scorecardresearch
Friday, 10 April, 2026
होमदेशकैसे हुई थी रामअवतार जग्गी की हत्या—छत्तीसगढ़ के सबसे खौफनाक राजनीतिक हत्याकांड में से एक की कहानी

कैसे हुई थी रामअवतार जग्गी की हत्या—छत्तीसगढ़ के सबसे खौफनाक राजनीतिक हत्याकांड में से एक की कहानी

छत्तीसगढ़ के पहले चुनाव कैसे अजीत जोगी के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को ठंडे दिमाग से खत्म करने तक पहुंच गए—पुलिस से लेकर सीबीआई तक जांच में हत्या और संस्थागत लीपापोती सामने आई.

Text Size:

नई दिल्ली: तारीख थी 4 जून 2003. राजपुर के एक शांत इलाके में तीन गोलियों की आवाज़ गूंजी और छत्तीसगढ़ की राजनीति हमेशा के लिए बदल गई.

58 साल के विपक्षी नेता रामअवतार जग्गी को उनकी सफेद मारुति ऑल्टो में बहुत पास से गोली मारी गई. जो पहली नज़र में एक सामान्य सड़क अपराध लगा, वह असल में नए राज्य के इतिहास की पहली राजनीतिक हत्याओं में से एक था. 23 साल, 29 आरोपी, पुलिस की दो अलग-अलग रिपोर्ट, ट्रायल कोर्ट से बरी होने का फैसला, पुलिस द्वारा संस्थागत लीपापोती और सीबीआई जांच के बाद आखिरकार मुख्य आरोपी—साजिश का मुख्य मास्टरमाइंड और उस समय के मुख्यमंत्री के बेटे अमित जोगी, को सज़ा मिली.

जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने पिछले 23 साल में एक भी सुनवाई नहीं छोड़ी. पुलिस थानों से लेकर कई अदालतों तक और 29 लोगों को सज़ा मिलने के बाद सतीश ने दिप्रिंट से कहा, “इस सज़ा के जरिए मेरे पिता, एक ईमानदार इंसान, को श्रद्धांजलि मिली है.”

23 साल न्याय का इंतज़ार करने के लिए बहुत लंबा समय होता है, लेकिन सतीश के लिए यह उससे भी ज्यादा था; यह मौजूदा मुख्यमंत्री और उनके बेटे के खिलाफ एक कभी खत्म न होने वाली लड़ाई थी.

“इन 23 साल में मेरे परिवार और मैंने कई लड़ाइयां लड़ीं. हमने सिस्टम के खिलाफ, पुलिस के खिलाफ, पैसे और राजनीतिक ताकत रखने वाले लोगों के खिलाफ, उन नेताओं के खिलाफ जिन पर भरोसा किया जाता है, लेकिन आज मैं कह सकता हूं कि सच की जीत हुई है. भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं.”

2007 में ट्रायल कोर्ट ने अमित जोगी को बरी कर दिया था, जबकि उसी सबूत के आधार पर 28 अन्य सह-आरोपियों को दोषी ठहराया गया था. जोगी ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट का भी रुख किया—आधिकारिक आदेश आने से कुछ घंटे पहले. नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले के खिलाफ सीबीआई की अपील में 1,373 दिन की देरी को माफ कर दिया था और कहा था कि “गंभीर आरोपों” और “न्याय के हित” में मामले को उसके कानूनी अंत तक पहुंचना चाहिए. छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले ने आखिरकार लंबे समय से चल रही लीपापोती को खत्म कर दिया. अदालत ने माना कि पूरी साजिश का मास्टरमाइंड जोगी था और मुख्यमंत्री का बेटा होने के कारण उसकी मजबूत स्थिति थी.

मकसद

इस मामले का मकसद बहुत गहरा था. सतीश ने कहा कि एक समय 350 से ज्यादा हार्डवेयर कारोबारी उनके पिता के साथ काम करते थे. “मेरे पिता ने मजबूत नेटवर्क बनाया था और जब वे राजनीति में आए तो उन्हें बहुत बड़ा समर्थन मिला. उन्हें प्रभावशाली नेता माना जाता था…हर रैली और हर मीटिंग में मेरे पिता को अहम माना जाता था…यही बात जोगी परिवार को परेशान करती थी…उन्होंने मेरे पिता से अपने साथ आने को कहा, लेकिन उन्होंने मना कर दिया…मैंने कई बार उन्हें मेरे पिता को धमकी देते देखा और जब वे उन्हें झुका नहीं पाए…तो उन्होंने उन्हें मार दिया…”

यह मामला सबसे पहले सेशंस कोर्ट में गया. छत्तीसगढ़ पुलिस की जांच के आधार पर अभियोजन ने कहा कि पांच आरोपियों ने लूट के मकसद से हत्या की थी.

ट्रायल के दौरान सीबीआई जांच के आधार पर अभियोजन ने बिल्कुल अलग कहानी रखी, जिसमें कहा गया कि हत्या राजनीतिक कारणों से की गई. आरोप था कि मृतक 10 जून 2004 को रायपुर में नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की बड़ी रैली आयोजित कर रहे थे, जिसमें भारी भीड़ आने की उम्मीद थी और इसे उस समय के मुख्यमंत्री अजीत जोगी उर्फ अजीत प्रमोद कुमार जोगी और उनके बेटे अमित जोगी के लिए राजनीतिक खतरे के रूप में देखा जा रहा था.

सीबीआई जांच के अनुसार मई 2003 में रायपुर के होटल ग्रीन पार्क में अमित जोगी, सह-आरोपी याह्या ढेबर और अभय गोयल ने विधानसभा चुनाव से पहले एनसीपी की रैली को रोकने के उद्देश्य से आपराधिक साजिश रची. सीबीआई जांच में सामने आया कि इस साजिश के मास्टरमाइंड अमित जोगी, अभय गोयल, याह्या ढेबर और फिरोज सिद्दीकी थे.

जांच में यह भी सामने आया कि साजिश का एक हिस्सा उस समय के मुख्यमंत्री के सरकारी घर में बनाया गया, जिसमें चिमन सिंह भी शामिल था. साजिश को आगे बढ़ाने के लिए याह्या ढेबर गुजरात गया, जबकि अमित जोगी और अभय गोयल राजनांदगांव और डोंगरगढ़ की ओर गए. अन्य सह-आरोपी, जिनमें फिरोज सिद्दीकी और चिमन सिंह शामिल थे, ने पैसे और जरूरी इंतजाम किए.

मई 2003 के आखिर में कई आरोपी रायपुर पहुंचे और उन्हें बत्रा हाउस में ठहराया गया, जहां चिमन सिंह उन्हें रेलवे स्टेशन से लेकर आया था.

आखिरकार 4 जून को रात करीब 9:30 बजे साजिश को अंजाम दे दिया गया.

आधी रात का अपराध

सतीश उस रात को याद करके आज भी कांप जाते हैं. “मुझे जब हत्या के बारे में पता चला…मैं समझ ही नहीं पाया…मेरे अपने पिता..?”

4 जून 2003 की रात बहुत गर्म थी और छत्तीसगढ़ अपने पहले विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहा था. रात लगभग 11:40 बजे, एनसीपी के कोषाध्यक्ष रामअवतार जग्गी रायपुर के मौधापारा इलाके की संकरी सड़कों पर अपनी कार में जा रहे थे.

जग्गी धार्मिक परंपराओं का पालन करने वाले व्यक्ति थे और वे अक्सर अपने गले में रुद्राक्ष की माला पहनते थे. यही एक चीज़ उनके आखिरी पलों की दुखद पहचान बन गई.

हमला बहुत योजनाबद्ध तरीके से किया गया. चिमन सिंह, शिवेंद्र, संजय, बांके, विनोद, विमल, राकेश, अशोक, रवि, नरसी, सत्येंद्र, विवेक, लल्ला, सुनील, अनिल और हरिश्चंद्र, सभी एक ही मकसद से इकट्ठा हुए थे—जग्गी की हत्या करना.

भिंड इलाके से बुलाए गए कुछ लोगों ने कार को रोका और जोरदार हमला शुरू कर दिया. पहले उन्होंने लाठियों से गाड़ी तोड़ी ताकि अफरा-तफरी मच जाए, फिर मुख्य शूटर चिमन सिंह ने प्वाईंट 32 बोर पिस्टल से बहुत पास से गोली चलाई.

सतीश जग्गी रिपोर्ट दर्ज कराने पुलिस स्टेशन पहुंचे. उन्होंने शिकायत दी, जिसमें साफ तौर पर जोगी परिवार का नाम लिखा था, लेकिन इसी दौरान उन्हें पता चला कि पुलिस लूट और हत्या के आरोप में मामला दर्ज कर रही है. “पुलिस ने केस में झूठे लोगों के नाम डाल दिए, झूठे तथ्य बना दिए, उन्होंने बहुत मजबूत केस तैयार किया, यह सोचकर कि हम टूट जाएंगे, लेकिन हमने लड़ाई जारी रखी. सीबीआई ने पूरी जांच की.”

जग्गी कहते हैं कि जोगी परिवार ने “कोई कसर नहीं छोड़ी.”. “उन्होंने मुझे धमकाने की कोशिश की, मुझे खरीदने की कोशिश की, मुझे डराने की कोशिश की, लेकिन आज हम उन सभी लोगों को जेल भेजने में सफल हुए जिन्होंने मेरे पिता की हत्या की; यह सब उस समय के मुख्यमंत्री के बेटे को बचाने के लिए किया गया था.”

सीबीआई की जांच में सामने आया कि आरोपी चिमन सिंह छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी का पुराना करीबी था और उसने मरवाही और शहडोल जैसे चुनाव क्षेत्रों में उनका सक्रिय समर्थन किया था.

सीबीआई जांच में यह भी सामने आया कि साजिश कैसे पूरी की गई. शिवेंद्र सिंह परिहार एक मारुति वैन चला रहा था, जिसकी नंबर प्लेट बदली गई थी, जबकि चिमन सिंह और अन्य आरोपी विनोद राठौर द्वारा चलाई जा रही बोलेरो गाड़ी में थे. जांच के अनुसार, उनके पास बांस की लाठियां और पेट्रोल से भरी बोतलें थीं और वे रायपुर के बुधापारा स्थित एनसीपी कार्यालय के पास पहुंचे.

जग्गी जब एनसीपी कार्यालय से अपनी ऑल्टो कार में निकले, तो आरोपियों ने उनका पीछा किया, उन्हें रोका और जबरन गाड़ी रुकवाई. इसके बाद आरोपी अपनी गाड़ियों से उतरे और मृतक की गाड़ी को तोड़ दिया. चिमन सिंह ने जग्गी पर गोली चलाई, जिससे उनकी मौत हो गई, जबकि राकेश कुमार शर्मा ने मृतक के गले से रुद्राक्ष की माला निकाल ली.

ईमानदार पिता

सतीश को सबसे ज्यादा अपने पिता की यही बात याद है कि वे हमेशा सही काम करने को कहते थे, चाहे कुछ भी हो. उन्होंने कहा, “मेरे पिता ईमानदार इंसान थे. वे हमें जमीन से जुड़ा रहना सिखाते थे. उन्हें सत्ता पसंद नहीं थी.”

जग्गी ने मध्य प्रदेश टूरिज्म विभाग में बस कंडक्टर के रूप में काम शुरू किया था और उन्हें हर महीने 800 रुपये मिलते थे. वे अपने पिता की ब्रेड फैक्ट्री में भी काम करते थे और साइकिल से कई गांवों में ब्रेड पहुंचाते थे. धीरे-धीरे उन्होंने पैसे बचाए और लकड़ी के खिलौनों की फैक्ट्री शुरू की.

इस खिलौना फैक्ट्री से जग्गी ने हार्डवेयर के कारोबार की शुरुआत की.

सतीश ने कहा, “मेरे पिता ने अपना नाम बनाया. उस समय बहुत कम लोग थे. उन्होंने छत्तीसगढ़ में डीलर नेटवर्क तैयार किया. तभी उनकी नजदीकी विद्या चरण शुक्ल से बढ़ी. जब NCP बनी, तो शुक्ल जी मेरे पिता को कोई पद देना चाहते थे, लेकिन वे राजनीति में पद नहीं चाहते थे, इसलिए आखिर में वे कोषाध्यक्ष बनने के लिए तैयार हुए.”

स्क्रिप्टेड लीपापोती

लेकिन हमला सिर्फ जग्गी की हत्या तक सीमित नहीं था. सीबीआई की जांच में एक अलग साजिश का भी खुलासा हुआ, जिसमें सब-इंस्पेक्टर आर.सी. त्रिवेदी, थाना प्रभारी वी.के. पांडे और सिटी एसपी अमरिक सिंह गिल शामिल थे. सीबीआई ने कहा, “असल 53 आरोपियों को बचाने के उद्देश्य से कुछ लोगों—अविनाश सिंह, जम्बवंत कश्यप, श्याम सुंदर, विनोद सिंह और विश्वनाथ राजभर—को झूठा फंसाया गया और उनसे जुर्म कबूल करवाया गया, खासकर इसलिए क्योंकि एफआईआर में शुरुआत में अजीत जोगी और अमित जोगी के नाम थे.”

अपने आदेश में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भी लीपापोती का ज़िक्र किया. अभियोजन का कहना था कि ऊपर बताए गए पांच आरोपी असली नहीं थे, बल्कि नकली लोग थे, जिन्हें असली आरोपियों ने कुछ पुलिस अधिकारियों की मदद से झूठा फंसाया. इन पुलिस अधिकारियों ने दिखावटी जांच की और फर्जी चार्जशीट दाखिल की. ये नकली आरोपी, संबंधित पुलिस अधिकारी और उन्हें तैयार करने वाले लोग सीबीआई केस में आरोपी बनाए गए.

अदालत ने कहा, “जिस तरह अपराध की योजना बनाई गई, उसे मिलकर अंजाम दिया गया, उससे साफ दिखता है कि यह एक मजबूत और केंद्र से निर्देशित साजिश थी. इतना संगठित और बड़े स्तर का अपराध, जिसमें नकली आरोपी, पहले से बनाई गई योजना और पुलिस तंत्र की मिलीभगत शामिल हो, बिना किसी बहुत प्रभावशाली व्यक्ति की सक्रिय भूमिका, मार्गदर्शन और संरक्षण के संभव नहीं था.”

अदालत ने कहा, “इस स्थिति में अमित जोगी की भूमिका सिर्फ किसी लाभ पाने वाले व्यक्ति की नहीं थी, बल्कि वह पूरी साजिश का मुख्य योजनाकार और उसे आगे बढ़ाने वाला व्यक्ति था.”

अदालत ने यह भी कहा, “इतनी बड़ी योजना, कई लोगों के बीच तालमेल और आरोपियों को बचाने की कोशिश यह दिखाती है कि इस पूरे ऑपरेशन के पीछे कोई प्रभावशाली व्यक्ति था, जो बाकी लोगों को निर्देश दे रहा था—और यह बात साफ तौर पर अमित जोगी पर लागू होती है.”

अदालत ने कहा कि इतने मजबूत सबूतों के बावजूद अमित जोगी को बरी करना सही नहीं था और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के खिलाफ था. रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री को पूरी तरह देखने पर यह साफ होता है कि वह सिर्फ लाभ पाने वाला व्यक्ति नहीं था, बल्कि पूरी साजिश का मुख्य योजनाकार और उसे आगे बढ़ाने वाला व्यक्ति था.

संदिग्ध बैठकें

यह साबित करने के लिए कि आरोपी अमित जोगी इस साजिश का अहम हिस्सा थे, होटल ग्रीन पार्क के मैनेजर का बयान अहम रहा, जहां कई बार आरोपियों की बैठक हुई थी. अपने बयान में मैनेजर ने कहा कि वह अमित जोगी, याह्या ढेबर और अभय गोयल को जानते थे और वे 2003 में कभी-कभी होटल ग्रीन पार्क में डिनर के लिए आते थे. वे लगभग एक घंटा रुकते थे और महीने में एक-दो बार आते थे.

“जब भी वे आते थे, उनके साथ चार-पांच अन्य लोग भी होते थे. यह भी सही है कि उनके आने से पहले सीएम हाउस से फोन आता था, जिसमें बताया जाता था कि वे आ रहे हैं, उनके लिए टेबल रिजर्व रखी जाए और वे किस समय पहुंचेंगे.”

अमित जोगी के कॉलेज के दोस्त रेजिनाल्ड जेरमाया ने भी बयान दिया कि वह दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज में पढ़ाई के समय से उन्हें जानते हैं. जेरमाया के अनुसार 21 मई 2003 को अमित जोगी ने उन्हें होटल ग्रीन पार्क बुलाया, जहां एनसीपी की रैली को रोकने की योजना पर चर्चा करने के लिए बैठक हुई थी.

उन्होंने कहा कि बैठक में कई लोग मौजूद थे. “बैठक के दौरान अमित जोगी ने प्रस्ताव रखा कि बलविंदर जग्गी, प्रमोद चौबे और मृतक, जो एनसीपी से जुड़े थे, उन्हें रास्ते से हटाया जाए,” जेरमाया ने अपने बयान में कहा.

उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने और वहां मौजूद दो-तीन अन्य लोगों ने इस सुझाव का विरोध किया और अमित जोगी से एनसीपी के किसी भी सदस्य को नुकसान न पहुंचाने को कहा. लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई.

‘अमित जोगी मास्टरमाइंड’

दिप्रिंट से बात करते हुए अमित जोगी ने कहा, “मुझे 23 साल पहले बरी कर दिया गया था. अपील की अनुमति मुझे सुने बिना दे दी गई.” उन्होंने कहा कि उनकी बरी होने के खिलाफ सीबीआई की अपील फिर से उन्हें सुने बिना मंजूर कर ली गई—पहले 25 मार्च को और फिर 2 अप्रैल को.

उन्होंने कहा, “आज हमने सुप्रीम कोर्ट में ex parte आदेश के खिलाफ स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दाखिल की है, जिसमें सीबीआई को अपील की अनुमति दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने एसएलपी को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है. आदेश में भी लिखा है कि मुझे, जो आरोपी हूं, नहीं सुना गया. मुझे बोलने का मौका भी नहीं दिया गया. यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है.”

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आदेश मंगाए हैं और 20 अप्रैल को उनकी समीक्षा करेगा.

जोगी ने आगे कहा, “यह न्याय के साथ बहुत बड़ी गलती है कि किसी व्यक्ति को सुने बिना उसकी बरी होने का फैसला रद्द कर दिया जाए. मामला छह दिन में सुनवाई के लिए आता है और छह दिन में ही मुझे सुने बिना दोषी ठहरा दिया जाता है. यह गलत है, मुझे पूरा भरोसा है कि सुप्रीम कोर्ट इसमें दखल देगा.”

छत्तीसगढ़ राज्य 2000 में बना था और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उम्मीदवार अजीत जोगी, जो पहले अफसर रह चुके थे, राज्य के मुख्यमंत्री थे. 2004 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान जोगी की गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया था, जिससे उनके शरीर का निचला हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया था. 2020 में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई.

उनके बेटे अमित जोगी 2013 से 2018 तक छत्तीसगढ़ विधानसभा के सदस्य भी रहे. हालांकि 2016 में पिता-पुत्र को पार्टी विरोधी गतिविधियों और अंतागढ़ उपचुनाव में गड़बड़ी के आरोप में कांग्रेस से निकाल दिया गया था. इसके बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस बनाई.

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा, “पूरे सबूतों से साफ है कि अमित जोगी पूरी साजिश के मास्टरमाइंड थे और उस समय के मुख्यमंत्री के बेटे होने के कारण उनकी मजबूत स्थिति थी.”

अदालत ने कहा कि जोगी इतने प्रभावशाली थे कि वे पुलिस अधिकारियों को भी इस तरह प्रभावित कर सकते थे कि हमलावरों के रूप में नकली लोगों को खड़ा किया जा सके.

अदालत ने कहा, “पैसों के लेन-देन, बत्रा हाउस, होटल ग्रीन पार्क और सीएम हाउस में आरोपियों की बार-बार हुई बैठकों के सबूत साफ दिखाते हैं कि अमित जोगी शुरू से ही सभी गतिविधियों के बारे में जानते थे और पूरा अपराध उनके निर्देश पर किया गया.”

अदालत ने कहा, “इन सभी बातों को देखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी अमित जोगी को बरी करने का फैसला साफ तौर पर गलत, गैरकानूनी और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के खिलाफ था.”

अदालत ने कहा, “अमित जोगी उर्फ अमित ऐश्वर्य जोगी को आईपीसी की धारा 302 और धारा 120-बी के तहत दोषी ठहराया जाता है और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाती है, साथ ही 1,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाता है. जुर्माना न देने पर छह महीने की अतिरिक्त सख्त कैद होगी.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: गढ़चिरौली में सरेंडर के बाद माओवादियों की नई ज़िंदगी: AK-47 की जगह नौकरी और बच्चों की पढ़ाई पर फोकस


 

share & View comments