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Wednesday, 21 February, 2024
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RAW के पूर्व प्रमुख ने किताब के लिए नहीं ली मंजूरी, रिटायर्ड अधिकारी पाबंदी की क्यों कर रहे आलोचना

अमरजीत सिंह दुलत की मंजूरी नहीं लेने को 2021 की सरकारी अधिसूचना के कथित उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है, जिसे कई रिटायर्ड अधिकारियों ने 'असंवैधानिक' होने के लिए फटकार लगाई.

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नई दिल्ली: पूर्व रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) के प्रमुख अमरजीत सिंह दुलत की नई किताबए लाइफ इन द शैडोज़: ए मेमॉयर (2022), जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, ऑपरेशन ‘ब्लैक थंडर’ आदि के बारे में बात करती है – बिना किसी सक्षम अधिकारी से मंजूरी के प्रकाशित हुई थी. खुफिया सूत्रों ने दिप्रिंट को यह जानकारी दी.

जबकि इसे जून 2021 की सरकारी अधिसूचना के कथित उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है, दुलत ने दिप्रिंट को बताया कि वह किसी अधिसूचना से बंधे हुए नहीं हैं. उन्होंने कहा, ‘मुझे ऐसी किसी अधिसूचना की जानकारी नहीं है. आधिकारिक तौर पर मुझे कुछ भी नहीं बताया गया था.’

जून 2021 की अधिसूचना के अनुसार, केंद्र सरकार ने सिविल सेवकों के लिए पेंशन नियमों में संशोधन किया, जिसमें खुफिया या सुरक्षा से संबंधित संगठनों में सेवानिवृत्त अधिकारियों को सक्षम प्राधिकारी से मंजूरी के बिना अपने संगठन से संबंधित किसी भी जानकारी को प्रकाशित करने पर रोक लगा दी गई थी.

अधिसूचना के मुताबिक, संगठन के प्रमुख को यह तय करने की शक्ति है कि प्रकाशन के लिए प्रस्तावित सामग्री संवेदनशील है या गैर-संवेदनशील है, और क्या यह संगठन के क्षेत्र में आती है.

इसमें ‘संगठन के डोमेन से संबंधित और किसी भी कार्मिक और उसके पदनाम के बारे में कोई संदर्भ या जानकारी, उक्त संगठन में काम करने के आधार पर प्राप्त विशेषज्ञता या ज्ञान’ से संबंधित कोई भी सामग्री शामिल है और ‘संवेदनशील जानकारी, जिसके बाहर आने से भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, रणनीतिक, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों या किसी विदेशी राज्य के साथ संबंध पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, या जो किसी अपराध को बढ़ावा देगा’ आदि शामिल है.

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अधिसूचना के बावजूद कई सेवानिवृत्त अधिकारी, जो संवेदनशील पदों पर रहे हैं, बिना आवश्यक अनुमति के किताबें और कॉलम लिखना जारी रखे हुए हैं और अब तक किसी भी सेवानिवृत्त अधिकारी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है. हालांकि, कई अन्य ऐसे भी हैं जो क्लीयरेंस के लिए अपना काम जमा कर नियमों का पालन कर रहे हैं.

दिप्रिंट ने कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) से यह पूछने के लिए संपर्क किया कि सरकार कैसे सुनिश्चित करती है कि अधिसूचना का ठीक से पालन किया जा रहा है या नहीं और क्या पहले किसी सेवानिवृत्त अधिकारी के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई है. हालांकि, डीओपीटी के प्रवक्ता ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

दिप्रिंट ने जिन सेवानिवृत्त अधिकारियों से बात की, उन्होंने कहा कि जब आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 (ओएसए) पहले से ही मौजूद है और राज्य इसके तहत राज्य की जरूरी सूचना लीक करने वाले अधिकारियों और पूर्व अधिकारियों पर मुकदमा चला सकता है, तो इस तरह के संशोधन की कोई आवश्यकता नहीं थी.

नाम न छापने की शर्त पर एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, ‘पेंशन एक अधिकार है जो प्रत्येक सरकारी कर्मचारी को सरकार में रहते हुए की गई सेवा के लिए दी जाती है. यह केवल भविष्य में अच्छा जीवन व्यतीत करने के लिए दी जाती है, सिवाए किसी गंभीर अपराध या आपराधिक गतिविधि के लिए सजा मिलने के इसे दूर नहीं किया जा सकता है.’

उन्होंने कहा, ‘अगर कुछ मामलों के बारे में लिखना गंभीर कदाचार है, तो सरकार निश्चित रूप से कानून के अनुसार पूर्व अधिकारी को उसकी पेंशन से वंचित करने के लिए कार्रवाई कर सकती है.’

उन्होंने कहा, ‘यह सुनिश्चित करने का उद्देश्य कि सेवानिवृत्त लोग राष्ट्र की सुरक्षा के नुकसान के लिए किसी भी संवेदनशील सामग्री का खुलासा नहीं करते हैं, आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम की पुनरावृत्ति और उसके तहत कड़ी कार्रवाई से प्राप्त किया जाता है.’

एक अन्य सेवानिवृत्त अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि केवल वही लोग जो सुरक्षा संबंधी मामलों में शामिल रहे हैं –आंतरिक या बाहरी –अधिकार और विश्वसनीयता के साथ बोल सकते हैं, और इसलिए इन संस्मरणों को लिखने से नहीं रोका जाना चाहिए.


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‘शासकीय आदेश से नहीं रुक सकती पेंशन, कोर्ट के आदेश की ज़रूरत’

एक अन्य सेवानिवृत्त अधिकारी के अनुसार, यूपीए सरकार ने 2008 में इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) और रॉ में काम कर चुके अधिकारियों के लिए ऐसा आदेश लाने की कोशिश की थी. आदेश की हर तरफ से आलोचना की गई और आखिरकार इसे वापस ले लिया गया.

अधिकारी ने कहा, ‘जाने-माने वकील ए.जी. नूरानी ने उस समय बताया था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार, जिसमें जानने का अधिकार शामिल है, पूर्ण नहीं, लेकिन राज्य अनुच्छेद-19 में दिए गए आधारों पर और केवल ‘कानून’ के आधार पर अधिकार पर ‘प्रतिबंध’ लगा सकता है, न कि एक कार्यकारी आदेश के जरिए.’

दिप्रिंट से बात करते हुए, पूर्व आईपीएस अधिकारी और सुरक्षा और खुफिया विशेषज्ञ, वप्पला बालाचंद्रन ने कहा कि कार्यकारी आदेश से किसी व्यक्ति की पेंशन को नहीं रोका जा सकता है.

उन्होंने कहा, ‘पेंशन सरकारी कर्मचारियों के लिए उनके द्वारा प्रदान की गई सेवा के लिए एक दीर्घकालिक मुआवजा है और यह केवल उपहार नहीं है जिसे कंपनी देती है, बल्कि यह एक कर्मचारी अपनी लंबी, निरंतर सेवा के आधार पर कमाता है.’
उन्होंने कहा, ‘एक कार्यकारी आदेश से किसी की पेंशन नहीं रोकी जा सकती. इसके लिए कोर्ट के आदेश की ज़रूरत है. सर्वोच्च न्यायालय के पर्याप्त निर्णय हैं जो कहते हैं कि पेंशन को रोका नहीं जा सकता है.’

बालाचंद्रन ने आगे कहा कि 2021 की अधिसूचना को लागू करना मुश्किल है और यह एक ‘खोखला धमकी’ अधिक लगता है.

उन्होंने कहा, ‘यहां मुद्दा यह है कि सरकार दुनिया के कोने-कोने में प्रकाशित होने वाली हर चीज़ पर कैसे नजर रखेगी? यह असंभव है. ऐसा निर्देश क्यों जारी करते हैं जिसे लागू नहीं किया जा सकता? यह एक खोखली धमकी की तरह है और पूरी तरह से असंवैधानिक है.’

उन्होंने यह भी कहा कि यह समानता के सिद्धांत के खिलाफ है क्योंकि यह सेना, सैन्य और विदेशी सेवाओं के अधिकारियों पर लागू नहीं होता है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने अपनी लिखी किताबों के लिए अनुमति ली है.

बालाचंद्रन ने कहा, ‘मैंने अपने काम के लिए मंजूरी ली है क्योंकि मुझे लगता है कि एक संवेदनशील संगठन के लिए काम करने के बाद ऐसा करना ज़रूरी है.’


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अधिसूचना की कानूनी स्थिति

कानूनी विशेषज्ञों और पूर्व खुफिया अधिकारियों के अनुसार, उक्त अधिसूचना के लिए कोई कानूनी स्थिति नहीं है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में कहा गया है कि सरकार किसी कर्मचारी की पेंशन नहीं रोक सकती है.

दिप्रिंट से बात करते हुए, सिविल सेवा कानून से संबंधित अधिवक्ता ज्ञानंत सिंह ने कहा कि अधिसूचना वैध होने के बावजूद, यह कानूनी रूप से लागू नहीं हो सकती है.

उन्होंने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में स्पष्ट किया है कि पेंशन को रोका नहीं जा सकता है.’

सिंह ने कहा, ‘यदि यह अधिसूचना जून 2021 में आई है, तो नियम उन अधिकारियों पर लागू नहीं होते हैं जो इससे पहले सेवा में शामिल हुए थे. पहले उन्होंने जो किया उसके लिए उन्हें इसमें घसीटा नहीं जा सकता और उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता.’

उन्होंने कहा, ‘इसके अलावा, इस मामले में यदि सरकार किसी सेवानिवृत्त अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करती है, जिसने अधिसूचना का उल्लंघन किया है, तो वह हमेशा अदालत का रुख कर सकता है और इसे चुनौती दे सकता है और निर्णय कर्मचारी के पक्ष में होगा.’

हालांकि, अधिवक्ता गोविंद स्वरूप चतुर्वेदी के मुताबिक, पेंशन ‘भविष्य के अच्छे आचरण’ पर देय है और किसी भी कदाचार के लिए पेंशनरों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है.

उन्होंने कहा, ‘केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) संशोधन नियम, 2020 के अनुसार पेंशन को रोका जा सकता है. राष्ट्र की सुरक्षा और अखंडता से बढ़कर कुछ भी पवित्र नहीं हो सकता है. हालांकि, इसे चुनौती दी जा सकती है, इस पहलू को किसी भी अदालत में बरकरार रखा जाएगा.’

चतुर्वेदी ने कहा, ‘कार्रवाई का कारण चार साल से अधिक पुराना होने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती है.’

(संपादनः फाल्गुनी शर्मा)

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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