गुरुग्राम: चंडीगढ़ में 590 करोड़ रुपये के IDFC फर्स्ट बैंक घोटाले के कुछ ही हफ़्तों बाद, हरियाणा में एक और बैंकिंग घोटाला सामने आया है.
पंचकुला नगर निगम ने कोटक महिंद्रा बैंक की पंचकुला ब्रांच में रखी अपनी फिक्स्ड डिपॉज़िट रसीदों (FDRs) में लगभग 150 करोड़ रुपये की गड़बड़ियों का पता लगाया है. ये अनियमितताएं तब सामने आईं जब नगर निगम ने बैंक से ऐसी ही एक FDR के मैच्योर होने पर फंड ट्रांसफर करने को कहा.
तेजी से कार्रवाई करते हुए, हरियाणा सरकार ने पंचकूला नगर निगम से जुड़े कोटक महिंद्रा बैंक फिक्स्ड डिपॉज़िट घोटाले का मामला राज्य सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (SV&ACB) को सौंप दिया, और उसे FIR दर्ज करके मामले की गहन जांच करने का निर्देश दिया.
चीफ सेक्रेटरी के कार्यालय, विजिलेंस डिपार्टमेंट से 24 मार्च 2026 को एक लेटर स्टेट विजिलेंस एंड एंटी करप्शन ब्यूरो (SV&ACB), हरियाणा, पंचकुला के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस को भेजा गया है. इस पत्र में नगर निगम की FDRs से संबंधित गड़बड़ियों के साथ-साथ कोटक महिंद्रा बैंक, सेक्टर-11, पंचकुला में रखे बैंक खातों की पूरी जांच करने का निर्देश दिया गया है.
बुधवार को दिप्रिंट द्वारा संपर्क किए जाने पर, SV&ACB के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस, अर्शिंदर सिंह चावला ने पुष्टि की कि ब्यूरो के पंचकुला रेंज पुलिस स्टेशन में एक FIR दर्ज कर ली गई है और जांच शुरू हो गई है.
यह घटनाक्रम एक ऐसे मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ है जो तेजी से हरियाणा का दूसरा बड़ा बैंकिंग घोटाला बनता जा रहा है. जांचकर्ताओं को शक है कि यह घोटाला, भले ही इसमें शामिल लोग अलग हों, लेकिन इसके तरीके के मामले में 590 करोड़ रुपये के IDFC फर्स्ट बैंक घोटाले से जुड़ा हो सकता है—घोटाले ने पहले ही पूरे राज्य के कई सरकारी विभागों को हिलाकर रख दिया है.
‘घोटाला’ कैसे सामने आया?
पंचकुला नगर निगम ने कोटक महिंद्रा बैंक की सेक्टर-11 ब्रांच में एक खाता खोला था, जहां नगर निगम की 16 फिक्स्ड डिपॉजिट (FDRs) रखी थीं, जिन्हें मूल रूप से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से यहां ट्रांसफर किया गया था. यह घोटाला लगभग इत्तेफाक से सामने आया. जब IDFC फर्स्ट बैंक घोटाला सामने आया और सरकारी अधिकारियों में हड़कंप मच गया, तो नगर निगम ने कोटक महिंद्रा बैंक को पत्र लिखकर अपनी FDRs के मैच्योर होने पर उन्हें वापस करने को कहा. बैंक के जवाब से अधिकारी हैरान रह गए: उन फिक्स्ड डिपॉज़िट में से पांच का तो बैंक के सिस्टम में कोई रिकॉर्ड ही नहीं था.
तुरंत एक आंतरिक जांच समिति बनाई गई, जिसमें निगम के लेखा अधिकारी, कमिश्नर और संयुक्त कमिश्नर शामिल थे. समिति ने एक रिपोर्ट तैयार की और उसे बैंक और राज्य सरकार, दोनों को भेज दिया.
इसी बीच, कोटक महिंद्रा बैंक ने पंचकूला के पुलिस उपायुक्त के पास एक अलग शिकायत दर्ज कराई, जिसे जांच के लिए आर्थिक विंग को भेज दिया गया; इसके बाद राज्य सरकार ने हस्तक्षेप किया और मामले को ACB को सौंप दिया.
‘धोखाधड़ी’ कैसे की गई
जांच से सामने आए ब्योरे के मुताबिक, आरोपियों ने बड़ी चालाकी से काम किया. कॉर्पोरेशन ने बैंक में दो खाते खोले थे. उन्हीं कागज़ों का इस्तेमाल करके चुपके से दो और खाते खोल लिए गए, और इन ‘शैडो खातों’ (छिपे हुए खातों) से धीरे-धीरे पैसा निकालकर दूसरे खातों में भेजा जाने लगा.
FDRs (फिक्स्ड डिपॉज़िट रसीदों) के रिन्यूअल के कागज़ नियमित रूप से कॉर्पोरेशन के दफ़्तरों में भेजे जाते थे, जिससे अधिकारियों को यह तसल्ली रहती थी कि उनकी जमा पूंजी सुरक्षित है और उस पर ब्याज मिल रहा है. कॉर्पोरेशन में किसी ने भी बैंक जाकर खातों की खुद जांच करना ज़रूरी नहीं समझा, और धोखेबाज़ों ने संस्था की इसी लापरवाही का पूरा-पूरा फ़ायदा उठाया.
जब आखिरकार यह घोटाला खुलने की कगार पर पहुंच गया, तो बैंक का एक कर्मचारी कॉर्पोरेशन के दफ़्तर आया और जमा पूंजी पर ज़्यादा ब्याज दर देने का प्रस्ताव रखा; ज़ाहिर है, यह मामले को दबाने की एक कोशिश थी. लेकिन इस बार, कॉर्पोरेशन के अधिकारी उनके झांसे में नहीं आए और धोखाधड़ी की पूरी सच्चाई सामने आ गई.
IDFC की जांच से पता चला है कि इसमें ‘शैल फ़र्म’ (कागज़ी कंपनियां), जाली बैंक स्टेटमेंट और एक होटल मालिक का हाथ था. हरियाणा सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के एक सूत्र ने, नाम न छापने की शर्त पर, दिप्रिंट को बताया कि IDFC फर्स्ट बैंक धोखाधड़ी की समानांतर जांच में एक बहुत ही सुनियोजित आपराधिक नेटवर्क का खुलासा हुआ है.
IDFC मामले में, बैंक के तीन अधिकारियों—ऋषभ ऋषि, अभय कुमार और सीमा धीमान—को गिरफ़्तार किया गया है. ये तीनों 2023 से 2025 के बीच चंडीगढ़ के सेक्टर 32 स्थित बैंक शाखा में तैनात थे, और इन पर इस पूरी धोखाधड़ी को अंजाम देने में मदद करने का आरोप है.
सूत्र ने बताया कि आरोपियों ने खुलासा किया है कि सरकारी विभागों को नियमित रूप से भेजे जाने वाले बैंक खातों के स्टेटमेंट जाली थे, और उनमें उन असली लेन-देन का कोई ज़िक्र नहीं था जो वे ‘शैल फ़र्मों’ के ज़रिए कर रहे थे. कैपको फिनटेक, आर एस ट्रेडर्स और स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट नाम की ‘शैल फ़र्मों’ को आरोपियों के करीबी रिश्तेदारों और साथियों के नाम पर खोला गया था.
हरियाणा सरकार के कम से कम आठ विभागों से मिले पैसे पहले इन कंपनियों के खातों में ट्रांसफ़र किए गए, और फिर वहां से चंडीगढ़, मोहाली, खरड़ और अन्य जगहों पर रियल एस्टेट में निवेश के तौर पर लगा दिए गए.
सूत्र ने बताया कि जांचकर्ताओं को पता चला है कि निवेश से जुड़े ज़रूरी कागज़ात आरोपियों के रिश्तेदारों के पास अलग-अलग जगहों पर रखे हुए थे. सूत्र ने कहा, “सरकारी विभागों के खातों से पैसे पहले इन ‘शैल कंपनियों’ के खातों में ट्रांसफ़र किए जाते थे, और उसके बाद उन्हें निजी खातों में भेज दिया जाता था.” “रिकॉन्सिलिएशन (मिलान) के लिए जिन बैंक स्टेटमेंट पर भरोसा किया गया था, उन्हें इस तरह से जाली बनाया गया था ताकि यह दिखाया जा सके कि जमा की गई रकम सुरक्षित है.”
रियल एस्टेट कारोबारी और होटल मालिक विक्रम वधवा, जिन्हें गिरफ्तार भी किया गया है, ने चंडीगढ़ पुलिस और आर्थिक अपराध शाखा को बताया है कि उनकी मुलाकात ऋषभ ऋषि से उनके पिता राकेश कुमार ऋषि के ज़रिए हुई थी. उन्होंने बताया कि ऋषभ के बेटे रिभव ऋषि से मिलवाने से पहले, जो बाद में बैंक मैनेजर बन गया था, उन्होंने वधवा के ‘लैंडमार्क होटल’ के लिए लोन दिलाने में मदद की थी. वधवा ने जांच अधिकारियों को बताया कि रिभव ऋषि ने उन्हें जानकारी दी थी कि कई सरकारी विभागों के खातों में बड़ी मात्रा में फंड जमा है. वधवा ने अपने बयान में कहा, “उसने मुझसे कहा कि चूंकि मुझे रियल एस्टेट में निवेश के लिए फंड की ज़रूरत है, इसलिए वह सरकारी विभागों के खातों से बिना किसी ब्याज़ के बड़ी रकम का इंतज़ाम कर सकता है.” पुलिस के अनुसार, जब भी ज़रूरत होती थी, तो सरकारी खातों में फंड वापस जमा करने के लिए ‘रिवर्स एंट्री’ की जाती थी, जिससे ये लेन-देन किसी की नज़र में नहीं आते थे.
राज्य की विजिलेंस संस्था के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ‘दिप्रिंट’ को बताया कि ये दोनों मामले—590 करोड़ रुपये का IDFC घोटाला और कोटक महिंद्रा FDR घोटाला—इस बात की ओर इशारा करते हैं कि निजी बैंकों की शाखाओं में सरकारी फंड को जमा करने, उसकी निगरानी करने और उसका मिलान करने के तरीके में एक बड़ी ‘प्रणालीगत विफलता’ है. अधिकारी ने कहा, “इन दोनों मामलों में एक बात जो समान है, वह है: जाली दस्तावेज़, ‘शैडो अकाउंट’ (छद्म खाते), और ऐसे अधिकारी जिन्होंने कभी भी इन चीज़ों की पुष्टि करने की ज़हमत नहीं उठाई.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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