर्त” और “एकाकी” तरीके से एक अकेले केस के तथ्यों के आधार पर तय नहीं किया जा सकता है.

अरुणाचल प्रदेश में नबाम रेबिया मामले का फैसला करते हुए, पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने माना था कि विधानसभाध्यक्ष विधान सभा के सदस्यों (विधायक) के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही शुरू नहीं कर सकते हैं, जब उनके ऊपर खुद पद से हटाए जाने का प्रस्ताव लंबित है.

यह फैसला पिछले साल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले बागी विधायकों के बचाव में आया था. महाराष्ट्र विधानसभा के उपाध्यक्ष नरहरि सीताराम जिरवाल को हटाने के लिए शिंदे समूह का नोटिस सदन के समक्ष लंबित होने के बावजूद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट ने उनकी अयोग्यता की मांग की थी.

मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने शुक्रवार को कहा कि वह शिवसेना के दो प्रतिद्वंद्वी समूहों (उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुटों) द्वारा दायर की गई क्रॉस-पेटीशन के मेरिट की जांच करते हुए ‘रेफरेंस’ के सवाल के बारे में निर्धारण करेगी.

उद्धव ठाकरे गुट ने नबाम रेबिया फैसले में निर्धारित इस सिद्धांत की इस आधार पर फिर से जांच करने की मांग की थी कि संविधान अयोग्यता याचिकाओं को तय करने से स्पीकर के काम करने की स्वायत्तता पर किसी भी “रोकथाम” की कल्पना नहीं करता है, यहां तक कि ऐसे समय में जब उसे हटाने के प्रस्ताव का नोटिस लंबित है. यह तर्क दिया गया कि इस फैसले ने दल-बदल विरोधी कानून को बेमानी बना दिया.

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दूसरी ओर, एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले समूह ने बेंच से फैसले की समीक्षा नहीं करने का आग्रह किया था क्योंकि उस पर प्रतिबंध के अभाव में, एक स्पीकर सदस्यों को अयोग्य घोषित करके विधानसभा में संरचना को बदल सकता था और बिना बहुमत वाले नेता को राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में पद पर बने रहने की अनुमति दे सकता था.


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कैसे शुरू हुआ मामला

सुप्रीम कोर्ट में मामले की शुरुआत राजनीतिक संकट से उत्पन्न होती है, जिसके कारण महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन हुआ, जब शिंदे गुट ने उद्धव ठाकरे की सरकार को गिराने के लिए भाजपा से हाथ मिलाया. भाजपा के समर्थन से, शिंदे ने राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में ठाकरे की जगह ली थी.

जबकि राजनीतिक ड्रामा सामने आया, शिंदे गुट को विधान परिषद चुनाव के सदस्य के दौरान मतदान करते समय पार्टी व्हिप के खिलाफ काम करने के लिए डिप्टी स्पीकर ज़िरवाल द्वारा अयोग्यता नोटिस दिया गया था. इस नोटिस पर शिंदे और अन्य लोगों ने सवाल उठाया, जिन्होंने कहा कि अध्यक्ष अयोग्यता याचिकाओं पर आगे नहीं बढ़ सकते थे, क्योंकि उनके खिलाफ निष्कासन नोटिस लंबित था.

27 जून, 2022 को अदालत ने अयोग्यता नोटिस पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करने के लिए समय बढ़ाकर शिंदे के नेतृत्व वाले समूह को अंतरिम राहत दी. इस आदेश से शिंदे गुट 12 जुलाई तक अपनी प्रतिक्रिया दाखिल कर सकता है.

दो दिन बाद, SC ने तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी द्वारा बुलाए गए फ्लोर टेस्ट को आगे बढ़ाया. शीर्ष अदालत ने राज्यपाल द्वारा विधानसभा बुलाने के खिलाफ ठाकरे समूह द्वारा दायर याचिका पर कोई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था.

इस बीच, ठाकरे के नेतृत्व वाले समूह ने नए स्पीकर के साथ-साथ शिवसेना के मुख्य पार्टी व्हिप की नियुक्ति को चुनौती देते हुए एक नई याचिका भी दायर की थी.

पिछले साल अगस्त में, इस मामले को अंततः पांच-न्यायाधीशों की पीठ के पास भेज दिया गया था. जैसे ही याचिकाओं पर सुनवाई शुरू हुई, ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट के वकीलों ने नबाम रेबिया के फैसले की समीक्षा का मुद्दा उठाया.

हालांकि, पीठ ने शुक्रवार को कहा, “मामले के तथ्यों के बिना ‘रेफरेंस’ के मुद्दे को अलग से तय नहीं किया जा सकता है. केस के मेरिट्स के आधार पर ही मामले का फैसला किया जाएगा.” कोर्ट ने मामले की आगे की सुनवाई के लिए 21 फरवरी की तारीख तय की है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(संपादनः शिव पाण्डेय)


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