नयी दिल्ली, आठ अक्टूबर (भाषा) विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में सांस से संबंधित रोगों में वृद्धि और वायु प्रदूषण का एक दूसरे से संबंध है और सरकार को प्रति परिवार कारों की संख्या सीमित करने तथा एक समय में सड़कों पर चलने वाले वाहनों की संख्या तय करने वाली नीति पेश करनी चाहिए।
इंडियन चेस्ट सोसाइटी द्वारा यहां आयोजित 25वें राष्ट्रीय श्वांस रोग सम्मेलन (एनएपीसीओएन-2023) के मौके पर जयपुर गोल्डन अस्पताल में ‘पल्मोनोलॉजी एंड क्रिटिकल केयर’ विभाग के प्रमुख डॉ. राकेश के. चावला ने कहा कि वायु प्रदूषण का स्वास्थ्य पर अल्पकालिक और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है।
एनएपीसीओएन-2023 के आयोजन के अध्यक्ष चावला ने कहा, “तत्काल प्रभाव आंखों और गले में जलन के रूप में होते हैं। इसके अलावा, दमे का दौरा पड़ने की गंभीरता में भी वृद्धि हुई है।”
सम्मेलन का आयोजन वायु प्रदूषण और उससे होने वाली बीमारियों के साथ-साथ श्वांस रोगों के क्षेत्र में प्रगति पर चर्चा करने के लिए किया गया था।
डॉ. चावला ने कहा कि वायु प्रदूषण के दीर्घकालिक प्रभावों में श्वसन संबंधी बीमारियां और फेफड़ों का कैंसर शामिल हैं, और सबसे बुरी बात यह है कि दिल्ली जैसे शहर में हमारे बच्चों में फेफड़ों की समस्याएं बढ़ रही है, जिसके परिणामस्वरूप फेफड़ों के विकार गंभीर रूप ले लेंगे।
उन्होंने कहा, “हमारी सरकारें वायु प्रदूषण के बढ़ते स्तर से निपटने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं कर रही हैं। इसे एक परिवार के पास वाहनों की संख्या सीमित करने के लिए एक नीति लानी चाहिए और एक समय में सड़कों पर चलने वाले वाहनों की संख्या को भी सीमित करना चाहिए। साथ ही, कार पूलिंग को बढ़ावा देना चाहिए।”
इंडियन चेस्ट सोसाइटी के शीर्ष पदाधिकारी डॉक्टर डी.जे रॉय ने कहा, “श्वसन संक्रमण, लंबे समय तक फेफड़ों में समस्या और फेफड़ों के कैंसर के मामले बढ़ने से फेफड़ों की बीमारियां भारत में एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता का विषय बन गई हैं। एनएपीसीओएन अत्याधुनिक अनुसंधान निष्कर्षों और नवीन उपचार दृष्टिकोणों को प्रदर्शित करके इन मुद्दों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।”
‘ब्रोन्काइटेसिस’ के विशेषज्ञ डॉ. राजा धर ने भारत में फेफड़ों के इस आम विकार से निपटने के लिए जागरूकता और इसकी जल्दी पहचान के महत्व पर प्रकाश डाला। डॉक्टर ने कहा, “कोविड के बाद पल्मोनोलॉजिस्ट समाज द्वारा नर्सों और तकनीशियनों को सभी प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सतत नर्सिंग शिक्षा का एक अभिन्न अंग बनाने की बहुत आवश्यकता महसूस की गई है ताकि उन्हें श्वसन चिकित्सा में नवीनतम प्रगति से अवगत कराया जा सके।”
भाषा जोहेब नरेश
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