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Sunday, 12 April, 2026
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‘जल, जंगल, ज़मीन’ से रोज़गार तक: सरेंडर के बाद नई राह पर माओवादी

छत्तीसगढ़ सरकार और गृह मंत्रालय (एमएचए) ने सरेंडर कर चुके कैडरों के पुनर्वास और समाज में दोबारा शामिल करने को वामपंथी उग्रवाद के दीर्घकालिक समाधान की एक मुख्य आधारशिला माना है.

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सुकमा/बीजापुर/जगदलपुर (छत्तीसगढ़): सोमवार दोपहर को जगदलपुर के पंडुम कैफे में काम के दौरान ब्रेक लेते हुए पगनी ने कहा, “यह निश्चित रूप से उससे बेहतर है जो हम पहले कर रहे थे. यहां हमें अपनी आज़ादी है और हम अपनी पसंद से काम करते हैं.”

रविवार को कैफे में काफी भीड़ रहती है. यह कैफे बस्तर पुलिस और कैफे ब्रांड नुक्कड़ का एक संयुक्त प्रयास है, जो अपने स्टाफ में पूर्व माओवादी और वामपंथी उग्रवाद (LWE) से प्रभावित लोगों को शामिल करने के लिए जाना जाता है.

नारायणपुर जिले की रहने वाली पगनी 2016 में सरेंडर करने से पहले एक दशक तक प्रतिबंधित संगठन से जुड़ी रही. मुख्यधारा में वापस लाने के प्रयास के तहत सरकार ने उसे बस्तर पुलिस के पुनर्वास केंद्र में हॉस्पिटैलिटी सर्विस की ट्रेनिंग के लिए भेजा.

पिछले साल नवंबर में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय द्वारा पंडुम कैफे के उद्घाटन के बाद से पगनी वहां काम कर रही हैं. सुबह 10 बजे काम शुरू होता है. दोपहर में ब्रेक मिलता है. 35 साल की पगनी को महीने के अंत में 9,000 रुपये मिलते हैं.

पूर्व माओवादी कैडर पगनी जगदलपुर के पंडुम कैफे में सफाई का काम करती हुई | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
पूर्व माओवादी कैडर पगनी जगदलपुर के पंडुम कैफे में सफाई का काम करती हुई | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

नुक्कड़ के सह-संस्थापक तुपेश चंद्राकर बताते हैं कि यह कैफे प्रॉफिट-शेयरिंग मॉडल पर चलता है, जिसमें बस्तर पुलिस की 15 प्रतिशत हिस्सेदारी है. चंद्राकर ने दिप्रिंट को बताया, “यहां 20 स्टाफ हैं, जिनमें से सात सरेंडर कर चुके माओवादी हैं और पांच हिंसा के पीड़ित हैं.”

उन्होंने कहा कि सरेंडर कर चुके माओवादी अपने काम को अच्छी तरह कर रहे हैं.

छत्तीसगढ़ सरकार और गृह मंत्रालय (MHA) ने सरेंडर कर चुके कैडरों के पुनर्वास और उन्हें समाज में दोबारा जोड़ने को LWE के दीर्घकालिक समाधान का एक अहम हिस्सा माना है. इस रणनीति के तहत, बस्तर संभाग के जिलों में सरेंडर करने वालों के लिए ‘पुना मार्गेम’ (पुनर्वास का रास्ता) नीति शुरू की गई है.

नई ज़िंदगी की शुरुआत

आमतौर पर शनिवार सरकारी दफ्तरों के लिए छुट्टी का दिन होता है, लेकिन सुकमा जिला पुलिस मुख्यालय के माओवादी सेल में ऐसा नहीं है. यहां दो दर्जन से ज्यादा सरेंडर कर चुके कैडर अपने घर लौटने से पहले बायोमेट्रिक समेत अपनी व्यक्तिगत जानकारी जमा करने के लिए इकट्ठा हुए हैं.

इनमें से एक हैं मरकाम पुज्जे, जिन्होंने रूरल सेल्फ-एम्प्लॉयमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (RSETI) में हॉस्पिटैलिटी और आजीविका से जुड़ी ट्रेनिंग पूरी की है.

ग्रामीण विकास मंत्रालय (MoRD) की पहल RSETI ने बस्तर के कई जिलों में सरेंडर कर चुके माओवादियों के पुनर्वास में बड़ी भूमिका निभाई है. ये संस्थान बैंकों के साथ मिलकर मुफ्त, आवासीय और उद्यमिता आधारित ट्रेनिंग देते हैं.

मरकाम पुज्जे, जो पहले एरिया कमेटी मेंबर थीं, पिछले साल सरेंडर करने के बाद दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी करने सुकमा पुलिस मुख्यालय पहुंचीं | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
मरकाम पुज्जे, जो पहले एरिया कमेटी मेंबर थीं, पिछले साल सरेंडर करने के बाद दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी करने सुकमा पुलिस मुख्यालय पहुंचीं | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

पुज्जे ने कहा, “मुझे यहां ट्रेनिंग मिली है और मुझे सुकमा के एक स्थानीय डॉक्टर के यहां सहायक के रूप में नौकरी मिली है. मैंने काम शुरू कर दिया है.” वह आगे चलकर इसी काम में करियर बनाना चाहती हैं.

पुज्जे पिछले साल सुकमा एसपी किरण चव्हाण के सामने सरेंडर करने से पहले इलाके में एरिया कमेटी मेंबर (ACM) थीं. बाद में उन्हें जिला पुनर्वास केंद्र में रखा गया. सुकमा जिला पुलिस मुख्यालय से कुछ मीटर दूर स्थित दो मंजिला इमारत में औसतन 150 से ज्यादा ऐसे लोग रहते हैं.

सुबह का समय ‘क्लास’ में बीतता है, जहां उन्हें सिलाई और हॉस्पिटैलिटी की बेसिक ट्रेनिंग दी जाती है. केंद्र में एक कमरे में पांच महिलाएं रहती हैं.

उन्होंने कहा, “मैं गांव वापस नहीं जाना चाहती.” उनके माता-पिता अब नहीं हैं और बाकी रिश्तेदारों से भी उनका कोई संपर्क नहीं है.

केशव मरकाम सुकमा के RSETI में मौजूद दो दर्जन से ज्यादा सरेंडर कैडरों में अलग पहचान रखते हैं, जो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के सहयोग से चलता है. उनके साथी भी मानते हैं कि वह सबसे अच्छे वक्ता हैं. एक नए पेंट किए गए कमरे में वे पोल्ट्री फार्मिंग के बुनियादी पहलुओं पर यूट्यूब ट्यूटोरियल देख रहे हैं.

मरकाम उन 108 कैडरों में शामिल हैं जिन्होंने 8 फरवरी को जगदलपुर में सरेंडर किया था. उन्होंने कहा, “पोल्ट्री फार्मिंग की इस क्लास से पहले हमें बकरी पालन की ट्रेनिंग दी गई थी.”

उन्होंने निर्माण कार्य की ट्रेनिंग इसलिए नहीं ली क्योंकि वे उस क्षेत्र में करियर नहीं बनाना चाहते थे.

सुकमा के RSETI ट्रेनिंग सेंटर में पूर्व माओवादी केशव मरकाम कहते हैं कि वे हिंसा के रास्ते से दूर नई शुरुआत करना चाहते हैं | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
सुकमा के RSETI ट्रेनिंग सेंटर में पूर्व माओवादी केशव मरकाम कहते हैं कि वे हिंसा के रास्ते से दूर नई शुरुआत करना चाहते हैं | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

अपने माओवादी जुड़ाव के बारे में पूछे जाने पर मरकाम बताते हैं कि उन्हें “जल, जंगल और ज़मीन” और आदिवासी पहचान बचाने के नाम पर माओवादी कमांडरों ने अपने साथ जोड़ा था.

मरकाम ने कहा, “मैं 2015 में 10वीं क्लास में था और गर्मी की छुट्टियों में गांव गया था, तभी पार्टी के लोग आए और हमें अपने संसाधनों के लिए लड़ने को कहा. उन्होंने कहा, पढ़ाई से क्या होगा? अब समय है कि हम अपने हक के लिए लड़ें.”

उन्होंने सीपीआई (माओवादी) की सशस्त्र इकाई पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) की बटालियन नंबर वन में काम किया, जिसका नेतृत्व अब मारे जा चुके केंद्रीय समिति सदस्य मडवी हिडमा करते थे.

“अब मैं उनके पास वापस नहीं जाऊंगा. मेरे बुजुर्ग माता-पिता हैं और मेरा बड़ा भाई आंध्र प्रदेश में रहता है. मैं अपने घर पर नई ज़िंदगी शुरू करूंगा.”

भागना, इंतज़ार और आकांक्षाएं

मरकाम के PLGA की पहली बटालियन के साथी मडवी मुक्का की कहानी बिल्कुल अलग है.

जैसे-जैसे सुरक्षा बलों ने महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में फैले पूरे दंडकारण्य क्षेत्र में कार्रवाई तेज की, वरिष्ठ माओवादी नेता कथित तौर पर भागकर कर्रेगुट्टा पहाड़ियों में छिप गए. ये पहाड़ियां 60 किमी लंबी और 5-20 किमी चौड़ी दुर्गम इलाके में फैली हैं, जो छत्तीसगढ़ के बीजापुर और तेलंगाना के मुलुगु जिले के बीच स्थित हैं.

कई माओवादी नेताओं के खिलाफ सफलता मिलने के बाद आत्मविश्वास से भरे सुरक्षा बलों ने इन पहाड़ियों को भी खाली कराने का फैसला किया, जो पिछले साल तक उनका आखिरी अनछुआ क्षेत्र था.

छत्तीसगढ़ पुलिस के जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की कोबरा बटालियन द्वारा चलाया गया यह ऑपरेशन करीब 21 दिन चला, जिसमें 31 माओवादी मारे गए. हालांकि, वरिष्ठ कैडर इलाके के अन्य हिस्सों में भाग निकले.

2019 में संगठन से जुड़े मुक्का, जो एरिया कमेटी मेंबर थे, अपने गांव के साथी और कुख्यात कमांडर मडवी हिडमा के साथ कई पहचान से जुड़े विवरण जानते थे. दोनों बीजापुर-सुकमा सीमा के पुवर्ती गांव के रहने वाले हैं.

मुक्का ने बताया कि वह पहाड़ियों से उतरकर अपने घर भाग आया, जो हिडमा के घर के ठीक पास है. उसकी मां ने मीडिया की नजर और जांच के चलते घर छोड़ दिया था.

उसके बड़े भाई मडवी देवा ने दिप्रिंट को बताया कि मुक्का ने अप्रैल में सरेंडर किया और दिसंबर में घर लौटा. हिंदी ठीक से न बोल पाने के कारण देवा ही उसकी बात बताते हैं.

देवा बताते हैं, “वह अप्रैल में भागकर घर आया था. उसने कहा कि बड़ा एनकाउंटर चल रहा था और वह कई दिनों से भूखा था. अगर वह पहाड़ियों से नहीं भागता, तो मारा जाता.”

मडवी मुक्का (बाएं) और उसके बड़े भाई मडवी देवा, सुकमा के पुवर्ती गांव में उनके घर पर | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
मडवी मुक्का (बाएं) और उसके बड़े भाई मडवी देवा, सुकमा के पुवर्ती गांव में उनके घर पर | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

चार भाइयों में से दो माओवादी थे. दूसरे भाई मडवी मुंगा की मौत हो गई. देवा ने कहा, “हमारे बड़े भाई तेलंगाना में एनकाउंटर में मारे गए. उनका शव भद्राचलम अस्पताल में रखा गया था और हमने यहां उनका अंतिम संस्कार किया.”

मुक्का के लिए सरेंडर करने के बाद भी सुरक्षा की गारंटी नहीं है, देवा ने कहा, “दिसंबर में पार्टी के दो लोग और मिलिशिया के दो लोग उसे ढूंढने आए थे. उन्होंने उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन हमने विरोध किया, जिससे वे भाग गए.”

“पिछले कुछ महीनों से हम डर में जी रहे हैं. पार्टी भले खत्म हो गई हो, लेकिन किसी भी दिन हमला उसकी जान ले सकता है.”

बस्तर के आदिवासियों की रोजमर्रा की जिंदगी में महुआ के फूल अहम हैं और यह बात सरेंडर कर चुके माओवादियों पर भी लागू होती है. मुक्का और उसके भाई अपनी मां की खेती में मदद करते हैं और हर सुबह महुआ के फूल इकट्ठा करते हैं. घर के बाहर खड़ा नया ट्रैक्टर उनके सपनों और भविष्य की झलक दिखाता है.

मुक्का को अभी तक वह इनाम राशि नहीं मिली है, जो सरकार सरेंडर करने वाले हर माओवादी को देने का वादा करती है. उसके सिर पर कितनी रकम घोषित थी, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन ACM स्तर के कैडर पर आमतौर पर 5 लाख रुपये का इनाम होता है, जो सरेंडर के बाद दिया जाता है.

देवा ने कहा, “अब सभी कैडर, यहां तक कि वरिष्ठ भी, हथियारों के साथ सरेंडर कर रहे हैं और सरकार से इनाम ले रहे हैं. वह (मुक्का) भागकर आया था, इसलिए हमें अभी तक कोई इनाम नहीं मिला.”

सुकमा पुलिस मुख्यालय में दिर्डो विज्जल अपने रोजगार और घर बनाने के लिए पैसे को लेकर चिंतित हैं. पूर्व दरभा डिवीजन प्रभारी, जिन्हें ‘जैलाल’ के नाम से जाना जाता था, पर 25 लाख रुपये का इनाम था.

वह कहते हैं कि नक्सल सेल ने उन्हें तीन साल की लॉक-इन अवधि के बारे में बताया, “अगर मुझे अभी पैसे मिल जाते, तो अच्छा होता. इससे मैं घर बना पाता और परिवार का खर्च चला पाता.”

वह बताते हैं कि सरेंडर के समय सरकार ने 50,000 रुपये दिए थे, और बाद में घर बनाने के लिए 40,000 रुपये की एक और किस्त दी गई.

पूर्व दरभा डिवीजन प्रभारी दिर्डो विज्जल मानते हैं कि इनाम राशि जल्दी मिलने से उनका पुनर्वास आसान होगा | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
पूर्व दरभा डिवीजन प्रभारी दिर्डो विज्जल मानते हैं कि इनाम राशि जल्दी मिलने से उनका पुनर्वास आसान होगा | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी. बताते हैं कि इनाम राशि देने की प्रक्रिया तय नियमों के तहत होती है, जिसमें कैडर की रैंक, भूमिका और संगठन में बिताए समय जैसे कारक देखे जाते हैं.

उन्होंने कहा, “सबसे पहले जिला स्तर की समिति हर कैडर की जानकारी इकट्ठा करती है, फिर उसकी जांच की जाती है. इसके बाद एसपी प्रस्ताव भेजते हैं, जिसे राज्य स्तर की समिति को अंतिम मंजूरी के लिए भेजा जाता है.”

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के अनुसार, इनाम राशि को खाते में आने में तीन से छह महीने लगते हैं. हालांकि, तीन साल की लॉक-इन अवधि सरकार की नीति है, जिसके तहत यह पैसा फिक्स्ड डिपॉजिट में रखा जाता है.

एडीजी विवेकानंद सिन्हा बताते हैं कि यह लॉक-इन अवधि एक “जांच और संतुलन” है, ताकि यह देखा जा सके कि माओवादी समाज में सही तरीके से वापस शामिल हो रहे हैं या नहीं.

उन्होंने कहा, “अगर बिना लॉक-इन के तुरंत पैसा दे दिया जाए, तो यह गलत हाथों में जा सकता है और इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है.”

लॉक-इन खत्म होने के बाद एसपी मंजूरी देते हैं, जिसके बाद पैसा खाते में मिल जाता है.

आईजी और एडीजी दोनों का कहना है कि सरकार की नीति लचीली है और शादी या घर बनाने जैसे खास मामलों में कुछ पैसा पहले भी निकाला जा सकता है.

34-वर्षीय रंसई का सपना है कि वह इनाम के पैसों से चार पहिया वाहन खरीदे, “मैं चार चक्का खरीदूंगा और उसे चलाकर पैसे कमाऊंगा.” वह अपने गांव में झोपड़ी के बाहर टूटी-फूटी हिंदी में कहते हैं.

वह बताते हैं, “मुझे पिछले महीने 8 लाख रुपये का इनाम मिला.”

रंसई ने अपनी साथी माओवादी से शादी की थी, लेकिन 2024 में एनकाउंटर में उसकी मौत हो गई. वह अपने बड़े भाई के साथ सुकमा के बेदरे गांव में रहता है.

वह 2001 में संगठन से जुड़ा था और ओडिशा सहित पूरे दंडकारण्य क्षेत्र में काम किया. वे बताते हैं, “2010 तक मेरे पास AK-47 थी.”

इसके बाद वह अपने खेत की ओर महुआ के फूल इकट्ठा करने चले जाते हैं.

सलवा जुडूम का दर्द

बीजापुर पुनर्वास केंद्र में रमेश सोयम स्किल डेवलपमेंट ट्रेनिंग ले रहे हैं, जिसमें निर्माण कार्य भी शामिल है. उन्होंने पिछले साल अक्टूबर में सरेंडर किया था और वे यहां 100 से ज्यादा सरेंडर कैडरों में शामिल हैं.

बीजापुर पुनर्वास केंद्र में सरेंडर कर चुके माओवादियों को खाना परोसा जाता हुआ | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
बीजापुर पुनर्वास केंद्र में सरेंडर कर चुके माओवादियों को खाना परोसा जाता हुआ | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

सोयम 2021 में संगठन से जुड़े, लेकिन उनकी कहानी 2005 की घटनाओं से जुड़ी है, उन्होंने कहा, “सलवा जुडूम के दौरान मेरे चाचा का पीछा कर गांव वालों ने उन्हें मार दिया था. हमें नक्सली कहा गया और हमारे घर जला दिए गए.”

2005 में शुरू हुआ सलवा जुडूम आंदोलन, जिसे सरकार का समर्थन था, 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने अवैध घोषित कर दिया था.

उस समय सोयम सिर्फ तीन साल के थे. उनके दस्तावेज में जन्म वर्ष 2002 लिखा है, लेकिन उन्हें खुद अपनी उम्र का ठीक से पता नहीं.

“मैं सलवा जुडूम के वो दृश्य कभी नहीं भूल पाया, जब मेरे चाचा को मारकर नाले में फेंक दिया गया था.”

उन्होंने सरेंडर पार्टी नेताओं के कहने पर किया, जिन्होंने उनकी जान को खतरा बताया था. अब वे पुनर्वास केंद्र में ट्रेनिंग ले रहे हैं और घर लौटने का इंतजार कर रहे हैं.

हालांकि, उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया है, लेकिन बुद्ध मोहंदा का मानना ​​है कि माओवादी आंदोलन को केवल सुरक्षा बलों की ताकत के कारण ही कुचला जा सका | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
हालांकि, उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया है, लेकिन बुद्ध मोहंदा का मानना ​​है कि माओवादी आंदोलन को केवल सुरक्षा बलों की ताकत के कारण ही कुचला जा सका | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

उनके साथी बुद्ध मोहनडा की सोच भी कुछ ऐसी ही है. 34-वर्षीय मोहनडा अपनी पत्नी के साथ पिछले साल नवंबर में सरेंडर किए थे.

उन्होंने कहा, “हमने राजमिस्त्री का काम सीखा है. एक महीने तक रोज क्लास की.”

मोहनडा कहते हैं कि उन्होंने हथियार इसलिए छोड़े क्योंकि “जल, जंगल, जमीन” जैसे लक्ष्यों को हासिल करना संभव नहीं लग रहा था.

वह मानते हैं कि उनका सरेंडर करने का फैसला सुरक्षा बलों की बढ़ती कार्रवाई के कारण हुआ, “पिछले साल जनवरी से ऑपरेशन तेजी से बढ़े, जिससे हमें लगा कि हमारे लक्ष्य पूरे नहीं हो सकते.”

आठवीं कक्षा तक पढ़े मोहनडा बताते हैं कि उनका झुकाव माओवादी आंदोलन की ओर सलवा जुडूम के बाद बढ़ा.

उन्होंने याद किया, “जब मैं छात्र था, तब सलवा जुडूम शुरू हुआ और हमारे गांव को जला दिया गया. हमें नक्सली कहा गया.”

वह कहते हैं कि ‘जल, जंगल, ज़मीन’ की लड़ाई गलत नहीं थी.

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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