प्रयागराज, 23 जनवरी (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि पत्नी की करतूत या कार्यों से उसका पति कमाने में अक्षम हो जाता है तो वह उससे गुजारा भत्ता का दावा नहीं कर सकती।
न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत शुक्ला ने इस टिप्पणी के साथ विनीता नाम की एक महिला की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी जिसने अपने पति से गुजारा भत्ता दिए जाने की मांग की थी।
उच्च न्यायालय ने कुशीनगर की परिवार अदालत के निर्णय को सही करार दिया जिसमें निचली अदालत ने पत्नी के गुजारा भत्ता के आवेदन को खारिज कर दिया था। अदालत ने कहा कि इस तरह के परिदृश्य में गुजारा भत्ता का आदेश देना भारी अन्याय होगा खासकर तब जब पत्नी के परिवार वालों के आपराधिक कृत्य से पति के कमाने की क्षमता बर्बाद हो गई।
पत्नी की ओर से दायर याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कहा, “जहां भारतीय समाज आमतौर पर एक पति से काम करने और अपने परिवार का भरण पोषण करने की अपेक्षा रखता है, इस मामले ने अनूठी परिस्थितियां प्रस्तुत की हैं।”
तथ्यों के मुताबिक, पेशे से होम्योपैथिक चिकित्सक- डॉक्टर वेद प्रकाश सिंह पूर्व में गुजारा भत्ता देने में सक्षम थे। हालांकि, उनके साले और ससुर ने क्लिनिक में एक झगड़े के दौरान उन्हें गोली मार दी जिसमें एक गोली उनकी रीढ़ में फंसी रह गई।
गोली निकालने के लिए जरूरी सर्जरी से उन्हें लकवा मारने का अत्यधिक जोखिम था। वह आराम से बैठने में असमर्थ हो गए। कुशीनगर की परिवार अदालत ने सात मई, 2025 को अंतरिम गुजारा भत्ता के लिए पत्नी का आवेदन खारिज कर दिया।
उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के निर्णय को सही ठहराते हुए कहा कि पति की शारीरिक अक्षमता को लेकर कोई विवाद नहीं है और इसकी वजह उसकी पत्नी के परिवार वाले हैं।
भाषा
सं, राजेंद्र
रवि कांत
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