Monday, 27 June, 2022
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व्यवसाइयों द्वारा पहला बीज बोने से लेकर आदिवासियों की नक़दी फसल तक: आंध्र कैसे बना गांजा केंद्र

राज्य में गांजे की खेती का इतिहास कम से कम चार दशक पुराना है. शनिवार को ऑपरेशन परिवर्तन के तहत आंध्र पुलिस ने, गांजे के ज़ब्त किए गए 2 लाख किग्रा. के ज़ख़ीरे को जला दिया.

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विशाखापटनम: शनिवार को आंध्र प्रदेश के एक गांव में, गांजा (कैनबिस पौधे से निकाली जाने वाली साइकोएक्टिव ड्रग) के ऊंचे ढेरों के जलने की तस्वीरें, टेलीवीज़न के परदे पर छाई रहीं, और सोशल मीडिया पर भी वायरल हो गईं.

पुलिस के 200 मीट्रिक टन सूखे गांजे में आग लगाने के साथ ही, धुएं का ग़ुबार आसमान की तरफ उठने लगा. ये एक निर्णायक क़दम था जो दक्षिणी सूबे में एक विशाल क्षेत्र में फैली क्यारियों में, कैनबिस फसल की खेती को घटाने के लिए चल रही कार्रवाई का हिस्सा था.

पिछले अक्टूबर में शुरू हुई आंध्र पुलिस की इस विशेष परियोजना ‘ऑपरेशन परिवर्तन’ का लक्ष्य, गांजे की खेती को कम करना है, जिसके लिए फसलों को नष्ट किया जा रहा है, किसानों के लिए जागरूकता कार्यक्रम शुरू किए जा रहे हैं, और तस्करों तथा ड्रग विक्रेताओं के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है.

ये कार्रवाई राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) डी गौतम सवांग की निगरानी में चल रही है और इसके लिए विशिष्ट एजेंसी- विशेष प्रवर्तन ब्यूरो (एसईबी) की टीमें लगाई गई हैं, जिसका गठन पिछले सितंबर में राज्य में शराब और ड्रग्स के अवैध परिवहन को रोकने के लिए किया गया था.

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, राज्य में गांजे की खेती का इतिहास कम से कम चार दशक पुराना है, और ये फसल विशाखापटनम ज़िले के अंदरूनी क्षेत्रों में व्यापक रूप से उगाई जाती है, जिसमें राज्य की प्रस्तावित राजधानी वाइज़ाग, और आंध्र-ओडिशा का सीमावर्त्ती इलाक़ा शामिल है. उचित कनेक्टिविटी के अभाव की वजह से ये इलाक़े, क़ानून प्रवर्त्तन एजेंसियों के लिए बहुत मुश्किल हो जाते हैं. इसके नतीजे में आदिवासियों ने इन क्षेत्रों में कैनबिस उगाना शुरू कर दिया है, क्योंकि इसमें आकर्षक और आसान रिटर्न मिल जाते हैं, और फसल उगाने के लिए बहुत कम प्रयास की ज़रूरत होती है.

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इन इलाक़ों में माओवादियों की मज़बूत मौजूदगी भी, क़ानून प्रवर्त्तन एजेंसियों के लिए एक बाधा साबित हुई है. इसके अलावा पूर्व सरकारी अधिकारी अधिकारियों का कहना है, कि ग्राम सभाओं को सशक्त करने, विकास योजनाएं लागू करने, और आदिवासियों को वैकल्पिक पेशा उपलब्ध कराने में, एक के बाद एक सरकारों की नाकामी ने, आदिवासियों को कैनबिस उगाने की ओर धकेल दिया है.

दिप्रिंट ने फोन और संदेशों के ज़रिए, आंध्र प्रदेश सरकार के सलाहकार राजीव खन्ना से इस मसले पर टिप्पणी लेनी चाही, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. अगर उनकी प्रतिक्रिया मिलती है तो इस लेख को अपडेट कर दिया जाएगा.


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आंध्र में कैसे शुरू हुई गांजे की खेती

विशाखा ‘एजेंसी’ इलाक़े (ये नाम मद्रास प्रेसिडेंसी में ब्रिटिश राज के दौरान एजेंसी एक्ट पास किए जाने के बाद पड़ा) में गांजे की खेती 70 के शुरुआती दशक में शुरू हुई. गांजे की तस्करी का पहला केस लगभग 45 साल पहले 1973 में दर्ज किया गया, जो 1985 में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट के प्रभावी होने से बहुत पहले था.

एसईबी डिप्टी कमिश्नर बाबजी राव के अनुसार, राज्य में गांजे की खेती तब शुरू हुई जब तमिलनाडु और केरल के लोगों ने, आंध्र के कुछ अंदरूनी इलाक़ों की पहचान की, और वहां बीज बोने शुरू कर दिए.

इन लोगों ने, जो सरकारी अधिकारियों के मुताबिक़ व्यवसायी थे, बाद में गांवों में ‘सरग़नाओं’ की पहचान कर ली, और उनके ज़रिए विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) के किसानों को, गांजे की खेती को अपनाने के लिए राज़ी कर लिया. राव ने दिप्रिंट से कहा, ‘ये रातों रात नहीं हो गया, इसे विकसित होने में बरसों लग गए’.

राव ने आगे कहा, ‘आकर्षक और आसान रिटर्न्स, दूसरी फसलों के मुक़ाबले कहीं कम मेहनत, आर्थिक स्थिरता, और कम विकास कुछ ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से आदिवासी लोग गांजे की खेती की ओर आकर्षित हो गए. और इस तरह इस क्षेत्र में हल्दी और अदरक जैसी पारंपरिक फसलों की जगह गांजे ने ले ली’.

उन्होंने आगे कहा, ‘जलवायु और मिट्टी की अनुकूल स्थिति भी, इस क्षेत्र को ऐसे व्यापक स्तर पर खेती के लिए लाभप्रद बनाती है. धीरे धीरे आंध्र पूरे भारत को आपूर्ति करने लगा’.

विशेषज्ञों का कहना था कि हालांकि गांजे की खेती दशकों से चल रही है, लेकिन इसका विस्तार 2005 के बाद ही हुआ. अधिकारियों ने इस समस्या पर तब ध्यान केंद्रित करना शुरू किया, जब दूसरे राज्यों में पकड़े गए ड्रग डीलर्स ने संकेत दिया, कि उन्होंने ये ‘माल’ आंध्र प्रदेश से ख़रीदा था.

पिछले साल अक्टूबर में, हैदराबाद पुलिस ने 300 किलोग्राम गांजा ज़ब्त किया था और उससे एक महीना पहले दिल्ली पुलिस ने बताया, कि उसने और 358 किग्रा. बरामद किया था. दोनों मामलों में ये माल कथित रूप से आंध्र से ख़रीदा गया था. कर्नाटक (बेंगलुरु), केरल, और मध्य प्रदेश में हुई इसी तरह की बदामदगियों में, स्थानीय पुलिस ने आंध्र से संबंधों की ओर इशारा किया.

अक्टूबर में भी, गांजा तस्करी के एक मामले में अभियुक्त को पकड़ने के लिए, तेलंगाना पुलिस विशाखापटनम के चिंतापल्ली मंडल पहुंच गई थी. पुलिस ने कथित रूप से आत्म-रक्षा में गोलियां भी चलाईं. दो दिन बाद आंध्र पुलिस ने तेलुगू देसम पार्टी नेता आनंद बाबू की, राज्य में ‘व्याप्त’ गांजे की खेती पर की गई टिप्पणी के लिए, उन्हें नोटिस जारी कर दिए. उसके दस दिन बाद आंध्र पुलिस ने ‘ऑपरेशन परिवर्तन’ शुरू कर दिया.

वो क्षेत्र जहां फसल उगाई जाती है

राज्य में जिस क़िस्म का गांजा उगाया जाता है उसे ‘शीलावटी’ कहा जाता है- जिसकी देशभर में मांग है, और एसईबी अधिकारियों के अनुसार, क्वालिटी के मामले में देश भर सबसे अच्छी मानी जाती है.

राज्य के पुलिस अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया, कि गांजे की खेती आंध्र-ओडिशा बॉर्डर पर, विशाखापटम ज़िले के ‘एजेंसी क्षेत्रों’ के अंदरूनी इलाक़ों में बहुत बड़े स्तर पर की जाती है, और ‘एजेंसी’ क्षेत्रों के 11 मंडलों में ये विशेष रूप से बड़े पैमाने पर होती है.

इन 11 में से 9 मंडल पूर्वी घाट के घने जंगलों में आते हैं. इन मंडलों में गुदेम कोठा वीधी, पीडाबयालू, मुंचिंगी पुट्टू, गंगाराजू मदुगुला और चिंतापल्ली शामिल हैं, जहां गांजे की व्यापक खेती होती है.

ये मंडल अब सूबे की ‘गांजा राजधानी’ बन गए हैं, और स्थानीय निवासियों की मानें, तो यहां की उत्पादन और तस्करी क्षमता, हिमाचल प्रदेश की चंबा घाटी के तरक़ीबन बराबर है.

राज्य के पुलिस अधिकारियों ने बताया, कि ओडिशा के भी लगभग 23 ज़िले गांजे की खेती में शामिल हैं. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हालांकि आंध्र में ये खेती अपेक्षाकृत कम है, लेकिन ड्रग की ढुलाई में इसका व्यापक रूप से इस्तेमाल हो रहा है, चूंकि यहां के रास्ते छत्तीसगढ़ और ओडिशा की मार्गों की अपेक्षा कहीं अधिक सुगम हैं.

आंध्र के डीजीपी सवांग ने शनिवार को मीडिया को बताया, कि पुलिस के अनुमानों के मुकाबिक़ राज्य के 10,000 एकड़ क्षेत्र में गांजे की खेती की जा रही है.

‘शहरों में कम से कम तीन गुना अधिक क़ीमत’

राज्य पुलिस अधिकारियों के अनुसार, शनिवार को विशाखापटनम से 30 किलोमीटर दूर, कोदुरू गांव के अंदरूनी हिस्सों में जलाया गया दो लाख किलोग्राम सूखा गांजा, एक साल की अवधि के दौरान ज़ब्त किया गया था.

रूढ़िवादी अनुमानों के अनुसार, स्थानीय बाज़ार में इसकी क़ीमत क़रीब 400 करोड़ होती, लेकिन महानगरों में इससे कम से कम तीन गुना अधिक रक़म हासिल होती.

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर दिप्रिंट से कहा, ‘आप जितना दूर जाएंगे, रेट उतना ही बढ़ेगा. आप एक हाईवे को पार करें तो क़ीमत 5,000 रुपए बढ़ जाती है. ज़रा सोचिए मुम्बई, हैदराबाद जाने पर क्या होता है. 1,000 रुपए का माल शहरों तक पहुंचते पहुंचते, 10,000 रुपए का हो जाता है’.


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माओवादियों की मज़बूत उपस्थिति

पुलिस अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया, कि इलाक़ों में माओवादियों की मज़बूत उपस्थिति एक बड़ा कारण है, जिसकी वजह से इन इलाक़ों में घुसना मुश्किल रहा है. मंडलों के बहुत से गांवों में जहां गांजा उगाया जाता है, अभी भी ठीक से सड़क संपर्क नहीं है.

एसईबी डिप्टी कमिश्नर राव ने, जो हाल ही तक राज्य के आबकारी विभाग से जुड़े थे, कहा, ‘बीते सालों में पुलिस के ध्यान न देने, और आबकारी विभाग के पर्याप्त रूप से सक्रिय न होने के नतीजे में, यहां गांजे की खेती एक संगठित अपराध बन गई’.

उन्होंने आगे कहा, ‘आबकारी विभाग के अधिकारियों के पास ज़्यादा संसाधन नहीं हैं. हम ख़ुद भी इन (माओवादी-नियंत्रित) इलाक़ों में जाना चाहते थे. हमें पुलिस से मंज़ूरी का इंतज़ार करना पड़ा’.

पूर्व आईएएस अधिकारी ईएएस शर्मा का कहना था, कि इस क्षेत्र को विकसित करने में क्रमिक सरकारों की विफलता, पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम के तहत ग्राम सभाओं को उचित अधिकार आवंटित न करना, और आदिवासियों ख़ासकर युवाओं के लिए आजीविका उपलब्ध न कराना, वो सब कारण रहे हैं जिनके चलते उन्होंने गांजे की खेती को अपना लिया.

शर्मा ने दिप्रिंट से कहा, ‘व्यवसायी (बिचौलिए) इसका भी फायदा उठाते हैं, कि दूर-दराज़ क्षेत्रों में आदिवासियों के लिए जीविका के अवसर पैदा करने के मामले में, ख़ासकर ओडिशा की सीमा से लगे पडेरू के बाहरी हिस्सों में, राज्य सरकार लोगों की अपेक्षाओं पर पूरी नहीं उतरी है. इसका मूल कारण ये है कि विकास इसके अनुरूप होना चाहिए कि आदिवासी क्या चाहते हैं, न कि इसके कि अमरावती क्या चाहती है, दिल्ली क्या चाहती है, विशाखापटनम क्या चाहता है’.

उन्होंने आगे कहा, ‘इस क्षेत्र में माओवादियों की मौजूदगी कैसे बढ़ी? क्योंकि पुलिस इन इलाक़ों में कभी नहीं गई, और उसने इनकी अनदेखी की’.

आबकारी विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने, जो अपना नाम नहीं बताना चाहते थे, कहा कि इनकी कार्य शैली ये है कि बिचौलिए (अधिकतर दूसरे राज्यों के डीलर), किसानों को फसल उगाने के लिए पहले ही पैसा दे देते हैं, उन्हें बीज बांट दिए जाते हैं, और एक बार फसल तैयार हो जाए, तो फिर किसान को बिल्कुल न्यूनतम क़ीमत अदा की जाती है, जिसके बाद गांजे को तस्करी करके बाहर ले जाया जाता है.

अधिकारी ने आगे कहा, ‘आदिवासियों के शामिल हुए बिना, बाहरी लोग इतनी आसानी से यहां नहीं आ सकते’.

हालांकि माओवादियों ने गांजे की खेती को प्रोत्साहन देने की बात से कई बार इनकार किया है, लेकिन राज्य पुलिस का मानना है, कि गांजे की खेती उनके लिए आय का एक मुख्य स्रोत बन गई है.

आदिवासी संघम (आदिवासी अधिकारों की पैरवी करने वाला संगठन) के सुरेंद्र ने दिप्रिंट से कहा, ‘पुलिस को गांजे की खेती के बारे में सब कुछ पता है, लेकिन वो इसे चलने देते हैं. एक डर ये भी है कि अगर वो ज़्यादा कड़ाई बरतेंगे, और इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे, तो वो बग़ावत करके माओवादी आंदोलन में शामिल हो जाएंगे. इसलिए वो इन्हें ये सब करने देते हैं.

‘ऑपरेशन परिवर्तन’ से अभी तक क्या हासिल हुआ

शनिवार को एक प्रेस विज्ञप्ति में राज्य पुलिस ने कहा, कि ‘ऑपरेशन परिवर्तन’ के अंतर्गत 11 मंडलों के 313 गांवों में उगाई जा रही, गांजे की 7,551 एकड़ की फसल अभी तक नष्ट की जा चुकी है, जिसका अनुमानित मूल्य 9,251 करोड़ था.

ऑपरेशन के तहत राज्य के अंदरूनी इलाक़ों में क़रीब 120 चेक नाके स्थापित किए गए, 577 केस दर्ज किए गए, और इसकी शुरुआत से 1,500 गिरफ्तारियां की जा चुकी हैं, जिनमें से 572 अभियुक्त दूसरे राज्यों से हैं.

डीजीपी सवांग ने दिप्रिंट को बताया, कि गांजे की तस्करी के लिए बिटकॉयंस जैसे कमर्शियल ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म्स का भी इस्तेमाल किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि राज्य पुलिस इस प्रक्रिया की जांच कर रही है.

नवंबर में, आंध्र पुलिस ने ई-कॉमर्स साइट अमेज़ॉन के ज़रिए हो रही, गांजे की तस्करी के सिलसिले में भी गिरफ्तारियां की हैं.

अपने ड्रग-विरोधी ऑपरेशंस के तहत, गांजे की खेती के विस्तार का अंदाज़ा लगाने के लिए, पुलिस ने ड्रोन्स, सैटेलाइट तकनीक, अंतरिक्ष चित्रों, और भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) तकनीक का सहारा लिया.

ज़िला पुलिस सूत्रों के अनुसार, तस्करी की गुप्त सूचनाएं हासिल करने के लिए ‘एजेंसी’ एरिया में मुख़बिरों को सक्रिय रखने के लिए, हर महीने 30 लाख रुपए की रक़म ख़र्च की जाती है.

‘ऑपरेशन फोकस’ जागरूकता फैलाने, और आदिवासियों को वैकल्पिक आजीविका उपलब्ध कराने पर भी ज़ोर देता है, जैसे वैकल्पिक फसलें और युवाओं के लिए कौशल विकास कार्यक्रम आदि.

लेकिन सुरेंद्र का कहना है कि इनके परिणाम तुरंत हासिल नहीं होंगे.

उन्होंने आगे कहा, ‘ वो (आदिवासी) लोग 25 वर्षों से ये काम करते आ रहे हैं. वो अचानक वैकल्पिक फसलों पर क्यों जाएंगे, जिनमें कहीं कम मुनाफा है? पुलिस को इस काम को हाथ में लेकर उन्हें इस दिशा में बढ़ाते रहना होगा. तब जाकर क़रीब चार वर्षों में हमें कुछ बदलाव देखने को मिल सकता है. ये अपेक्षा करना बिल्कुल भी संभव नहीं है, कि वो अचानक इससे दूर हो जाएंगे’.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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