नई दिल्ली: तेरह साल पहले, अप्रैल की एक दोपहर छत्तीसगढ़ राज्य की ताकत को खुली चुनौती दी गई थी. 30-40 माओवादी कैडरों के एक समूह ने तत्कालीन सुकमा जिला कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन की सुरक्षा में तैनात जवानों पर हमला किया, उनके गनमैन को मार दिया और उन्हें बंदूक की नोक पर अगवा कर बस्तर क्षेत्र के घने जंगलों में ले गए. इस साहसिक अपहरण में अब मारे जा चुके माओवादी कमांडर माडवी हिडमा का नाम सामने आया था, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इस पूरे ऑपरेशन को अंजाम देने वाला उसका करीबी बरसा देवा था.
शनिवार को देवा ने 18 अन्य भूमिगत कैडरों के साथ तेलंगाना के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) बी. शिवधर रेड्डी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. रेड्डी ने इसे देश में हिंसक माओवादी आंदोलन के अंत की दिशा में एक बड़ा मोड़ बताया.
रेड्डी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “देवा के आत्मसमर्पण से सीपीआई (माओवादी) की सैन्य शाखा पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी लगभग पूरी तरह खत्म हो गई है. इसी तरह, संगठन की तेलंगाना राज्य समिति के सदस्य कंकनाला राजी रेड्डी उर्फ वेंकटेश के आत्मसमर्पण से भी संगठन लगभग ढहने की कगार पर पहुंच गया है, जहां अब केवल एक सदस्य बचा है.”
यह घटनाक्रम केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा देश से वामपंथी उग्रवाद (LWE) खत्म करने के लिए तय 31 मार्च, 2026 की समयसीमा से पहले सामने आया है.
सबसे वांछित हिडमा की तरह देवा भी दक्षिण सुकमा के पुवारती गांव का रहने वाला है. हिडमा, उसकी पत्नी और चार अन्य लोगों को पिछले साल 18 नवंबर को गोली मार दी गई थी. वहीं, एलेक्स पॉल मेनन हिडमा के अंत और देवा के आत्मसमर्पण दोनों को देखने के लिए ज़िंदा रहे, क्योंकि उन्हें मई 2012 में लंबी बातचीत के बाद रिहा कर दिया गया था.
बरसा देवा का उभार
पिछले एक दशक में सुकमा की तस्वीर काफी बदल गई है. दूर-दराज के गांवों तक मोबाइल टावर, कच्ची सड़कें और पानी के कनेक्शन पहुंच गए हैं, और जमीन पर राजनीतिक हालात भी बदले हैं.
इसका एक उदाहरण तब दिखा, जब छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा पिछले साल नवंबर में पुवारती गांव पहुंचे और ग्रामीणों के साथ भोजन किया. उनके साथ पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पत्तिलिंगम, सुकमा के पुलिस अधीक्षक किरण चव्हाण और जिला कलेक्टर अमित कुमार जैसे वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे.

हाथ जोड़कर शर्मा ने हिडमा और देवा की माताओं—पुंजी माडवी और बरसा सिंगे—से उनके बेटों से हथियार छोड़ने की अपील करने को कहा. इसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुई थी.
एक हफ्ते बाद, आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीताराम राजू जिले के मारेडुमिल्ली जंगल क्षेत्र में हिडमा और उसकी पत्नी मृत पाए गए. अपने मेंटर की मौत के बाद, बताया जाता है कि खुफिया अधिकारियों ने अनौपचारिक चैनलों के जरिए देवा से संपर्क किया. शर्मा ने एक और बयान जारी कर देवा से आत्मसमर्पण करने और पुनर्वास योजना अपनाने की अपील की, जो आखिरकार शुक्रवार को तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण के रूप में पूरी हुई.
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, देवा की प्रतिबंधित संगठन में एंट्री 2003 में हुई थी, जब उसे पामेड एरिया कमेटी में शामिल किया गया. उसे लगातार पदोन्नति मिलती रही और जब हिडमा सचिव था, तब देवा कोंटा एरिया कमेटी में काम करता रहा और सुकमा में संगठन का नेतृत्व करता रहा.
2008 तक उसे एरिया कमेटी सदस्य से डिविजनल कमेटी सदस्य बना दिया गया. उसका उभार हिडमा के साथ-साथ हुआ, जिसे 2009 तक पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) की कंपनी 3 का कमांडर और बाद में एक बटालियन का डिप्टी कमांडर बनाया गया.
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, देवा ने 2008 से 2020 के बीच साउथ बस्तर डिविजन में सैन्य कमांडर-इन-चीफ के रूप में काम किया. इस डिविजन में सुकमा, बीजापुर और दंतेवाड़ा के कुछ हिस्से शामिल हैं.
दिप्रिंट से बात करते हुए इस पूरे घटनाक्रम से जुड़े एक सूत्र ने कहा, “पीएलजीए बटालियन 1 का कमांडर बनने से पहले भी देवा और हिडमा हमेशा बेहद करीबी तालमेल के साथ काम करते थे. दोनों एक-दूसरे पर पूरी तरह भरोसा करते थे.”
सूत्र ने बताया, “हिडमा सामने से नेतृत्व करने वाला व्यक्ति था, लेकिन कई सालों तक देवा उसका मार्गदर्शन करता रहा और उनके सुनहरे दौर में कई हमलों की योजना बनाने में मदद करता रहा. देवा उन साहसिक ऑपरेशनों के पीछे का शांत रणनीतिकार था, जिनका श्रेय सार्वजनिक रूप से हिडमा को दिया जाता था. दोनों की आदिवासी समझ और लड़ने का जज़्बा काफी हद तक एक जैसा था.”
उन्होंने कहा, “देवा हमेशा हिडमा का भरोसेमंद साथी और उसकी रीढ़ रहा है. देवा और उसके साथियों द्वारा सौंपे गए हथियारों की संख्या और किस्म से साफ है कि वह पूरी तरह एक सैन्य व्यक्ति था. उसके आत्मसमर्पण के साथ माओवादियों की सैन्य शाखा पूरी तरह खत्म हो गई है.”
आत्मसमर्पित हथियारों के जखीरे में कुल 48 हथियार शामिल हैं, जिनमें दो लाइट मशीन गन, इजरायल में बनी टेवर राइफल, अमेरिका में बनी कोल्ट राइफल, 10 इंसास राइफल, 8 एके-47 राइफल और सेल्फ-लोडिंग राइफल, चार बैरल ग्रेनेड लॉन्चर सहित अन्य हथियार शामिल हैं.
सूत्रों के मुताबिक, यह देवा ही था जिसने तय किया था कि माओवादी नेतृत्व सुरक्षा बलों के दबाव से बचने के लिए कर्रेगुट्टालु पहाड़ियों में शरण ले. यह इलाका छत्तीसगढ़ के बीजापुर और सुकमा जिलों तथा तेलंगाना के मुलुगु और भद्राद्री कोठागुडेम जिलों के बीच फैला हुआ है.
हमलों की एक के बाद एक श्रृंखला
देवा के पूरे सफर से परिचित सूत्रों ने बताया कि 2007 से 2024 के बीच बस्तर में सुरक्षा बलों पर किए गए लगभग सभी हमलों का समन्वय उसी ने किया था. इसमें 2010 और 2021 के वे घातक हमले भी शामिल हैं, जिनमें क्रमशः 76 और 22 जवान मारे गए थे.
सूत्रों ने बताया कि मई 2010 में, सुरक्षा बलों पर एक हमले के ठीक एक महीने बाद, देवा ने दंतेवाड़ा-सुकमा सड़क पर चिंगावरम में बस विस्फोट की भी योजना बनाई थी. उस विस्फोट में 35 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें 19 सुरक्षा बलों के जवान शामिल थे.
सूत्रों के मुताबिक, देवा ने 2013 में हुए दरभा घाटी हमले की भी योजना बनाई थी, जिसमें छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का लगभग पूरा शीर्ष नेतृत्व खत्म हो गया था.
अप्रैल 2017 में, उसने सुकमा के बुर्कापाल-चिंतागुफा इलाके में एक और घातक हमला किया. इसमें करीब 300 माओवादी कैडरों ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 90 जवानों को घेर लिया था. इस मुठभेड़ में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के 25 जवान मारे गए थे.
खुफिया और पुलिस सूत्र देवा के बड़े और जोखिम भरे हमलों का कारण प्रतिबंधित संगठन की सबसे बड़ी निर्णय लेने वाली इकाई, केंद्रीय समिति के सदस्यों से उसकी नजदीकी को मानते हैं.
पुलिस के एक अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, “सैन्य रणनीति के लिए देवा पर इतना भरोसा था कि मुप्पाला लक्ष्मण राव उसे दक्षिण बस्तर में अपने आने-जाने के दौरान अपनी सुरक्षा टीम में रखता था.”
‘गणपति’ नाम से जाना जाने वाला राव नवंबर 2018 में इस्तीफा देने तक करीब 14 साल तक संगठन का महासचिव रहा.
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, 2024 में देवा को पीएलजीए की बटालियन-1 का कमांडर बनाया गया था, जब हिडमा को केंद्रीय समिति में पदोन्नत किया गया. अधिकारी ने बताया, “पद संभालने के बाद देवा ने पीएलजीए को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटने की रणनीति बनाई, ताकि नक्सल विरोधी अभियानों में बड़े नुकसान से बचा जा सके. इससे एक जगह पर संगठन कमजोर हुआ, लेकिन उसका मानना था कि अगर पीएलजीए बचा रहा तो चल रहे अभियानों के बीच आंदोलन भी बचा रहेगा. वह कई सालों से एक शांत रणनीतिकार रहा है.”
बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पट्टलिंगम ने देवा के आत्मसमर्पण को बस्तर में चल रहे लगातार और निर्णायक माओवादी विरोधी अभियानों की “मजबूत पुष्टि” बताया.
उन्होंने बयान में कहा, “लगातार ऑपरेशनल दबाव और समर्थन आधार के खत्म होने के चलते माओवादी कैडरों के पास हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने के अलावा कोई ठोस विकल्प नहीं बचा है.”
उन्होंने कहा कि सुरक्षा बल बस्तर से वामपंथी उग्रवाद (LWE) को पूरी तरह खत्म करने के मिशन पर अडिग हैं. साथ ही उन्होंने कहा कि माओवादी कैडर आधार का तेजी से कमजोर होना वहां के लोगों के लिए स्थायी शांति, समावेशी विकास और लंबे समय तक सुरक्षा सुनिश्चित करने के सामूहिक संकल्प को और मजबूत करता है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
