नयी दिल्ली, तीन दिसंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश विक्रम नाथ ने बुधवार को कहा कि दिव्यांगजन का समावेशन ‘‘कोई दया या परोपकार का कार्य’’ नहीं, बल्कि ‘‘मानव-अस्तित्व की समानता’’ की पुष्टि है।
न्यायमूर्ति नाथ ने ‘अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस’ के अवसर पर राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) द्वारा आयोजित एक वेबिनार में कहा, ‘‘दिव्यांगजन का समावेशन कोई परोपकार नहीं है, यह मानव-अस्तित्व की समानता की पुष्टि है। जब हम बाधाओं को दूर करते हैं, तो हम केवल सुगमता नहीं बढ़ाते, बल्कि मानव क्षमता का पता लगाते हैं।’’
नालसा के कार्यकारी अध्यक्ष न्यायमूर्ति नाथ ने कहा कि समावेशन का अर्थ एक ऐसा नया और बेहतर वातावरण बनाना है जिसमें हर व्यक्ति सार्थक रूप से भाग ले सके।
उन्होंने कहा कि विधिक सहायता तक पहुंच सुनिश्चित करते समय दिव्यांगजन का ध्यान रखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों (डीएलएसए) को मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों, विशेष विद्यालयों, सामुदायिक केंद्रों और ऐसे अन्य स्थानों का नियमित दौरा करना चाहिए। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि सचल विधिक सेवा वैन और विधिक साक्षरता शिविर उन लोगों तक पहुंचें जो स्वयं प्रणाली तक नहीं पहुंच पाते।
न्यायमूर्ति नाथ ने कहा कि दिव्यांगता के प्रति संवेदनशीलता को न्यायाधीशों, वकीलों, पुलिस और न्यायालय कर्मियों के प्रशिक्षण का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश ने विधिक सेवाएं प्रदान करने वाले संस्थानों से कहा कि वे दिव्यांगजन को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ दिलाने में सहायता करें।
न्यायमूर्ति नाथ ने यह भी कहा कि विधिक जानकारी ब्रेल, ऑडियो, बड़े अक्षरों में छपे साहित्य और डिजिटल प्रारूपों जैसे विभिन्न सुगम माध्यमों में उपलब्ध कराई जा सकती है।
उन्होंने कहा कि दिव्यांगजन के लिए समावेशी न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस और प्रभावी प्रतिबद्धताएं निभाने के लिए संस्थानों को सामूहिक संकल्प लेने की आवश्यकता है।
न्यायमूर्ति नाथ ने प्रसिद्ध अमेरिकी दिव्यांग अधिकार कार्यकर्ता और लेखिका हेलेन केलर का उद्धरण देते हुए कहा, ‘‘अपना चेहरा सूरज की ओर रखें, फिर आप किसी छाया को नहीं देख पाएंगे।’’
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सिम्मी रंजन
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